प्रश्न :
राकेश मेहता एक तेज़ी से विकसित हो रहे ज़िले के लोक निर्माण विभाग (PWD) में कार्यकारी अभियंता हैं। उनका विभाग सड़क निर्माण, सार्वजनिक भवनों और अवसंरचना के रख-रखाव से संबंधित ठेकों को स्वीकृति देने के लिये जिम्मेदार है। हाल ही में सरकार ने ग्रामीण क्षेत्रों में संपर्क सुधारने के उद्देश्य से एक बड़ी सड़क विकास परियोजना को स्वीकृति प्रदान की है।
निविदा प्रक्रिया के दौरान राकेश यह देखते हैं कि बोली की शर्तों में सूक्ष्म रूप से ऐसे परिवर्तन किये गये हैं, जो एक विशेष निजी ठेकेदार के पक्ष में जाते हैं। तकनीकी पात्रता मानदंड अनावश्यक रूप से अत्यधिक प्रतिबंधात्मक प्रतीत होते हैं, जिससे वास्तविक और सक्षम प्रतिस्पर्द्धी स्वतः ही बाहर हो जाते हैं। अनौपचारिक रूप से राकेश को यह भी ज्ञात होता है कि वरिष्ठ अधिकारी और स्थानीय राजनीतिक नेता वित्तीय कमीशन और राजनीतिक चंदे के बदले इस पसंदीदा बोलीदाता को ठेका दिलाने के लिये विभाग पर दबाव बना रहे हैं।
हालाँकि चयनित फर्म ने अधिक मूल्य की बोली लगाई है और उसका पिछला रिकॉर्ड भी संदिग्ध रहा है, फिर भी निविदा मूल्यांकन समिति पर इन कमियों की अनदेखी करने के लिये प्रभाव डाला जा रहा है। जब राकेश प्रक्रियागत आपत्तियाँ उठाते हैं, तो सहकर्मी उन्हें ‘प्रणाली के अनुसार चलने’ की सलाह देते हैं और यह भी चेतावनी देते हैं कि पूर्व में ऐसी प्रथाओं का विरोध करने वाले अधिकारियों को दरकिनार कर दिया गया या स्थानांतरित कर दिया गया था।
इसी बीच स्थानीय नागरिक और मीडिया सरकारी परियोजनाओं में कार्य की निम्न गुणवत्ता और बढ़ती लागत को लेकर प्रश्न उठा रहे हैं। इस परिस्थिति में राकेश एक नैतिक दुविधा का सामना कर रहे हैं— एक ओर मौन रहकर अपने कॅरियर की सुरक्षा करें या दूसरी ओर पेशेवर प्रतिकूलताओं के जोखिम के बावजूद पारदर्शिता एवं निष्पक्षता का पालन करें।
प्रश्न
1. उपर्युक्त प्रकरण में निहित नैतिक मुद्दों का अभिनिर्धारण कीजिये।
2. राजनीतिक दबाव और निविदा प्रक्रिया में अनियमितताओं के संदर्भ में एक लोक सेवक के रूप में राकेश मेहता किन नैतिक दुविधाओं का सामना कर रहे हैं?
3. निविदा प्रक्रिया में पारदर्शिता, जवाबदेही और लोकहित सुनिश्चित करने के लिये राकेश के लिये सबसे उपयुक्त कार्य-मार्ग क्या होना चाहिये?
