• प्रश्न :

    प्रश्न. “अफ्रीका के साथ भारत की भागीदारी एकजुटता से आगे बढ़कर रणनीतिक साझेदारी की दिशा में बढ़ रही है।” समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिये। (250 शब्द)

    23 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • भारत और अफ्रीका के बीच लंबे ऐतिहासिक संबंधों पर प्रकाश डालते हुए उत्तर लेखन की शुरुआत कीजिये। 
    • पहले दोनों देशों के बीच विकसित हो रही साझेदारी की व्याख्या कीजिये, तत्पश्चात संबंधों में बाधा उत्पन्न करने वाले प्रतिबंधों का परीक्षण कीजिये। 
    • संबंधों को मज़बूत करने के उपाय प्रस्तावित कीजिये। 
    • तदनुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    भारत-अफ्रीका संबंध ऐतिहासिक रूप से उपनिवेशवाद-विरोधी एकजुटता, दक्षिण-दक्षिण सहयोग और नैतिक कूटनीति पर आधारित रहे हैं। हालाँकि, हाल के दशकों में, इस संबंध ने तीव्रता से रणनीतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक आयाम प्राप्त कर लिये हैं, जो प्रतीकात्मकता से वास्तविकता की ओर संक्रमण का संकेत देते हैं।

    मुख्य भाग: 

    विकसित होती रणनीतिक साझेदारी

    • वैचारिक एकजुटता से हित-आधारित सहयोग की ओर परिवर्तन: यद्यपि भारत की अफ्रीका नीति उपनिवेशवाद-विरोधी एकजुटता पर आधारित है, लेकिन आज यह ऊर्जा सुरक्षा, बाज़ार अभिगम्यता, समुद्री स्थिरता और ग्लोबल साउथ के नेतृत्व से प्रेरित है, जो एक स्पष्ट रणनीतिक पुनर्संतुलन को दर्शाता है।
    • व्यापार और निवेश संबंधों का तीव्र विस्तार: वित्त वर्ष 2022-23 में अफ्रीका के साथ भारत का द्विपक्षीय व्यापार 9.26% बढ़कर लगभग 100 अरब डॉलर तक पहुँच गया, जिससे भारत अफ्रीका का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार बन गया है, जिसमें ऊर्जा, दूरसंचार, बैंकिंग एवं विनिर्माण में निवेश बढ़ रहा है।
    • विकास वित्त और क्षमता निर्माण का रणनीतिक उपयोग: भारत की क्रेडिट लाइनें अफ्रीका में अधोसंरचना, कृषि और सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का समर्थन करती हैं, जिससे एकतरफा सहायता के बजाय दीर्घकालिक आर्थिक एवं राजनीतिक संबंध बनते हैं।
      • उदाहरण के लिये, भारत ने कोनाक्री जल आपूर्ति परियोजना के लिये गिनी गणराज्य को 170 मिलियन अमेरिकी डॉलर की ऋण रेखा (LOC) की पेशकश की।
    • रक्षा और समुद्री सहयोग को गहन करना: पश्चिमी हिंद महासागर में संयुक्त नौसैनिक अभ्यास, प्रशिक्षण, जलवैज्ञानिक सर्वेक्षण और समुद्री डकैती विरोधी अभियान नैतिक कूटनीति से परे सुरक्षा हितों के अभिसरण को दर्शाते हैं।
      • अफ्रीका-भारत प्रमुख समुद्री सहयोग समझौता (AIKEYME) जिसमें कई अफ्रीकी नौसेनाएँ शामिल हैं, हिंद महासागर में अंतर-संचालनीयता और क्षेत्रीय सुरक्षा को बढ़ावा देता है।
    • भू-राजनीतिक अभिसरण और बहुपक्षीय समन्वय: अफ्रीकी संघ की G20 सदस्यता (2023) के लिये भारत का समर्थन और वैश्विक शासन में अफ्रीका की सहभागिता के लिये अनुशंसा गठबंधन निर्माण एवं रणनीतिक संरेखण को रेखांकित करती है।

