• प्रश्न :

    प्रश्न 2. समकालीन भारतीय समाज में संचार के स्वरूप, जन-संगठन (मोबिलाइज़ेशन) तथा पहचान-निर्माण की प्रक्रियाओं को सोशल मीडिया ने किस प्रकार रूपांतरित किया है, चर्चा कीजिये। (150 शब्द)

    29 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भारतीय समाज

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • सोशल मीडिया के प्रभाव को उजागर करते हुए अपने उत्तर की शुरुआत कीजिये।
    • समकालीन भारतीय समाज में सोशल मीडिया द्वारा किये गए परिवर्तनों पर चर्चा कीजिये।
    • तदनुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    सोशल मीडिया समकालीन भारतीय समाज को आकार देने वाली सबसे प्रभावशाली शक्तियों में से एक के रूप में उभरा है। स्मार्टफोन के व्यापक एक्सेस और किफायती इंटरनेट के कारण डिजिटल प्लेटफॉर्म ने लोगों के संवाद करने, संगठित होने और सामाजिक पहचान गढ़ने के तरीकों को मूलतः रूपांतरित कर दिया है। राजनीतिक सहभागिता से लेकर सांस्कृतिक अभिव्यक्ति तक, सोशल मीडिया ने भारत में सार्वजनिक विमर्श और सामाजिक संपर्क की प्रकृति को पुनर्परिभाषित किया है।

    संप्रेषण के पैटर्न में परिवर्तन:

    • अभिव्यक्ति का लोकतंत्रीकरण: X (Twitter), Instagram और YouTube जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने साधारण नागरिकों को मीडिया संस्थानों या राजनीतिक अभिजात वर्ग जैसे पारंपरिक मध्यस्थों के बिना अपने विचार व्यक्त करने का अवसर दिया है। इससे सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार हुआ है तथा उपेक्षित समूह की आवाज़ों को अधिक प्रतिध्वनि मिली है।
      • इससे सार्वजनिक क्षेत्र का विस्तार हुआ है तथा उपेक्षित समूह की आवाज़ों को अधिक प्रतिध्वनि मिली है।
    • त्वरित और इंटरैक्टिव संचार: अब सूचना वास्तविक समय में प्रसारित होती है, जिससे चुनाव, विरोध प्रदर्शन या आपदा जैसी घटनाओं पर त्वरित प्रतिक्रियाएँ संभव हो पाती हैं। 
    • शशि थरूर जैसे राजनेता ‘Instagram Live’ और ‘X Spaces’ के माध्यम से युवाओं के प्रश्नों का सीधे उत्तर देते हैं, जिससे राजनीतिक प्रक्रिया संस्थागत के बजाय व्यक्तिगत प्रतीत होने लगती है।
      • नेताओं और नागरिकों के बीच दोतरफा संचार ने एकतरफा सूचना प्रवाह का स्थान ले लिया है।
      • शशि थरूर जैसे राजनेता युवाओं के सवालों का सीधे जवाब देने के लिये इंस्टाग्राम लाइव और एक्स स्पेसेस का इस्तेमाल करते हैं, जिससे राजनीतिक प्रक्रिया संस्थागत होने के बजाय व्यक्तिगत प्रतीत होती है।  
    • वैकल्पिक मीडिया क्षेत्रों का उदय: स्वतंत्र पत्रकार, इन्फ्लूएंसर्स और नागरिक संवाददाताओं का भी उदय हुआ है, जो मुख्यधारा के नैरेटिव को चुनौती देते हुए सूचना के स्रोतों में विविधता लाते हैं, हालाँकि कभी-कभी इसकी कीमत विश्वसनीयता एवं सत्यापन के स्तर पर चुकानी पड़ती है।
      • नीतीश राजपूत जैसे रचनाकार जटिल नीतिगत मुद्दों को सरल बनाने के लिये रचनात्मक अभिव्यक्ति का उपयोग करते हैं, जिससे डिजिटल-प्रथम पीढ़ी के लिये एक नई एड्यूटेनमेंट श्रेणी का निर्माण होता है।

    संगठन और सामूहिक कार्रवाई में परिवर्तन:

