प्रश्न. भारत में जेंडर बजटिंग के लिये अपनाए गए संस्थागत और प्रक्रियात्मक तंत्रों पर चर्चा कीजिये। जेंडर बजट आवंटन को मापने योग्य सामाजिक परिणामों में परिवर्तित करने की चुनौतियों का मूल्यांकन कीजिये। (250 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- उत्तर की शुरुआत जेंडर बजटिंग की परिभाषा देकर कीजिये।
- मुख्य भाग में संस्थागत उपायों को प्रस्तुत कीजिये।
- इसके बाद जेंडर बजटिंग में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया का वर्णन कीजिये।
- फिर यह समझाएँ कि जेंडर बजट आवंटन वास्तविक और मापनीय सामाजिक परिणामों में क्यों नहीं बदल पाते।
- अंत में परिणामों में सुधार लाने के लिये उपयुक्त उपाय सुझाएँ।
- तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
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परिचय
जेंडर बजटिंग सार्वजनिक वित्त का एक लैंगिक-संवेदनशील दृष्टिकोण है, जो लैंगिक प्राथमिकताओं को अलग से दर्शाने के बजाय उन्हें केंद्र और राज्य के सामान्य बजट ढाँचे में एकीकृत करता है।
- भारत में जेंडर बजट का व्यय वर्ष 2014-15 में ₹0.98 लाख करोड़ से बढ़कर वर्ष 2025-26 में ₹4.49 लाख करोड़ हो गया है और इसका हिस्सा केंद्रीय बजट में 5.46% से बढ़कर 8.86% तक पहुँच गया है।
मुख्य भाग:
भारत में जेंडर बजटिंग के संस्थागत तंत्र
- महिला एवं बाल विकास मंत्रालय (MoWCD) — नोडल एजेंसी के रूप में: MoWCD दिशानिर्देश जारी करके, क्षमता-विकास मॉड्यूल तैयार करके तथा विभिन्न मंत्रालयों की जेंडर बजटिंग पहलों की समीक्षा करके समन्वयकारी भूमिका निभाता है।
- यह स्वयं कार्यान्वयन प्राधिकरण के रूप में नहीं, बल्कि ज्ञान एवं सुविधा-सहायक के रूप में कार्य करता है।
- जेंडर बजट वक्तव्य: वित्त मंत्रालय प्रतिवर्ष केंद्रीय बजट के साथ प्रस्तुत किये जाने वाले जेंडर बजट वक्तव्य के माध्यम से बजटीय प्रक्रियाओं में लैंगिक दृष्टिकोण को शामिल करता है।
- यह निगरानी सुनिश्चित करता है तथा मंत्रालयों के बीच रिपोर्टिंग में समानता बनाए रखता है।
- मंत्रालयों एवं विभागों में जेंडर बजटिंग सेल (GBCs): अधिकांश केंद्रीय मंत्रालयों और कई राज्यों में GBCs स्थापित किये गए हैं, जो जेंडर-संबंधी योजनाओं की पहचान करते हैं, बजटीय आवंटनों का विश्लेषण करते हैं और आवश्यक संशोधनों का सुझाव देते हैं।
- ये सेल क्षेत्रीय नीतिगत ढाँचे के भीतर लैंगिक मुद्दों को संस्थागत रूप प्रदान करते हैं।
- संसदीय निगरानी एवं लेखा-परीक्षा संस्थान: संसदीय समितियाँ और नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) परोक्ष रूप से महिलाओं से संबंधित कल्याणकारी योजनाओं के व्यय-कुशलता और परिणामों की समीक्षा करके जेंडर बजटिंग को सुदृढ़ बनाते हैं।
जेंडर बजटिंग में अपनाई गई प्रक्रियात्मक व्यवस्थाएँ
- जेंडर बजट स्टेटमेंट (GBS): GBS बजटीय प्रावधानों को दो भागों में वर्गीकृत करता है—भाग A (100% महिलाओं-विशिष्ट योजनाएँ) और भाग B (ऐसी योजनाएँ जिनमें महिलाओं के लिये कम से कम 30% आवंटन होता है)। यह स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास और आजीविका जैसे विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं-केंद्रित व्यय की दृश्यता सुनिश्चित करता है।
- योजना निर्माण में पूर्व-विश्लेषण: मंत्रालयों को यह आकलन करने के लिये प्रोत्साहित किया जाता है कि प्रस्तावित नीतियाँ और योजनाएँ महिलाओं को किस प्रकार भिन्न रूप से प्रभावित करती हैं तथा तभी अंतिम बजट आवंटन तय किये जाएँ। यह प्रक्रिया उत्तरकालिक रिपोर्टिंग (Post-facto) से आगे बढ़कर जेंडर-संवेदनशील योजना-निर्माण को बढ़ावा देती है।
- आउटकम बजटिंग और निगरानी: जेंडर-संबंधित परिणामों को आउटकम बजट और प्रदर्शन संकेतकों के माध्यम से ट्रैक किये जाने की अपेक्षा रहती है, ताकि वित्तीय आवंटन को सेवा-प्रदान और लाभार्थी प्रभाव से जोड़ा जा सके।