02 Jan, 2026
सामान्य अध्ययन पेपर 4 केस स्टडीज़
उत्तर :
हितधारक (Stakeholders Involved)
- राकेश मेहता (कार्यकारी अभियंता, PWD) – एक लोकसेवक, जिनकी ज़िम्मेदारी निष्पक्षता, पारदर्शिता तथा सार्वजनिक धन के सर्वोत्तम उपयोग को सुनिश्चित करना है।
- वरिष्ठ अधिकारी और राजनीतिक नेता – व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ के लिये किसी विशेष ठेकेदार को लाभ पहुँचाने हेतु दबाव डालते हुए।
- निजी ठेकेदार – वास्तविक बोलीदाता जिन्हें अनुचित रूप से बाहर किया जा रहा है, जबकि पसंदीदा ठेकेदार हेरफेर का लाभ ले रहा है।
- टेंडर मूल्यांकन समिति और विभागीय कर्मचारी – अनियमितताओं की अनदेखी करने के लिये प्रभावित या बाध्य किये गए।
- नागरिक और स्थानीय समुदाय – अवसंरचना परियोजनाओं के अंतिम उपभोक्ता, जिन्हें निम्न-गुणवत्ता वाले कार्य और बढ़ी हुई लागतों का नकारात्मक प्रभाव झेलना पड़ता है।
- सरकार और सार्वजनिक कोष – भ्रष्टाचार के कारण वित्तीय हानि और प्रतिष्ठात्मक क्षति का सामना करते हैं।
- मीडिया और सिविल सोसाइटी – सुशासन में विफलताओं को उजागर कर निगरानीकर्त्ता का कार्य करती हैं।
1. केस में शामिल नैतिक मुद्दे
- भ्रष्टाचार और शक्ति का दुरुपयोग: किसी विशेष ठेकेदार को लाभ पहुँचाने के लिये निविदा शर्तों में जानबूझकर हेरफेर करना आधिकारिक अधिकार का स्पष्ट दुरुपयोग है। सार्वजनिक शक्ति, जिसे नागरिकों के प्रति एक नैतिक न्यास के रूप में प्रयोग किया जाना चाहिये, उसे निजी लाभ जैसे कमीशन, किकबैक या राजनीतिक फंडिंग की ओर विचलित कर दिया जाता है।
- यह आचरण सार्वजनिक अधिकारियों से अपेक्षित सत्यनिष्ठा, ईमानदारी और निष्पक्षता जैसे नैतिक सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।
- पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा का उल्लंघन: अनावश्यक रूप से कठोर पात्रता मानदंडों को शामिल करना पारदर्शिता और समान अवसर जैसे मूल सिद्धांतों को कमज़ोर करता है। वास्तविक और सक्षम ठेकेदारों को अनुचित रूप से बाहर कर दिया जाता है, जिससे निविदा प्रक्रिया एक पूर्व-निर्धारित औपचारिकता बनकर रह जाती है।
- ऐसी प्रथाएँ प्रतिस्पर्द्धी बोली प्रणाली के उद्देश्य को विफल करती हैं, जिसका उद्देश्य दक्षता, नवाचार और सार्वजनिक धन के सर्वोत्तम मूल्य को सुनिश्चित करना है।
- हितों का टकराव: जब राजनीतिक या वित्तीय हित प्रशासनिक निर्णयों को प्रभावित करते हैं तो सार्वजनिक हित को निजी लाभ के अधीन कर दिया जाता है। ऐसे मामलों में अधिकारियों को अपनी निष्पक्ष व वस्तुनिष्ठ भूमिका तथा व्यक्तिगत या राजनीतिक दबावों के बीच टकराव का सामना करना पड़ता है।
- इससे निर्णय-प्रक्रिया प्रभावित होती है और शासन में नैतिक निष्पक्षता क्षीण होती है।
- सार्वजनिक हित का समझौता: कमज़ोर कार्य-इतिहास और ऊँची बोली लगाने वाली कंपनियों को ठेका देना निम्नस्तरीय अवसंरचना, बढ़ी हुई लागत और परियोजना में देरी जैसी समस्याओं को उत्पन्न करता है।
- अंततः नागरिकों को असुरक्षित सड़कों, घटिया निर्माण कार्यों और सार्वजनिक धन के दुरुपयोग के रूप में इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। विकास के लिये निर्धारित सार्वजनिक संसाधन इस प्रकार व्यर्थ चले जाते हैं।
- मौन के माध्यम से नैतिक सहभागिता और भ्रष्टाचार का सामान्यीकरण: ‘प्रणाली के अनुसार चलने’ की सलाह यह संकेत देती है कि संगठन में अनैतिक व्यवहार एक सामान्य प्रक्रिया बन चुका है। ऐसी स्थितियों में चुप रहना या निष्क्रिय सहमति देना ईमानदार अधिकारियों को भी गलत आचरण में नैतिक रूप से शामिल कर देता है।
