• प्रश्न :

    प्रश्न. राजकोषीय समेकन और विकास को प्रोत्साहन प्रायः भारत जैसे विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के लिये एक नीतिगत दुविधा उत्पन्न करते हैं। भारत किस प्रकार राजकोषीय अनुशासन को बनाए रखते हुए अवसंरचना और सामाजिक क्षेत्रों में सार्वजनिक निवेश की आवश्यकता के साथ संतुलन स्थापित कर सकता है, इस पर चर्चा कीजिये। (250 शब्द)

    31 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 3 अर्थव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • उत्तर की शुरुआत हाल के राजकोषीय प्रबंधन के रुझानों के संदर्भ के साथ कीजिये।
    • मुख्य भाग में नीतिगत दुविधा को संक्षेप में स्पष्ट करते हुए यह तर्क प्रस्तुत कीजिये कि राजकोषीय अनुशासन क्यों अनिवार्य है।
    • इसके पश्चात सार्वजनिक निवेश की आवश्यकता की चर्चा कीजिये ।
    • दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने के लिये उपयुक्त उपाय सुझाएँ।
    • तद्नुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    भारत के समक्ष राजकोषीय समेकन और विकासोन्मुखी व्यय के बीच संतुलन बनाए रखने की चुनौती है। केंद्रीय बजट 2025–26 में राजकोषीय घाटे को सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के 4.4% तक कम करने का लक्ष्य रखा गया है।

    राजस्व और प्राथमिक घाटे में यह गिरावट बेहतर राजकोषीय अनुशासन को दर्शाती है। साथ ही निरंतर सार्वजनिक निवेश और वर्ष 2030–31 तक सार्वजनिक ऋण को GDP के लगभग 50% तक कम करने की योजना का उद्देश्य दीर्घकालिक विकास तथा  स्थिरता को समर्थन देना है।

    मुख्य भाग:

    नीतिगत दुविधा

    • विकास की अनिवार्यता: भारत को अपने जनसांख्यिकीय लाभांश का समुचित उपयोग करने के लिये 7–8% की निरंतर आर्थिक वृद्धि की आवश्यकता है। इसके लिये अवसंरचना (विशेषकर लॉजिस्टिक्स) तथा सामाजिक क्षेत्रों (स्वास्थ्य और शिक्षा) में बड़े पैमाने पर सार्वजनिक व्यय अनिवार्य है।
    • राजकोषीय बाध्यता: अत्यधिक व्यय से उच्च राजकोषीय घाटा उत्पन्न होता है, जिसके परिणामस्वरूप निम्नलिखित समस्याएँ सामने आ सकती हैं—
      • क्राउडिंग आउट: सरकार द्वारा अधिक उधारी लेने से निजी क्षेत्र के लिये ब्याज दरें बढ़ जाती हैं।
      • मुद्रास्फीति: आपूर्ति-पक्ष में समान वृद्धि के बिना धन आपूर्ति बढ़ने से महँगाई का दबाव बढ़ता है।
      • ऋण स्थिरता पर खतरा: ‘ऋण-जाल’ की स्थिति, जहाँ सरकारी राजस्व का बड़ा हिस्सा ब्याज भुगतान में ही खर्च हो जाता है

    राजकोषीय अनुशासन क्यों आवश्यक है:

    • समष्टि-आर्थिक स्थिरता: उच्च राजकोषीय घाटा मुद्रास्फीति के दबाव को बढ़ाता है, ब्याज दरों में वृद्धि करता है तथा निजी निवेश के लिये संसाधनों की उपलब्धता को सीमित करता है। (क्राउडिंग आउट)।
    • निवेशक विश्वास एवं क्रेडिट रेटिंग: राजकोषीय अनुशासन वैश्विक निवेशकों और रेटिंग एजेंसियों के बीच भारत की विश्वसनीयता को सुदृढ़ करता है, जिससे स्थिर पूंजी प्रवाह आकर्षित होता है तथा ऋण की लागत घटती है।
      • उदाहरणस्वरूप, 2024 में S&P ग्लोबल रेटिंग्स ने भारत की संप्रभु रेटिंग आउटलुक को ‘स्थिर’ से बढ़ाकर ‘सकारात्मक’ किया।
      • एक पूर्वानुमेय राजकोषीय मार्ग भारत के आर्थिक प्रबंधन में विश्वास को मज़बूत करता है।
    • अंतर-पीढ़ीगत न्याय: अत्यधिक ऋण से आज का वित्तीय बोझ भविष्य की पीढ़ियों पर स्थानांतरित हो जाता है। सार्वजनिक ऋण में कमी से समय के साथ न्यायसंगत और सतत विकास सुनिश्चित होता है।

    सार्वजनिक निवेश क्यों महत्त्वपूर्ण है?

