• प्रश्न :

    प्रश्न. लोक प्रशासन में शुचिता की कमी सार्वजनिक विश्वास और संस्थागत विश्वसनीयता को कैसे प्रभावित करती है? उपयुक्त उदाहरणों के साथ उत्तर को स्पष्ट कीजिये। (150 शब्द)

    01 Jan, 2026 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत शुचिता की परिभाषा देकर कीजिये।
    • मुख्य भाग में यह तर्क दीजिये कि सार्वजनिक प्रशासन में शुचिता की कमी कैसे सार्वजनिक विश्वास और संस्थागत विश्वसनीयता को प्रभावित करती है।
    • सार्वजनिक जीवन में शुचिता को सुदृढ़ करने के लिये उपायों का सुझाव दीजिये।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    लोक प्रशासन में शुचिता (Probity) का अर्थ है सार्वजनिक शक्ति का प्रयोग करते समय ईमानदारी, पारदर्शिता और नैतिक आचरण बनाए रखना। यह शासन की नैतिक आधारशिला होती है और यह सुनिश्चित करती है कि सार्वजनिक अधिकार नागरिकों के हित में प्रयोग किये जाएँ। जब शुचिता की अवहेलना होती है तो यह नागरिकों के विश्वास को कमज़ोर करती है, संस्थानों की स्थिरता को घटाती है और लोकतांत्रिक वैधता को नुकसान पहुँचाती है।

    मुख्य भाग:

    लोक विश्वास पर शुचिता की कमी का प्रभाव

    • जनविश्वास का क्षरण: जब भ्रष्टाचार, पक्षपात या अधिकार का दुरुपयोग सामान्य हो जाता है तो नागरिक सरकार और संस्थाओं में विश्वास खो देते हैं।
      • उदाहरण के लिये, 2G स्पेक्ट्रम मामला या कोयला आवंटन में अनियमितताएँ इस धारणा को जन्म देती हैं कि सार्वजनिक संसाधनों का निजी लाभ के लिये दुरुपयोग किया जा रहा है, जिससे शासन में विश्वास कमज़ोर होता है।
    • असमानता और अन्याय की धारणा: शुचिता के अभाव से नागरिकों के प्रति असमान व्यवहार उत्पन्न होता है, जहाँ प्रभाव और व्यक्तिगत संबंध योग्यता एवं निष्पक्षता पर हावी हो जाते हैं।
      • यह विशेष रूप से हाशिये पर रहने वाले समूहों में अन्याय और अलगाव की भावना उत्पन्न करता है, जो सार्वजनिक सेवाओं पर सबसे अधिक निर्भर होते हैं।
    • नागरिक सहभागिता में गिरावट: जब लोग मानते हैं कि संस्थाएँ भ्रष्ट या उत्तरदायी नहीं हैं तो वे मतदान, सार्वजनिक परामर्श या शिकायत निवारण जैसी नागरिक प्रक्रियाओं से अलग हो जाते हैं, जिससे लोकतांत्रिक सहभागिता कमज़ोर होती है।

    संस्थागत विश्वसनीयता और शासन पर शुचिता की कमी का प्रभाव

    • संस्थागत ईमानदारी का क्षरण: बार-बार नैतिक विफलताएँ सार्वजनिक संस्थाओं की विश्वसनीयता को नुकसान पहुँचाती हैं, जैसे कि नियामक संस्थाएँ, कानून प्रवर्तन एजेंसियाँ और स्थानीय प्रशासन।
      • उदाहरण के लिये, शहरी नियोजन और सेवा वितरण में कुप्रबंधन प्राय: कमज़ोर बुनियादी ढाँचे और नागरिक असंतोष का कारण बनता है।
        • एक बार विश्वास खो जाने पर ईमानदार कार्यों को भी संदेह की दृष्टि से देखा जाता है।
    • नीतियों का अक्षम क्रियान्वयन: शुचिता के अभाव में प्राय: कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन में रिसाव, विलंब और अक्षमता उत्पन्न होती है।
      • उदाहरण के लिये, सार्वजनिक वितरण प्रणाली या अवसंरचना परियोजनाओं में भ्रष्टाचार उनकी प्रभावशीलता को घटाता है और लागत बढ़ा देता है।
    • कानून की कमज़ोर शासन प्रणाली: जब नियमों को व्यक्तिगत लाभ के लिये चयनात्मक रूप से लागू किया जाता है या उनका दुरुपयोग किया जाता है तो यह कानून के शासन को कमज़ोर करता है और अपराधियों को दंड से मुक्ति का माहौल प्रदान करता है, जहाँ जवाबदेही अपवाद बन जाती है, नियम नहीं।

