• प्रश्न :

    प्रश्न. भारत में शहरीकरण के दौरान भू-स्थलाकृति विज्ञान और जल विज्ञान संबंधी बाधाओं की अनदेखी बढ़ती जा रही है। इससे शहरी बाढ़ और पर्यावरण क्षरण में किस प्रकार योगदान हुआ है, चर्चा कीजिये। (250 शब्द)

    05 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भूगोल

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत हाल की घटनाओं को रेखांकित करके कीजिये।
    • मुख्य भाग में तर्क दें कि इन प्रतिबंधों की अनदेखी कैसे शहरी बाढ़ को बढ़ावा देती है।
    • उपेक्षा और शहरी संवेदनशीलता से निपटने के लिये कुछ संक्षिप्त उपाय प्रस्तुत कीजिये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    भारत में तेज़ी से हो रहे शहरीकरण ने प्राय: प्राकृतिक भू-स्थलाकृतियों और जल-निकासी प्रणालियों की अनदेखी की है, जिसके परिणामस्वरूप बाढ़ मैदान, आर्द्रभूमियाँ और नदी मार्ग निर्मित क्षेत्रों में बदलते जा रहे हैं।

    चेन्नई और बंगलूरू जैसे शहरों में बार-बार आने वाली बाढ़ यह दर्शाती है कि भू-स्थलाकृति और जल-विज्ञान संबंधी वास्तविकताओं की उपेक्षा कैसे भारी वर्षा को मानव-जनित आपदाओं में बदल देती है। यह प्रवृत्ति न केवल पर्यावरणीय क्षरण को तीव्र करती है बल्कि शहरी स्थिरता को भी कमज़ोर बनाती है।

    मुख्य भाग: 

    भू-स्थलाकृति और जल विज्ञान संबंधी बाधाओं की अनदेखी – शहरी बाढ़ तथा पर्यावरणीय क्षरण को बढ़ावा

    • मृदा सीलिंग और ‘फ्लैश फ्लड’ प्रभाव: प्राकृतिक भू-स्थलाकृति यह तय करती है कि जल कहाँ अवशोषित होगा और कहाँ बहेगा, जबकि शहरीकरण के दौरान जल-संग्राही मृदा को कंक्रीट तथा अस्फाल्ट जैसी जलरोधी सतहों से बदल दिया जाता है।
      • यह मृदा को ‘सील’ कर देता है, जिससे जल का अवशोषण रुक जाता है और वह तुरंत सतही बहाव में बदल जाता है।
      • इस वजह से बाढ़ का उच्चतम प्रवाह प्राकृतिक स्तर के मुकाबले 1.8 से 8 गुना तक बढ़ सकता है और सतही जल का संचय 6 गुना तक बढ़ जाता है। (NDMA)
    • प्राकृतिक बाढ़ मैदानों पर अतिक्रमण: भू-स्थलाकृति के दृष्टिकोण से बाढ़ मैदान नदियों के ‘सुरक्षा वाल्व’ होते हैं। ये समतल क्षेत्र होते हैं जो अचानक जलस्तर बढ़ने पर अतिरिक्त जल को समाहित करने के लिये बनाए गए हैं। इनकी अनदेखी कर इन भूमि पर निर्माण करने से नदी की जल संग्रहण क्षमता कम हो जाती है।
      • जब नदी अपने बाढ़ मैदान का विस्तार नहीं कर पाती तो जल स्तर अधिक और बहाव तीव्र हो जाता है, जिससे विकसित इलाकों में ‘फ्लुवियल’ बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है।
      • उदाहरण के लिये, मुंबई में पुनः प्राप्त की गई भूमि पर निर्माण और मीठी नदी जैसी ज्वारीय नालियों का अवरोध वर्ष 2005 की बाढ़ को और बढ़ा गया, जब 24 घंटे में लगभग 944 मिमी बारिश हुई थी।
    • ‘अर्बन स्पंज’ (आर्द्रभूमि और झीलों) का विनाश: जलविज्ञान कम ऊँचाई वाले क्षेत्रों, जैसे आर्द्रभूमि, दलदल और झीलों पर निर्भर करता है, जो प्राकृतिक जल संग्रहण क्षेत्र के रूप में कार्य करते हैं। जब ये क्षेत्र निर्माण के लिये उपयोग किये जाते हैं तो शहर अपनी प्राकृतिक जल संग्रहण क्षमता खो देता है।
      • इन ‘स्पंजों’ के बिना मध्यम वर्षा भी गंभीर जलजमाव का कारण बन सकती है, क्योंकि कृत्रिम जलनिकासी प्रणालियाँ जल्दी ही इससे अभिभूत हो जाती हैं।
    • भूजल पुनर्भरण और भू-स्खलन में व्यवधान: जलविज्ञान की अनदेखी केवल सतह पर जलभराव नहीं लाती, बल्कि भूमिगत समस्याएँ भी उत्पन्न करती हैं। अवशोषण को रोककर शहर भूजल के पुनर्भरण की प्रक्रिया बाधित कर देते हैं।
      • बढ़ती जनसंख्या के कारण भूजल के अत्यधिक दोहन और पक्की सतहों द्वारा पुनर्भरण में बाधा आने से 'लैंड सबसिडेंस' की स्थिति उत्पन्न होती है। भूमि के इस धॅंसाव के कारण शहरी क्षेत्र निचले स्तर पर आ जाते हैं, जिससे उनकी बाढ़ के प्रति संवेदनशीलता और बढ़ जाती है।
      • उदाहरण के लिये, उत्तराखंड के जोशीमठ में अत्यधिक भूजल निष्कर्षण, अनियोजित निर्माण और प्राकृतिक जल निकासी के अवरोध के कारण हिमालय की संवेदनशील भू-आकृति में भूमि धॅंसने की घटनाएँ देखी गई हैं।
    • 'अर्बन हीट आइलैंड' और जलवैज्ञानिक प्रतिक्रिया: भू-आकृति केवल ऊँचाई तक सीमित नहीं है, यह तापीय गुणों से भी संबंधित है। प्राकृतिक परिदृश्य (जैसे वन और आर्द्रभूमि) वाष्पोत्सर्जन के माध्यम से तापमान को नियंत्रित करते हैं। इन प्राकृतिक परिदृश्यों के कंक्रीट में बदलने से शहर में गर्मी संचित हो जाती है।
      • इस ‘अर्बन हीट आइलैंड’ (UHI) प्रभाव से स्थानीय मौसम पैटर्न बदल सकते हैं। शहरों में अधिक गर्म हवा अधिक तीव्र और स्थानीय ‘संवहन’ वर्षा को उत्तेजित कर सकती है।
      • इस प्रकार शहर अपना स्वयं का ‘माइक्रो-मानसून’ (सूक्ष्म-मानसून) तैयार करता है, जो पहले से जल-संरक्षित सतह पर भारी वर्षा करता है। इसके परिणामस्वरूप तत्काल बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

