• प्रश्न :

    प्रश्न. बढ़ते भौतिकवाद और व्यक्तिवाद से चिह्नित समाज में मानवीय मूल्यों पर अक्सर दबाव पड़ता है। नैतिक शासन और समावेशी विकास सुनिश्चित करने में मानवीय मूल्यों की प्रासंगिकता पर चर्चा कीजिये। उपयुक्त उदाहरणों सहित। (150 शब्द)

    08 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • उत्तर की शुरुआत समकालीन परिवर्तनों को रेखांकित करते हुए कीजिये।
    • मुख्य भाग में स्पष्ट कीजिये कि ये परिवर्तन किस प्रकार मानवीय मूल्यों से टकराव उत्पन्न करते हैं या उनके विपरीत परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं।
    • इसके बाद यह तर्क प्रस्तुत कीजिये कि नैतिक शासन सुनिश्चित करने में मानवीय मूल्यों की क्या प्रासंगिकता है।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    तीव्र आर्थिक विकास, शहरीकरण और तकनीकी उन्नति ने भारतीय समाज को बदल दिया है, जिससे भौतिक समृद्धि तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रता में वृद्धि हुई है। हालाँकि, इस बदलाव ने भौतिकवाद, प्रतिस्पर्द्धा एवं स्वार्थ को भी बढ़ा दिया है, जिससे सामूहिक ज़िम्मेदारी और नैतिक संवेदनशीलता प्राय: कमज़ोर हो जाती है।

    • ऐसे परिप्रेक्ष्य में मानवीय मूल्यों की पुनः पुष्टि नैतिक शासन और समावेशी विकास को बनाए रखने के लिये अत्यंत आवश्यक हो जाती है।

    मुख्य भाग: 

    भौतिकवाद, व्यक्तिवाद और मानवीय मूल्यों के बीच संघर्ष:

    • सहानुभूति और सामाजिक ज़िम्मेदारी का क्षरण: व्यक्तिगत उपलब्धियों, दक्षता और भौतिक सफलता पर बढ़ते ज़ोर के कारण प्राय: दूसरों की कठिनाइयों के प्रति भावनात्मक संवेदनशीलता कम हो जाती है। शासन में यह उस समय दिखाई देता है जब नियम-निर्देश और लक्ष्य-प्रधान प्रशासन में सहानुभूति पीछे छूट जाती है।
      • उदाहरण के लिये, डिजिटल दस्तावेज़ीकरण या बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण पर सख्त ज़ोर ने वृद्ध, प्रवासी और बेघर व्यक्तियों को कल्याणकारी योजनाओं से बाहर कर दिया है, जो यह दर्शाता है कि प्रक्रियागत दक्षता मानव कल्याण पर भारी पड़ सकती है।
      • ऐसी प्रवृत्तियाँ राज्य के सबसे कमज़ोर वर्गों की सुरक्षा की नैतिक ज़िम्मेदारी को कमज़ोर करती हैं।
    • अनैतिक प्रथाओं का सामान्यीकरण: एक अत्यधिक प्रतिस्पर्द्धात्मक और प्रदर्शन-केंद्रित वातावरण में सफलता प्राय: परिणामों के आधार पर मापी जाती है, न कि नैतिक तरीकों से।
      • यह घूसखोरी, पक्षपात और प्रक्रियाओं में हेरफेर जैसे शॉर्टकट्स को बढ़ावा देता है ताकि व्यक्तिगत या संस्थागत लाभ सुनिश्चित किया जा सके।
      • सेवा वितरण में भ्रष्टाचार, परीक्षा प्रश्नपत्र लीक या भर्ती प्रक्रियाओं में वरीयता देने के उदाहरण दिखाते हैं कि कैसे भौतिक प्रोत्साहन ईमानदारी को कमज़ोर कर देते हैं।
        • समय के साथ अनैतिक व्यवहार सामाजिक रूप से सहन्य बन जाता है, जिससे सार्वजनिक और निजी जीवन में नैतिक मानदंड कमज़ोर पड़ जाते हैं।
    • सामूहिक कल्याण और सार्वजनिक भावना का कमज़ोर होना: व्यक्तिवाद, व्यक्तिगत सुविधा और आराम को सामूहिक ज़िम्मेदारी पर प्राथमिकता देता है, जिससे सार्वजनिक संसाधनों तथा समाज के कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता कमज़ोर हो जाती है।
      • यह पर्यावरणीय मानकों की व्यापक अनदेखी में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है, जैसे कि अपशिष्ट का अनुचित निपटान, संसाधनों का अत्यधिक उपयोग या सामुदायिक स्वास्थ्य उपायों का विरोध।
      • सार्वजनिक संकट के समय सुरक्षा निर्देशों का पालन न करना या सामूहिक प्रयासों में योगदान देने से बचना नागरिक चेतना में कमी को दर्शाता है। ऐसा व्यवहार सहयोग, एकजुटता और साझा ज़िम्मेदारी जैसे मूल्यों के विपरीत है, जो सामाजिक सामंजस्य के लिये  आवश्यक हैं।
    • कमज़ोर समूहों का हाशियाकरण: बाज़ार-केंद्रित विकास और लाभ-उन्मुख परियोजनाएँ प्राय: सामाजिक न्याय तथा मानवीय गरिमा को पर्याप्त रूप से संबोधित नहीं कर पाती हैं।
      • शहरी अवसंरचना परियोजनाएँ, औद्योगिक गलियारे और रियल एस्टेट विस्तार प्राय: अनौपचारिक श्रमिकों, झुग्गी-झोंपड़ी के निवासियों तथा जनजातीय समुदायों को बिना पर्याप्त पुनर्वास या आजीविका सुरक्षा के विस्थापित कर देते हैं।
      • इसी प्रकार महिलाओं का अवैतनिक देखभाल कार्य और अनौपचारिक श्रम आर्थिक योजना में कम आँका जाता है।
        • यह बहिष्कारपूर्ण प्रवृत्ति दर्शाती है कि अप्रतिबंधित भौतिकवाद और व्यक्तिवाद कैसे असमानताओं को गहरा सकते हैं तथा न्याय, सहानुभूति एवं समावेशिता जैसे मानवीय मूल्यों को कमज़ोर कर सकते हैं।