    • अवसंरचना-आधारित विकास: सड़कों, रेल, बंदरगाहों और डिजिटल अवसंरचना पर सार्वजनिक पूंजीगत व्यय का उच्च गुणक प्रभाव होता है।
      • पूंजीगत व्यय का आर्थिक प्रभाव अत्यधिक व्यापक होता है। निवेश किये गए प्रत्येक ₹1 से अर्थव्यवस्था में ₹2.5 से ₹3.5 तक का अतिरिक्त उत्पादन संभव है, जो न केवल विकास को गति देता है बल्कि निजी क्षेत्र के निवेश के लिये भी अनुकूल अवसर पैदा करता है।
    • समावेशी विकास के लिये सामाजिक क्षेत्र में निवेश: स्वास्थ्य, शिक्षा, पोषण और सामाजिक सुरक्षा में निवेश मानव पूंजी को सुधारता है, असमानता को कम करता है तथा दीर्घकालिक उत्पादकता का समर्थन करता है।
      • यह व्यय सतत विकास लक्ष्यों SDG 1 (गरीबी उन्मूलन), SDG 3 (स्वास्थ्य), SDG 4 (शिक्षा) और SDG 10 (असमानता में कमी) के अनुरूप है।
    • राज्य की प्रत्यावर्ती भूमिका: आर्थिक मंदी के दौरान सरकारी व्यय मांग और रोज़गार को स्थिर बनाए रखता है।
      • COVID-19 के बाद की राजकोषीय सहायता ने विकास को गति देने में सहायता की, यह दर्शाते हुए कि संकट के समय सार्वजनिक व्यय एक आर्थिक आघात अवशोषक तंत्र के रूप में अत्यंत महत्त्वपूर्ण होता है।

    विकास आवश्यकताओं के साथ वित्तीय अनुशासन का संतुलन

    • व्यय की गुणवत्ता को प्राथमिकता देना: राजस्व-केंद्रित सब्सिडी से उत्पादक पूंजीगत व्यय की ओर बदलाव बेहतर विकास परिणाम सुनिश्चित करता है।
    • राजस्व सृजन को बढ़ाना: GST में सुधार, अनुपालन को सुदृढ़ करना और अर्थव्यवस्था को औपचारिक रूप देना कर आधार का विस्तार करता है, जिससे कर दर बढ़ाए बिना राजस्व में वृद्धि की जा सकती है।
    • संपत्ति का मुद्रीकरण और सार्वजनिक–निजी भागीदारी (PPP): कम उपयोग किये जा रहे सार्वजनिक संसाधनों का मुद्रीकरण और PPP के माध्यम से निजी पूंजी का उपयोग करने से अत्यधिक वित्तीय बोझ के बिना अवसंरचना को वित्तपोषित किया जा सकता है।
    • लक्षित और प्रभावी सब्सिडी: प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (DBT) और प्रौद्योगिकी-आधारित लक्षित वितरण प्रणालियों ने न केवल वित्तीय 'लीकेज' को न्यूनतम किया है, बल्कि प्रशासनिक दक्षता में भी वृद्धि की है, जिससे उत्पादक निवेश के लिये वित्तीय स्थान तैयार होता है।  
    • मध्यम अवधि के वित्तीय ढाँचे: FRBM समीक्षा समिति द्वारा सुझाए गए पारदर्शी और विश्वसनीय मध्यम अवधि के वित्तीय रोडमैप का पालन करने से संकलन तथा विकास आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाए रखना संभव होता है।

    निष्कर्ष:

    भारत की चुनौती राजकोषीय अनुशासन और विकास में से किसी एक को चुनने की नहीं, बल्कि स्मार्ट सार्वजनिक व्यय तथा कुशल संसाधन प्रबंधन के माध्यम से दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने की है। दीर्घकालिक नियोजन और संरचनात्मक सुधारों से प्रेरित यह दृष्टिकोण ही समावेशी आर्थिक भविष्य सुनिश्चित करने की कुंजी है।