• प्रश्न :

    प्रश्न. खाद्य प्रसंस्करण और कृषि-आधारित उद्योग भारत को कृषि-निर्भर अर्थव्यवस्था से विनिर्माण-नेतृत्व वाली अर्थव्यवस्था में रूपांतरित करने में किस प्रकार सहायक हो सकते हैं? (250 शब्द)

    24 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 3 अर्थव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि की वर्तमान स्थिति को रेखांकित करते हुए उत्तर की शुरुआत कीजिये।
    • मुख्य भाग में तर्क दीजिये कि यह क्षेत्र आर्थिक विकास के लिये क्यों महत्त्वपूर्ण है।
    • इसकी संभावनाओं को बाधित करने वाली चुनौतियों को सूचीबद्ध कीजिये।
    • इन चुनौतियों से निपटने के लिये उपाय प्रस्तावित कीजिये।
    • उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    भारत का लगभग 45% कार्यबल कृषि क्षेत्र में कार्यरत है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इसका योगदान मात्र 18% है, जो कम उत्पादकता और अप्रत्यक्ष बेरोज़गारी को दर्शाता है। इसके विपरीत, विनिर्माण क्षेत्र, विशेष रूप से खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित उद्योग, अतिरिक्त श्रम को समायोजित करने, मूल्य संवर्द्धन को बढ़ाने एवं संरचनात्मक परिवर्तन को गति देने का एक महत्त्वपूर्ण मार्ग प्रदान करते हैं। 

    • इस क्षेत्र को मज़बूत करने से कृषि और उद्योग के बीच के अंतराल को न्यूनतम किया जा सकता है, जिससे भारत को विनिर्माण-आधारित अर्थव्यवस्था में परिवर्तित होने में सहायता मिलेगी।

    मुख्य भाग: 

    संरचनात्मक आर्थिक परिवर्तन को गति देने में खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित उद्योगों की भूमिका

    • किसानों के लिये मूल्यवर्द्धन और आय वृद्धि: खाद्य प्रसंस्करण से फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान (ICAR के अनुसार सालाना ₹92,000 करोड़ का अनुमानित नुकसान) को कम किया जा सकता है, क्योंकि इससे नाशवान उपज को उच्च मूल्य वाले उत्पादों में परिवर्तित किया जा सकता है।
      • उदाहरण: आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र में टमाटर प्रसंस्करण इकाइयों ने संविदा कृषि और सुनिश्चित खरीद के माध्यम से किसानों की आय को स्थिर किया है।
    • कृषि से परे रोज़गार सृजन: कृषि-प्रसंस्करण श्रम-प्रधान है तथा भंडारण, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और विपणन में ग्रामीण क्षेत्रों के अतिरिक्त श्रम को रोज़गार प्रदान कर सकता है।
      • खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र संगठित विनिर्माण क्षेत्र में रोज़गार का 12.41% योगदान देता है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं एवं युवाओं के रोज़गार की प्रबल संभावना है।
    • विनिर्माण उत्पादन और निर्यात को बढ़ावा: प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों का निर्यात (तैयार भोजन, समुद्री उत्पाद, डेयरी उत्पाद) कच्चे कृषि उत्पादों के निर्यात की तुलना में तेज़ी से बढ़ रहा है।
      • खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के लिये उत्पादन-संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) और PM-FME जैसी योजनाएँ MSME को मूल्यवर्द्धित उत्पादन बढ़ाने के लिये प्रोत्साहित कर रही हैं।
    • ग्रामीण औद्योगीकरण और आपूर्ति शृंखलाओं को मज़बूत बनाना: फूड पार्क, शीत शृंखलाओं (कोल्ड चेन) और कृषि-लॉजिस्टिक्स का विकास किसानों को बाज़ारों से जोड़ता है और मध्यवर्तियों की भूमिका को कम करता है।
      • मेगा फूड पार्क्स क्लस्टर-आधारित औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करते हैं, जो कृषि उत्पादों को वैश्विक बाज़ारों तक पहुँचाते हैं।
    • संबद्ध क्षेत्रों और नवाचार के लिये उत्प्रेरक: खाद्य प्रसंस्करण के विकास से पैकेजिंग, कोल्ड स्टोरेज, परिवहन और कृषि-तकनीक समाधानों की मांग को बढ़ावा मिलता है।
      • खाद्य प्रसंस्करण, ट्रेसबिलिटी और कृषि मशीनीकरण के क्षेत्र में शुरू किये गए उद्यम कृषि के तकनीकी उन्नयन में सहयोग करते हैं।