    • डिजिटल लामबंदी और सक्रियता: सोशल मीडिया विरोध प्रदर्शनों, अभियानों और सामाजिक आंदोलनों जैसे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलनों, किसानों के विरोध प्रदर्शनों एवं महिला अधिकार अभियानों को संगठित करने का एक प्रमुख साधन बन गया है। 
      • हैशटैग और ऑनलाइन अभियान विभिन्न क्षेत्रों में तीव्रता से समर्थन जुटाने में सहायता करते हैं।
      • #JusticeForNirbhaya और #JusticeForSSR आंदोलनों ने दिखाया कि डिजिटल शोक किस प्रकार शीघ्र ही सड़क पर उतरने वाले विरोध-प्रदर्शनों में परिवर्तित हो सकता है।
    • भागीदारी की बाधाओं में कमी: जो वर्ग पहले औपचारिक राजनीतिक प्रक्रियाओं से बाहर थे— जैसे: युवा, महिलाएँ और उपेक्षित समुदाय, न्यूनतम संसाधनों के साथ सक्रियता में शामिल हो सकते हैं।   
    • विचारों और प्रति-विमर्श का तीव्र प्रसार: जहाँ एक ओर सोशल मीडिया संगठन को सक्षम बनाता है, वहीं दूसरी ओर यह प्रति-कथाओं, गलत सूचना और ध्रुवीकरण का भी तेज़ी से प्रसार करता है, जिससे सामाजिक तनाव बढ़ सकता है।
      •  व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी की परिघटना— जिसमें अप्रमाणित स्वास्थ्य या राजनीतिक दावे का संचार होता है, ने सरकार को सामाजिक अशांति रोकने हेतु तथ्य-जाँच इकाइयाँ स्थापित करने के लिये विवश किया है।

    पहचान निर्माण में परिवर्तन:

    • डिजिटल पहचान का निर्माण: सोशल मीडिया व्यक्तियों को भाषा, विचारधारा, पेशे, जाति, लिंग या क्षेत्रीय संबद्धता के आधार पर पहचान बनाने में सहायता करता है, जिससे स्व-धारणा और दूसरों के प्रति धारणा दोनों में परिवर्तन आता है।
    • सामूहिक पहचानों का सुदृढ़ीकरण: ऑनलाइन प्लेटफॉर्म समूह की पहचानों (राजनीतिक, धार्मिक या सांस्कृतिक) को सुदृढ़ करते हैं, प्रायः ऐसे इको- चैंबर्स बनाते हैं जो समूह के भीतर एकजुटता को मज़बूत करते हैं, लेकिन सामाजिक सामंजस्य को कमज़ोर करते हैं।
      • यह प्रवृत्ति स्प्लिंटरनेट के उदय से और भी गहरी हो गई है, जहाँ राज्य-संचालित नियंत्रणों एवं सेंसरशिप— जैसे कि चीन की ग्रेट फायरवॉल के कारण खंडित डिजिटल स्पेस उभरते हैं, जो अंतर-सांस्कृतिक संवाद को सीमित करते हैं तथा संकुचित विश्वदृष्टियों को मज़बूत करते हैं।
    • परंपरा और आधुनिकता का सामंजस्य: डिजिटल क्षेत्र ऐसे मंच बन गए हैं, जहाँ पारंपरिक मानदंडों पर सवाल उठाए जाते हैं और उनकी पुनर्व्याख्या की जाती है, विशेष रूप से युवाओं एवं महिलाओं द्वारा, जिससे सामाजिक मूल्यों एवं आकांक्षाओं का विकास होता है।

    निष्कर्ष: 

    सोशल मीडिया ने सहभागिता का विस्तार करते हुए और सार्वजनिक विमर्श को नया रूप देकर समकालीन भारत में संचार, संगठन और पहचान को मूल रूप से रूपांतरित कर दिया है। हालाँकि, इसकी परिवर्तनकारी शक्ति को जिम्मेदार शासन, डिजिटल साक्षरता और नैतिक प्रतिबद्धता के साथ संतुलित करना आवश्यक है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह समाज को खंडित करने के बजाय लोकतंत्र को मज़बूत करे।