आवंटनों को मापनीय सामाजिक परिणामों में बदलने की चुनौतियाँ
- इनपुट-केंद्रित दृष्टिकोण, न कि आउटकम-उन्मुख बजटिंग: जेंडर बजटिंग में प्राय: व्यय-निगरानी पर अधिक ध्यान दिया जाता है, प्रभाव आकलन पर नहीं।
- उदाहरण के लिये, पोषण या मातृ-स्वास्थ्य योजनाओं पर अधिक व्यय होने के बावजूद कमज़ोर निगरानी के कारण महिलाओं के स्वास्थ्य संकेतकों में समानुपातिक सुधार नहीं दिखता।
- जेंडर बजटिंग सेल्स की सीमित क्षमता: कई GBCs केवल अनुपालक इकाइयों की तरह कार्य करती हैं, जिनके पास पर्याप्त तकनीकी विशेषज्ञता नहीं होती। इससे नीतिगत डिज़ाइन को प्रभावित करने वाला गहन जेंडर विश्लेषण सामने नहीं आ पाता और रिपोर्टिंग मात्र औपचारिकता बनकर रह जाती है।
- क्षेत्रीय और योजनागत विखंडन: महिला-संबंधित हस्तक्षेप स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास, आवास, कौशल विकास आदि कई मंत्रालयों में विभाजित होते हैं।
- कमज़ोर समन्वय के कारण दोहराव, अंतराल और प्रभाव में कमी होती है—विशेषकर बहुआयामी मुद्दों जैसे महिलाओं के रोज़गार में।
- डेटा एवं संकेतकों की कमी: विभाजित और वास्तविक समय वाले जेंडर डेटा के अभाव में परिणामों का सटीक मापन कठिन हो जाता है।
- उदाहरण के लिये, रोज़गार और कौशल योजनाएँ प्रायः प्रतिभागियों की संख्या दर्ज करती हैं, लेकिन यह नहीं बतातीं कि इससे महिलाओं की आय-संबंधी स्वायत्तता या रोज़गार स्थिरता कितनी बढ़ी।
- सामाजिक-सांस्कृतिक और कार्यान्वयन संबंधी बाधाएँ: व्यापक पितृसत्तात्मक सोच, आवाजाही पर प्रतिबंध और घरेलू देखभाल का अतिरिक्त भार महिलाओं की योजनाओं तक पहुँच को बाधित करता है।
- इसका परिणाम यह होता है कि कागज पर दिखने वाले आवंटन वास्तविक लाभार्थियों तक प्रभावी रूप से नहीं पहुँच पाते और सशक्तीकरण अधूरा रह जाता है।
लैंगिक बजटिंग के परिणामों को सुधारने के उपाय
- जेंडर बजटिंग से जेंडर-उत्तरदायी बजटिंग की ओर बदलाव: ऑस्ट्रिया जैसे देश बजट आवंटनों को कानूनी रूप से निर्धारित लैंगिक समानता के परिणामों से जोड़ते हैं।
- भारत भी प्रदर्शन-आधारित बजटिंग ढाँचे में लैंगिक लक्ष्यों को इसी प्रकार एकीकृत कर सकता है।
- परिणाम संकेतकों और लैंगिक डेटा प्रणाली को सुदृढ़ करना: कनाडा के जेंडर रिज़ल्ट्स फ्रेमवर्क से प्रेरणा लेकर, भारत विभिन्न क्षेत्रों में मानकीकृत लैंगिक परिणाम संकेतक विकसित कर सकता है, जिन्हें मज़बूत, लैंगिक-आधारित विभाजित डेटा संग्रह द्वारा समर्थित किया जाए।
- लाइन मंत्रालय और GBCs का क्षमता-निर्माण: दक्षिण अफ्रीका की प्रथाओं को अपनाते हुए, भारत क्षेत्र-विशिष्ट लैंगिक प्रभाव मूल्यांकन कराने हेतु अधिकारियों के सतत प्रशिक्षण में निवेश कर सकता है, केवल सामान्य रिपोर्टिंग तक सीमित नहीं रहे।
- लैंगिक ऑडिट और स्वतंत्र मूल्यांकन को एकीकृत करना: UN वीमेन द्वारा समर्थित देशों की तरह नियमित लैंगिक ऑडिट यह मूल्यांकन कर सकते हैं कि व्यय वास्तविक सशक्तीकरण परिणामों में बदलता है या नहीं, जिससे आवश्यकतानुसार मध्यावधि सुधार संभव हो सके।
- अभिसरण और स्थानीय-स्तर पर कार्यान्वयन को बढ़ाना: नॉर्डिक देशों की तरह स्थानीय सरकारों को लैंगिक-उत्तरदायी हस्तक्षेपों की योजना बनाने तथा उन्हें लागू करने के लिये सशक्त करना, बजट को स्थानीय वास्तविकताओं और समुदाय की आवश्यकताओं से बेहतर रूप से जोड़ सकता है।
निष्कर्ष
भारत में जेंडर बजटिंग के लिये एक मज़बूत संस्थागत ढाँचा मौजूद है, जो सशक्त नीतिगत इच्छाशक्ति को दर्शाता है; लेकिन कमज़ोर क्षमता, परिणाम-केंद्रित दृष्टिकोण की कमी और सामाजिक-सांस्कृतिक बाधाएँ इसके प्रभाव को सीमित कर देती हैं। डेटा प्रणालियों, जवाबदेही तंत्रों और परिणाम-आधारित योजना को मज़बूत करना आवश्यक है, ताकि जेंडर बजटिंग प्रतीकात्मक आवंटनों से आगे बढ़कर वास्तविक सशक्तीकरण परिणामों में परिवर्तित हो सके।