     साझेदारी की पूर्ण क्षमता को सीमित करने वाली बाधाएँ

    • वस्तु-प्रधान व्यापार संरचना: भारत के अफ्रीका से आयात का लगभग 60% कच्चे पेट्रोलियम, सोना और कोयले तक सीमित (एक्ज़िम बैंक ऑफ इंडिया, 2023) है, जिसमें नाइजीरिया, अंगोला और दक्षिण अफ्रीका प्रमुख आपूर्तिकर्त्ता हैं।
      • ITC ट्रेड मैप- 2024 के अनुसार,  अफ्रीका को भारत के निर्यात में फार्मास्यूटिकल्स (12.6%), ऑटोमोबाइल व उसके घटक (10.4%) और परिष्कृत पेट्रोलियम उत्पाद (9.2%) का वर्चस्व है।
      • हालाँकि, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और डिजिटल गवर्नेंस जैसी उच्च मूल्य वाली सेवा निर्यात में प्रबल क्षमता होने के बावजूद उनका पूरी तरह से उपयोग नहीं किया जा रहा है।
    • रणनीतिक उद्देश्य और कार्यान्वयन क्षमता के बीच अंतर: लाइन ऑफ क्रेडिट परियोजनाओं में विलंब, धीमी क्रियान्वयन प्रक्रिया और प्रक्रियात्मक अड़चनें एक विश्वसनीय दीर्घकालिक भागीदार के रूप में भारत की विश्वसनीयता को कमज़ोर करती हैं (उदाहरण के लिये, गिनी में कोनाक्री जल आपूर्ति)।
    • चीन की BRI से असममित प्रतिस्पर्द्धा: बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के तहत चीन की विशाल वित्तीय क्षमता, तीव्र कार्यान्वयन और समन्वित वित्तपोषण मॉडल प्रायः भारत के परामर्श-आधारित लेकिन संसाधन-सीमित दृष्टिकोण पर भारी पड़ते हैं।
      • उदाहरण के लिये, चीन ने रेलवे, बंदरगाहों, राजमार्गों, बिजली संयंत्रों और औद्योगिक पार्कों में भारी निवेश किया है, जैसे कि अदीस अबाबा-जिबूती रेलवे, मोम्बासा-नैरोबी स्टैंडर्ड गेज रेलवे।
    • सीमित निजी क्षेत्र और लघु एवं मध्यम उद्यम भागीदारी: अफ्रीका के साथ भारत की भागीदारी बहुत हद तक राज्य-संचालित बनी हुई है, जिसमें उच्च रसद लागत, कमज़ोर व्यापार वित्त और नियामक जोखिमों के कारण निजी निवेश कम है।
      • केन्या, तंज़ानिया और इथियोपिया जैसे देशों में सस्ती जेनेरिक दवाओं की मज़बूत मांग के बावजूद, भारतीय फार्मा कंपनियों की अधिकांश भागीदारी स्थानीय विनिर्माण या दीर्घकालिक निवेश के बजाय निर्यात तक ही सीमित है।
    • अफ्रीका भर में चयनात्मक और असमान सहभागिता: नाइजीरिया (तेल और गैस), मोज़ाम्बिक (ऊर्जा और खनन) जैसे संसाधन-समृद्ध या भू-राजनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण देशों पर ध्यान केंद्रित करने से भारत की अभिगम्यता एवं दीर्घकालिक सद्भावना के अखिल अफ्रीकी चरित्र को कमज़ोर करने का जोखिम है।