    नैतिक शासन सुनिश्चित करने में मानवीय मूल्यों का महत्त्व 

    • सार्वजनिक प्रशासन में ईमानदारी और नैतिकता: ईमानदारी, अखंडता और जवाबदेही जैसे मानवीय मूल्य सार्वजनिक प्रशासन के नैतिक आधार का निर्माण करते हैं।
      • जब अधिकारी इन मूल्यों को अपनाते हैं तो निर्णय प्रक्रिया में सार्वजनिक हित को व्यक्तिगत लाभ पर प्राथमिकता दी जाती है।
      • पारदर्शी खरीद प्रणाली, ई-टेंडरिंग एवं खुले डेटा पोर्टल जैसे उपाय विवेक और भ्रष्टाचार को कम करते हैं तथा ईमानदारी-प्रधान शासन को दर्शाते हैं। ऐसे अभ्यास राज्य की नैतिक शक्ति को मज़बूत करते हैं और सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग को रोकते हैं।
    • सहानुभूति-आधारित नीति निर्माण और क्रियान्वयन: सहानुभूति अधिकारियों को केवल फाइल-आधारित शासन से आगे बढ़कर नागरिकों की वास्तविक परिस्थितियों को समझने में सक्षम बनाती है।
      • कोविड-19 महामारी के दौरान निशुल्क भोजन वितरण, प्रवासियों के लिये अस्थायी आश्रय और दस्तावेज़ीकरण मानकों में ढील जैसी पहलें करुणामय शासन को दर्शाती हैं।
      • सहानुभूति द्वारा आकार दी गई नीतियाँ सुनिश्चित करती हैं कि कल्याणकारी योजनाएँ सबसे कमज़ोर वर्गों तक पहुँचें और कठोर प्रक्रियाओं के बजाय मानव पीड़ा के प्रति संवेदनशील हों।
    • नैतिक संवेदनशीलता के साथ विधि का शासन: जहाँ विधि का शासन समानता और निष्पक्षता सुनिश्चित करता है, वहीं मानवीय मूल्य इसके मानवतावादी प्रयोग का मार्गदर्शन करते हैं।
      • नैतिक विवेक अधिकारियों को विशेष परिस्थितियों, जैसे आपदाओं या आपातकाल में संदर्भानुसार नियमों की व्याख्या करने की अनुमति देता है।
      • उदाहरण के लिये, प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित किसानों के लिये समय सीमा में अनुकूलन नैतिक संवेदनशीलता को दर्शाता है। कानून और मानवता के इस संतुलन से न्याय तथा संस्थाओं में जनता का विश्वास बढ़ता है।
    • संस्थाओं का विश्वास और वैधता: संस्थाएँ केवल संवैधानिक अधिकार से ही नहीं, बल्कि नैतिक आचरण से भी वैधता प्राप्त करती हैं।
      • जब नागरिक शासन में निष्पक्षता, सम्मान और त्वरित प्रतिक्रिया का अनुभव करते हैं तो सार्वजनिक संस्थाओं में उनका विश्वास बढ़ता है।
      • प्रभावी शिकायत निवारण तंत्र, जनता-केंद्रित पुलिसिंग और सुलभ सार्वजनिक सेवाएँ उदाहरण हैं कि मूल्य-आधारित आचरण कैसे लोकतांत्रिक वैधता को मज़बूत करता है।