    भू-स्थलाकृति और जलवैज्ञानिक उपेक्षा तथा शहरी संवेदनशीलता से निपटने के उपाय:

    • प्राकृतिक बाढ़ अवरोधों की सुरक्षा और पुनर्स्थापना: शहरी आर्द्रभूमि, बाढ़ मैदान, झीलों और मैंग्रोव का संरक्षण एवं पुनर्स्थापना होनी चाहिये, क्योंकि ये पारिस्थितिक तंत्र भारी वर्षा के दौरान प्राकृतिक स्पंज की तरह कार्य करते हैं।
      • शहरों को स्पंज सिटी अवधारणा अपनानी चाहिये, जिसमें जल अवशोषक सतहें, शहरी आर्द्रभूमि और हरित अवसंरचना शामिल हों, ताकि वर्षा का जल अवशोषित तथा नियंत्रित किया जा सके, जिससे बाढ़ कम हो और भूजल पुनर्भरण सुधरे।
      • वैज्ञानिक मानचित्रण, GIS का उपयोग, आर्द्रभूमि और बाढ़ मैदानों की  कानूनी अधिसूचना तथा कड़े अतिक्रमण विरोधी उपाय आगे के क्षरण को रोक सकते हैं और शहरों की प्राकृतिक बाढ़-नियंत्रण क्षमता को पुनर्जीवित करने में सहायता कर सकते हैं।
    • शहरी नियोजन में भू-स्थलाकृति और जल का समन्वय: शहरी नियोजन में भू-स्थलाकृति और जलवैज्ञानिक वास्तविकताओं को शामिल करना आवश्यक है, जिसके लिये जलग्रहण आधारित और स्थलाकृति-संवेदनशील मास्टर प्लान अपनाए जाएँ।
      • बाढ़ मैदानों के ज़ोनिंग, तटीय नियमावली और पहाड़ी क्षेत्रों में निर्माण दिशानिर्देशों का सख्ती से पालन करना आवश्यक है, ताकि पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील तथा बाढ़ प्रवण क्षेत्रों में निर्माण रोका जा सके।
    • जलवायु-सहनशील जलनिकासी अवसंरचना का उन्नयन: शहरों को आधुनिक वर्षा जल निकासी प्रणाली की आवश्यकता है, जो भविष्य की अतिवृष्टि के अनुसार डिज़ाइन की गई हो, न कि पुराने ऐतिहासिक औसत के अनुसार।
      • इसके लिये नालियों का विस्तार एवं कीचड़-मुक्तिकरण करना, गंदे जल और वर्षा जल के नेटवर्क को अलग करना तथा नियमित रखरखाव सुनिश्चित करना आवश्यक है, ताकि नालियाँ जाम न हों और शहरी जलभराव रोका जा सके।
    • प्राकृतिक आधारित शहरी समाधान को बढ़ावा: प्रकृति-आधारित समाधानों जैसे कि पारगम्य फुटपाथ, हरित छतें, शहरी वन, रेन गार्डन और अनिवार्य वर्षा जल संचयन को भवन उप-नियमों तथा राजकोषीय प्रोत्साहनों के माध्यम से बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
      • ये उपाय सतही जल बहाव को कम करते हैं, भूजल पुनर्भरण को बढ़ाते हैं और शहरी पर्यावरण स्वास्थ्य में सुधार करते हैं।

    निष्कर्ष:

    भारत में शहरी बाढ़ अब केवल वर्षा के कारण नहीं, बल्कि प्राकृतिक भू-स्थलाकृति और जलवैज्ञानिक वास्तविकताओं की अनदेखी का परिणाम अधिक है। आर्द्रभूमि की हानि, खराब जलनिकासी और स्थलाकृति से असंगत शहरी विस्तार ने बाढ़ के जोखिम को बढ़ाया है तथा शहरी पारिस्थितिकी तंत्र को क्षीण किया है। शहरीकरण को प्रकृति के अनुरूप ढालना आवश्यक है ताकि भारत के शहर अनुकूल, सतत और रहने योग्य बन सकें।