- समय के साथ ऐसी स्वीकारोक्ति पेशेवर नैतिकता को कमज़ोर करती है, भ्रष्टाचार को एक नियमित प्रथा के रूप में बढ़ावा देती है और सत्यनिष्ठा-आधारित निर्णय लेने की संस्कृति को हतोत्साहित करती है।
2. राकेश मेहता द्वारा सामना किये गए नैतिक द्वंद्व
- सत्यनिष्ठा बनाम करियर सुरक्षा: राकेश ईमानदारी से कार्य करने और अपने करियर की सुरक्षा के बीच सीधे संघर्ष का सामना कर रहे हैं। राजनीतिक दबाव का विरोध करने पर तबादला, उपेक्षा या भविष्य के अवसरों से वंचित होने का जोखिम है, जबकि दबाव के आगे झुकना भले ही अल्पकालिक सुरक्षा दे दे, पर उनकी नैतिक सत्यनिष्ठा को स्थायी क्षति पहुँचाता है।
- प्राधिकरण का पालन बनाम विधि का शासन: एक सरकारी अधिकारी के रूप में राकेश से वरिष्ठों के निर्देशों का पालन अपेक्षित है। लेकिन जब ये निर्देश निविदा नियमों और खरीद-प्रक्रिया कानूनों का उल्लंघन करते हैं तो उन्हें बिना प्रश्न किये आज्ञापालन या वैधानिकता और निष्पक्षता बनाए रखने के अपने संवैधानिक दायित्व के बीच चुनाव करना पड़ता है।
- व्यक्तिगत नैतिकता बनाम प्रणालीगत भ्रष्टाचार: भ्रष्टाचार संस्थागत रूप ले चुका प्रतीत होता है, जहाँ सहकर्मी उन्हें ‘प्रणाली के अनुसार चलने’ की सलाह दे रहे हैं। ऐसे माहौल को चुनौती देना राकेश को दरकिनार कर सकता है, जबकि इसके अनुरूप चलना उन्हें अनैतिक शासन का सक्रिय सहभागी बना देगा।
- अल्पकालिक सुविधा बनाम दीर्घकालिक सार्वजनिक हित: अनियमितताओं को अनदेखा करना तात्कालिक राहत और स्थिरता दे सकता है, लेकिन दीर्घावधि में यह खराब अवसंरचना, वित्तीय हानि तथा शासन के प्रति जनता के विश्वास में गिरावट जैसे गंभीर परिणाम उत्पन्न करता है।
- व्यावसायिक उत्तरदायित्व बनाम नैतिक साहस: नैतिक रुख अपनाने के लिये साहस और धैर्य की आवश्यकता होती है, विशेषकर तब जब पहले के अधिकारियों को विरोध के कारण दंडात्मक तबादलों का सामना करना पड़ा हो। राकेश को यह तय करना है कि वे केवल नियमों का पालन करने वाले अधिकारी बनकर रहें या एक नैतिक रूप से उत्तरदायी लोकसेवक की तरह कार्य करें।
3. राकेश मेहता के लिये सबसे उपयुक्त कार्यवाही
- संवैधानिक और व्यावसायिक दायित्व का पालन: राकेश को यह समझना चाहिये कि एक लोकसेवक के रूप में उनकी प्राथमिक ज़िम्मेदारी सार्वजनिक हित, पारदर्शिता और स्वच्छ शासन के प्रति है, न कि व्यक्तिगत करियर सुरक्षा के प्रति। मौन रहना नैतिक समझौता करने और दायित्वों के निर्वहन में कमी के समान होगा।
- आपत्तियों को औपचारिक रूप से दर्ज करना और निर्धारित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करना: सीमित करने वाले पात्रता मानदंडों, अधिक बोली मूल्य और पसंदीदा ठेकेदार के खराब रिकॉर्ड पर अपनी आपत्तियाँ आधिकारिक फाइलों में दर्ज करें।
- मानक खरीद-प्रक्रिया नियमों से किसी भी विचलन के लिये लिखित औचित्य की मांग करें।
- सुनिश्चित करें कि टेंडर मूल्यांकन वस्तुनिष्ठ और नियम-आधारित मानकों पर किया जाए।
- यह संस्थागत रिकॉर्ड तैयार करता है और भविष्य में संभावित उत्तरदायित्व से उनकी रक्षा करता है।
- पदानुक्रमित चैनलों के माध्यम से आंतरिक निवारण की मांग: मामले को उचित प्रक्रिया के तहत मुख्य अभियंता/प्रमुख सचिव (लोक निर्माण विभाग) तक पहुँचाएँ।
- यदि उल्लंघन स्पष्ट हों तो निविदा शर्तों की पुनर्समीक्षा या पुनः-निविदा का अनुरोध करें।