    सार्वजनिक जीवन में शुचिता सुदृढ़ करने के उपाय

    • नैतिक ढाँचे को सुदृढ़ करना: सुदृढ़ नैतिक ढाँचा स्वच्छ और उत्तरदायी शासन का आधार है।
      • स्पष्ट आचार संहिता, अनिवार्य संपत्ति विवरण और कठोर हित संघर्ष नियम यह सुनिश्चित करने में सहायक होते हैं कि सार्वजनिक अधिकारी निजी लाभ के बजाय जनता के हित में निर्णय लें।
      • नियमित नैतिकता प्रशिक्षण और उल्लंघनों के लिये स्पष्ट परिणाम एक ऐसी संस्कृति बनाते हैं जहाँ शुचिता का मूल्य समझा जाता है तथा अनुचित आचरण को हतोत्साहित किया जाता है। जब नियम समान रूप से लागू किये जाते हैं तो नागरिकों में विश्वास उत्पन्न होता है कि शासन निष्पक्ष और न्यायपूर्ण है।
    • पारदर्शिता और जवाबदेही तंत्र को सुदृढ़ करना: पारदर्शिता नागरिकों का विश्वास पुनर्निर्माण करने के लिये अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।
      • सेवा वितरण, खरीदारी और शिकायत निवारण के लिये  ऑनलाइन पोर्टल जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म का उपयोग मानव विवेक तथा भ्रष्टाचार को कम करता है। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम, सामाजिक अंकेक्षण और स्वतंत्र सतर्कता निकाय जैसे साधन नागरिकों को सरकारी कार्रवाइयों की निगरानी करने तथा जवाबदेही की मांग करने में सक्षम बनाते हैं।
      • जब जानकारी सुलभ होती है और निर्णय लेने की प्रक्रिया पारदर्शी होती है तो संस्थाएँ अधिक उत्तरदायी एवं विश्वसनीय बनती हैं।
    • सभी स्तरों पर नैतिक नेतृत्व को प्रोत्साहित करना: ईमानदारी, विनम्रता और जवाबदेही प्रदर्शित करने वाले नेता प्रशासनिक प्रणाली के लिये प्रभावशाली उदाहरण स्थापित करते हैं।
      • नैतिक नेतृत्व पारदर्शिता को बढ़ावा देता है, शक्ति के दुरुपयोग को रोकता है और संस्थाओं के भीतर विश्वास की संस्कृति का निर्माण करता है। जब वरिष्ठ अधिकारी उदाहरण पेश करके नेतृत्व करते हैं तो नैतिक आचरण एक साझा मानक बन जाता है, बजाय इसके कि यह केवल एक लागू किया गया नियम हो।
    • नागरिक सहभागिता और निगरानी को प्रोत्साहित करना: जन-सलाहकारियों, शिकायत निवारण मंचों और सामाजिक अंकेक्षण के माध्यम से सक्रिय नागरिक सहभागिता लोकतांत्रिक जवाबदेही को मज़बूत करती है।
      • जब नागरिकों को सुना और शामिल किया जाता है तो संस्थाओं में विश्वास बढ़ता है और शासन वास्तविक आवश्यकताओं के प्रति अधिक उत्तरदायी हो जाता है।
    • ईमानदारी की संस्कृति का निर्माण: नियमों और विनियमों से परे दीर्घकालिक विश्वास ईमानदारी, निष्पक्षता तथा ज़िम्मेदारी जैसे मूल्यों को सार्वजनिक संस्थाओं में विकसित करने पर निर्भर करता है।
      • निरंतर प्रशिक्षण, नैतिक मार्गदर्शन और ईमानदारी-आधारित प्रदर्शन की पहचान इन मूल्यों को दैनिक प्रशासनिक अभ्यास में स्थापित करने में सहायता कर सकती है।

    निष्कर्ष:

    शुचिता की कमी जनविश्वास को कमज़ोर करती है और संस्थागत आधार को क्षीण करती है, जिससे शासन की वैधता ही खतरे में पड़ जाती है। पारदर्शिता, जवाबदेही और नैतिक नेतृत्व के माध्यम से शुचिता को पुनर्स्थापित करना नागरिकों के विश्वास को बहाल करने तथा प्रभावी, जनता-केंद्रित प्रशासन सुनिश्चित करने के लिये अत्यंत आवश्यक है।