    परिवर्तनकारी क्षमता को सीमित करने वाली निरंतर चुनौतियाँ

    • अपर्याप्त अधोसंरचना और कोल्ड-चेन की कमियाँ: अपर्याप्त भंडारण, लॉजिस्टिक्स और परिवहन सुविधाएँ फसल कटाई के बाद भारी नुकसान का कारण बनती हैं तथा पैमाने की दक्षता को सीमित करती हैं।
      • उदाहरण के लिये, भारत में केवल 10% नाशवान वस्तुओं को ही कोल्ड चेन में संग्रहित किया जाता है।
    • खंडित आपूर्ति शृंखलाएँ और लघु कृषि क्षेत्र: लघु भू-जोत एवं किसान-उद्योग के बीच कमज़ोर संबंध लगातार गुणवत्ता और बड़े पैमाने पर प्रसंस्करण में बाधा डालते हैं।
      • 86% से अधिक किसान लघु और सीमांत किसान हैं, जिसके कारण बड़े पैमाने पर प्रसंस्करण के लिये उपयुक्त गुणवत्ता एवं मात्रा सुनिश्चित करना कठिन है।
    • वित्त और प्रौद्योगिकी तक सीमित अभिगम्यता: लघु एवं मध्यम उद्यमों को ऋण संबंधी बाधाओं, पुरानी मशीनरी और आधुनिक प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों के अंगीकरण में कमी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
      • कृषि मशीनों का उपयोग चीन और ब्राज़ील की तुलना में लगभग 40-45% कम है।
    • नियामक और नीतिगत अड़चनें: जटिल नियम, विभिन्न राज्य नीतियाँ और अनुपालन संबंधी बोझ निजी निवेश को हतोत्साहित करते हैं।
    • कौशल और क्षमता संबंधी बाधाएँ: खाद्य प्रसंस्करण, गुणवत्ता नियंत्रण और पैकेजिंग में कुशल जनशक्ति की कमी उत्पादकता एवं प्रतिस्पर्द्धात्मकता को कम करती है।

    खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित उद्योगों की पूरी क्षमता को उजागर करने के उपाय

    • भौतिक अवसंरचना और कोल्ड चेन को मज़बूत करना: फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने तथा विशेष रूप से नाशवान वस्तुओं के मामले में खेत से बाज़ार तक निर्बाध संपर्क सुनिश्चित करने के लिये एकीकृत कोल्ड-चेन नेटवर्क, गोदामों और लॉजिस्टिक्स पार्कों का विस्तार किया जाना चाहिये।
    • ऋण और वित्तीय सहायता तक अभिगम्यता बढ़ाना: प्रसंस्करण इकाइयों में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिये लक्षित योजनाओं, ऋण गारंटी और ब्याज सब्सिडी के माध्यम से लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) तथा किसान उत्पादक संगठनों (FPO) के लिये किफायती ऋण तक अभिगम्यता में सुधार किया जाना चाहिये।
    • प्रौद्योगिकी का अंगीकरण और नवाचार को बढ़ावा देना: दक्षता व गुणवत्ता मानकों में सुधार के लिये सब्सिडी, प्रौद्योगिकी अंतरण एवं सार्वजनिक-निजी भागीदारी के माध्यम से आधुनिक प्रसंस्करण प्रौद्योगिकियों, स्वचालन और खाद्य-ग्रेड पैकेजिंग के उपयोग को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
    • कृषि-उद्योग संबंधों को मज़बूत करना: किसानों को सीधे प्रोसेसरों से जोड़ने और आपूर्ति शृंखला के विखंडन को कम करने के लिये अनुबंध कृषि, क्लस्टर-आधारित खाद्य पार्क एवं एकत्रीकरण मॉडल को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
    • नियामक कार्यढाँचों को सरल बनाना और नीतिगत स्थिरता सुनिश्चित करना: लाइसेंसिंग आवश्यकताओं को युक्तिसंगत बनाया जाना चाहिये, खाद्य सुरक्षा मानकों में सामंजस्य स्थापित करना चाहिये तथा दीर्घकालिक निजी निवेश को आकर्षित करने के लिये पूर्वानुमानित नीतियों को सुनिश्चित करना चाहिये।
    • कौशल विकास और कार्यबल प्रशिक्षण: प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना जैसी पहलों के तहत खाद्य प्रसंस्करण, गुणवत्ता नियंत्रण, कोल्ड-चेन प्रबंधन और लॉजिस्टिक्स में विशिष्ट कौशल कार्यक्रमों का विस्तार किया जाना चाहिये।
    • निर्यात उन्मुखीकरण और वैश्विक मानकों को बढ़ावा देना: अंतर्राष्ट्रीय गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों (HACCP, कोडेक्स) के अनुपालन का समर्थन करना चाहिये तथा वैश्विक खाद्य बाज़ारों में भारत की प्रतिस्पर्द्धात्मकता को बढ़ाने के लिये निर्यात अधोसंरचना को मज़बूत करना चाहिये।

    निष्कर्ष:

    सतत विकास लक्ष्य— SDG2 (भुखमरी से मुक्ति) को प्राप्त करने तथा भारत के संरचनात्मक परिवर्तन को गति देने के लिये खाद्य प्रसंस्करण और कृषि आधारित उद्योगों को सुदृढ़ करना आवश्यक है। मूल्यवर्द्धन, निर्यात और ग्रामीण रोज़गार को बढ़ावा देकर, यह क्षेत्र वर्ष 2030 तक कृषि निर्यात में 100 अरब अमेरिकी डॉलर के भारत के लक्ष्य को हासिल करने में सहायक हो सकता है। एक सुदृढ़, समावेशी एवं प्रौद्योगिकी-आधारित कृषि-औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र सतत और लचीले आर्थिक विकास के लिये केंद्रीय भूमिका निभाएगा।