    संबंधों को और मज़बूत करने के उपाय

    • व्यापार में वस्तुओं से परे विविधता लाना: भारत को फार्मास्यूटिकल्स, चिकित्सा उपकरण, डिजिटल सेवाएँ, कृषि-प्रसंस्करण और नवीकरणीय प्रौद्योगिकियों जैसे मूल्यवर्द्धित निर्यात को बढ़ावा देकर वस्तु-प्रधान व्यापार संरचना से आगे बढ़ना होगा।
    • कार्यान्वयन क्षमता और परियोजना वितरण को मज़बूत करना: ऋण लाइनों (LOC) और परियोजना निष्पादन में विलंब को दूर करने के लिये, भारत को समर्पित परियोजना प्रबंधन इकाइयाँ स्थापित करनी चाहिये, अनुमोदन प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित करना चाहिये तथा EXIM बैंक, कार्यान्वयन एजेंसियों और अफ्रीकी सरकारों के बीच समन्वय बढ़ाना चाहिये।
    • गुणवत्ता और संवहनीयता के माध्यम से चीन से प्रतिस्पर्द्धा: चीन के पैमाने की नकल करने के बजाय भारत को पारदर्शी, गुणवत्तापूर्ण और स्थानीय समावेशन पर आधारित परियोजनाओं पर ध्यान देना चाहिये।
      • एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (AAGC) जैसे प्लेटफॉर्मों का लाभ उठाकर सतत और जन-केंद्रित विकास को बढ़ावा दिया जा सकता है।
    • निजी क्षेत्र और लघु एवं मध्यम उद्यमों की भागीदारी बढ़ाना: भारत को अफ्रीकी बाज़ारों के लिये निर्यात ऋण, जोखिम बीमा और बाज़ार संबंधी जानकारी तक अभिगम्यता में सुधार करके निजी क्षेत्र तथा लघु एवं मध्यम उद्यमों की अधिक भागीदारी को प्रोत्साहित करना चाहिये। 
      • ECGC समर्थन, मिश्रित वित्त और PPP मॉडल जैसे तंत्रों को मज़बूत करने से भारतीय फर्मों को अफ्रीका भर में विनिर्माण एवं सेवा संचालन स्थापित करने में सहायता मिल सकती है।
    • चयनित क्षेत्रों से आगे सहभागिता का विस्तार: संसाधन-समृद्ध देशों पर अत्यधिक निर्भरता से बचने के लिये भारत को पश्चिम और मध्य अफ्रीका की अपेक्षाकृत कम जुड़ी हुई अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाओं के साथ भी अपने संबंधों का विस्तार करना चाहिये।  
      • स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, डिजिटल गवर्नेंस और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट सहयोग से दीर्घकालिक सद्भावना बनाने तथा अखिल अफ्रीकी स्तर पर भारत की उपस्थिति को मज़बूत करने में सहायता मिल सकती है।
    • सॉफ्ट पावर और विकास साझेदारी का लाभ उठाना: भारत लोगों के बीच संबंधों को गहरा करने के लिये क्षमता निर्माण, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (UPI, आधार जैसे प्लेटफॉर्म), स्वास्थ्य सेवा एवं शिक्षा में अपनी क्षमता का और अधिक लाभ उठा सकता है। 
      • छात्रवृत्ति, प्रशिक्षण कार्यक्रमों और डिजिटल सार्वजनिक वस्तुओं का विस्तार करने से भारत की छवि एक वाणिज्यिक भागीदार के बजाय एक विकास भागीदार के रूप में मज़बूत होगी।

    निष्कर्ष: 

    अफ्रीका के साथ भारत की साझेदारी स्पष्ट रूप से एकजुटता आधारित कूटनीति से विकसित होकर बहुआयामी रणनीतिक साझेदारी में परिणत हो गई है। हालाँकि, यह बदलाव अभी भी एकसमान नहीं है, रणनीतिक मंशा सशक्त है लेकिन विविधीकरण की कमी, क्रियान्वयन की चुनौतियाँ और बाह्य प्रतिस्पर्द्धा इसकी पूर्ण क्षमता को सीमित करती हैं। इसकी पूरी क्षमता का एहसास करने के लिये गहन आर्थिक एकीकरण, परियोजनाओं का तीव्र क्रियान्वयन, निजी क्षेत्र की मज़बूत भागीदारी और अफ्रीकी महाद्वीप पर निरंतर क्षमता निर्माण की आवश्यकता है।