- यदि अनियमित निर्णयों को स्वीकृति देने का दबाव डाला जाए तो लिखित निर्देश प्राप्त करें।
- यह प्रणाली के प्रति निष्ठा दर्शाता है, जबकि अनैतिक प्रथाओं का विरोध भी सुनिश्चित करता है।
- सतर्कता और वैधानिक निगरानी तंत्र का उपयोग: यदि आंतरिक व्यवस्था विफल हो जाए तो—
- राज्य सतर्कता आयोग या विभागीय सतर्कता प्रकोष्ठ से संपर्क करें।
- वित्तीय और सेवा आचरण नियमों के तहत इस मुद्दे को ऑडिट जाँच हेतु चिह्नित करें।
- उपलब्ध व्हिसल ब्लोअर प्रावधानों के तहत संरक्षण की मांग करें।
- इससे मामला व्यक्तिगत प्रतिरोध नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही का विषय बन जाता है।
- पारदर्शिता और निष्पक्ष प्रतिस्पर्द्धा को बढ़ावा देना: ई-प्रोक्योरमेंट प्लेटफॉर्म, निविदा मानदंडों का सार्वजनिक प्रकटीकरण और तृतीय-पक्ष गुणवत्ता ऑडिट की अनुशंसा करें।
- ठेकेदारों के प्रदर्शन-आधारित मूल्यांकन का समर्थन करें ताकि घटिया सार्वजनिक कार्य रोके जा सकें।
- यह तत्काल और प्रणालीगत दोनों स्तरों पर सुशासन को सशक्त बनाता है।
- नैतिक दृढ़ता और व्यावसायिक सत्यनिष्ठा बनाए रखना: दृढ़ लेकिन शिष्ट बने रहें और अनावश्यक टकराव या राजनीति से बचें।
- संभावित प्रतिकूल करियर परिणामों को नैतिक साहस के साथ स्वीकारें, यह जानते हुए कि सही आचरण से दीर्घकालिक विश्वसनीयता और सार्वजनिक विश्वास सुनिश्चित होता है।
दीर्घकालिक निवारक उपाय
- पारदर्शी और प्रौद्योगिकी-संचालित खरीद प्रणाली को बढ़ावा देना: ई-टेंडरिंग, ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल, सार्वजनिक रूप से उपलब्ध बोली दस्तावेज़ और डिजिटल मूल्यांकन रिकॉर्ड का व्यापक उपयोग मानव हस्तक्षेप तथा हेरफेर की संभावनाओं को कम करता है।
- स्वतंत्र तकनीकी मूल्यांकन समितियाँ और अनिवार्य तृतीय-पक्ष ऑडिट निष्पक्षता सुनिश्चित करते हैं तथा सार्वजनिक धन के मूल्य की रक्षा करते हैं।
- सार्वजनिक जवाबदेही और मीडिया निगरानी को सशक्त बनाना: निविदा विवरण, अनुबंध आवंटन और परियोजनाओं की प्रगति का सक्रिय सार्वजनिक प्रकटीकरण डैशबोर्ड जैसे साधनों के माध्यम से नागरिक पर्यवेक्षण को सक्षम बनाता है। मीडिया जाँच और सामाजिक अंकेक्षण भ्रष्ट प्रथाओं के विरुद्ध बाह्य अवरोधक के रूप में कार्य करते हैं।
- मज़बूत आंतरिक सतर्कता तंत्र का संस्थानीकरण: सशक्त सतर्कता प्रकोष्ठ, नियमित आंतरिक लेखा-परीक्षा और आकस्मिक निरीक्षण प्रारंभिक स्तर पर अनियमितताओं का पता लगाने में सहायता करते हैं। ऑडिट आपत्तियों पर समयबद्ध कार्रवाई जवाबदेही को सुदृढ़ करती है।
- स्पष्ट हितों के टकराव संबंधी नियम: हितों की अनिवार्य घोषणा और उल्लंघनों पर कठोर दंड से निविदा निर्णयों पर अनधिकृत प्रभाव को रोका जा सकता है, जिससे संस्थागत निष्पक्षता को बढ़ावा मिलता है।
निष्कर्ष:
सार्वजनिक खरीद में भ्रष्टाचार नैतिक प्रशासन की बुनियाद को कमज़ोर करता है, क्योंकि यह सार्वजनिक संसाधनों को विकास और जनकल्याण जैसे वास्तविक उद्देश्यों से दूर कर देता है। दबावों के बावजूद सत्यनिष्ठा, पारदर्शिता और जवाबदेही को बनाए रखना ही वास्तविक लोकसेवा की पहचान है। महात्मा गांधी ने उचित ही कहा है—“जब किसी व्यक्ति के उद्देश्य पर संदेह उत्पन्न हो जाता है तो उसका हर कार्य दूषित दिखने लगता है।” नैतिक साहस, जब सुदृढ़ संस्थाओं के सहयोग से समर्थित हो, तभी सार्वजनिक विश्वास की पुनर्स्थापना और न्यायपूर्ण शासन सुनिश्चित हो सकता है।