    समावेशी विकास सुनिश्चित करने में मानवीय मूल्यों का महत्त्व 

    • सेवा वितरण में गरिमा और समानता: मानवीय मूल्य यह सुनिश्चित करते हैं कि विकास नीतियाँ व्यक्तियों की गरिमा का सम्मान करें, न कि लाभार्थियों को केवल सांख्यिकी के रूप में देखें।
      • समावेशी शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल एवं आवास जैसी पहलें, जो महिलाओं, दिव्यांग व्यक्तियों और हाशिये पर रहने वाले समुदायों के लिये पहुँच को प्राथमिकता देती हैं, समानता तथा सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाती हैं। गरिमा-केंद्रित विकास व्यक्तियों को अधिकार-संपन्न नागरिक के रूप में सशक्त बनाता है।
    • हाशिये पर रहने वाले समूहों की भागीदारी और सशक्तीकरण: सम्मान और सहानुभूति के मूल्य सहभागी विकास को बढ़ावा देते हैं, जहाँ समुदाय भागीदार होते हैं, न कि केवल निष्क्रिय लाभार्थी।
      • महिला स्व-सहायता समूहों, जनजातीय परिषदों और स्थानीय समुदायों को योजना बनाने तथा कार्यान्वयन में शामिल करना, विकास पहलों की स्वामित्व, जवाबदेही एवं स्थायित्व को बढ़ाता है। मूल्यों में निहित सशक्तीकरण लोकतांत्रिक भागीदारी को मज़बूत करता है।
    • पीढ़ीगत और पर्यावरणीय उत्तरदायित्व: मानवीय मूल्य वर्तमान पीढ़ी से आगे बढ़कर आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी नैतिक चिंता को विस्तारित करते हैं। पर्यावरणीय उत्तरदायित्व पर आधारित सतत विकास आर्थिक वृद्धि और पारिस्थितिक संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करता है।
      • प्राकृतिक संसाधनों का नैतिक संरक्षण, जलवायु-सहिष्णु योजना और जैव-विविधता की रक्षा यह सुनिश्चित करती है कि आज का विकास भविष्य की पीढ़ियों के कल्याण से समझौता न करे।
    • सामाजिक एकता और एकजुटता: भ्रातृत्व, सहिष्णुता और पारस्परिक सम्मान को बढ़ावा देकर मानवीय मूल्य सामाजिक ध्रुवीकरण तथा असमानताओं को कम करते हैं। समावेशी कल्याणकारी कार्यक्रम, समुदाय-आधारित विकास मॉडल और कमज़ोर वर्गों के लिये सामाजिक सुरक्षा एकजुटता तथा सामूहिक कल्याण को प्रोत्साहित करते हैं। ऐसा मूल्य-आधारित विकास सामाजिक एकता और राष्ट्रीय एकजुटता को मज़बूत करता है।

    निष्कर्ष:

    भौतिकवाद और व्यक्तिवाद के युग में मानवीय मूल्य नैतिक शासन एवं समावेशी विकास को दिशा देने वाला नैतिक मार्गदर्शक बनते हैं। ये सुनिश्चित करते हैं कि विकास मानव-केंद्रित, न्यायपूर्ण और सतत बना रहे।

    इन मूल्यों की पुनर्पुष्टि व्यक्तिगत आकांक्षाओं को सामूहिक कल्याण और लोकतांत्रिक आदर्शों के साथ संतुलित करने के लिये अनिवार्य है।