• प्रश्न :

    प्रश्न. क्रायोस्फीयर (हिममंडल) में होने वाले परिवर्तनों, विशेष रूप से हिमालयी ग्लेशियरों के तीव्र विगलन से, भारत में नदी तंत्रों, आपदा जोखिमों तथा दीर्घकालिक जल सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभावों की व्याख्या कीजिये। (250 शब्द)

    22 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 1 भूगोल

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • अपने उत्तर की शुरुआत प्रमुख शब्दों की परिभाषा देकर कीजिये।
    • मुख्य भाग में यह स्पष्ट कीजिये कि क्रायोस्फीयर में होने वाले परिवर्तन किस प्रकार नदी तंत्र, आपदा जोखिम तथा दीर्घकालिक जल सुरक्षा को प्रभावित करते हैं। 
    • प्रभाव को न्यूनतम करने के उपाय सुझाइये।
    • उचित निष्कर्ष प्रस्तुत कीजिये।

    परिचय: 

    क्रायोस्फीयर पृथ्वी के जमे हुए घटकों जैसे हिमनद, हिमावरण (बर्फ की परत) और हिम-छत्रक से मिलकर बना होता है। हिमालयी हिमनद, जिन्हें ‘तीसरा ध्रुव’ कहा जाता है, ध्रुवों के बाहर सबसे बड़े हिम भंडार को संजोए हुए हैं और सिंधु, गंगा तथा ब्रह्मपुत्र जैसी प्रमुख नदियों को जल प्रदान करते हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण हिमनदों का तीव्र विगलन नदी प्रवाह को बाधित कर रहा है, आपदा जोखिम को बढ़ा रहा है तथा भारत की दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिये गंभीर चुनौती उत्पन्न कर रहा है।

    मुख्य भाग: 

    नदी प्रणालियों पर प्रभाव

    • नदी प्रवाह के बदले हुए पैटर्न: अल्पकाल में हिमनदों के विगलन से नदियों में जल प्रवाह बढ़ जाता है, जिससे ग्रीष्मकाल में अधिक प्रवाह देखने को मिलता है।
      • दीर्घकाल में निरंतर हिमनद क्षरण के कारण हिमनदों का द्रव्यमान घटता है, जिससे विशेषकर शुष्क ऋतुओं में आधार प्रवाह में कमी आती है।
      • ICIMOD के अध्ययनों के अनुसार, कई हिमालयी नदी बेसिनों में मध्य शताब्दी तक जल उपलब्धता अपने चरम पर पहुँच सकती है, जिसके बाद इसमें गिरावट आने की संभावना है।
    • जल उपलब्धता में मौसमी असंतुलन: हिमनद-आधारित नदियाँ परंपरागत रूप से पूरे वर्ष (सदानीरा) प्रवाह सुनिश्चित करती थीं। बर्फ और हिम के भंडारण में कमी से यह संतुलनकारी क्षमता कमज़ोर होती जा रही है, जिससे नदियाँ अधिक वर्षा-निर्भर और अनियमित हो रही हैं।
    • अवसाद भार में वृद्धि एवं नदी चैनल की अस्थिरता: हिमनदों के पीछे हटने पर उनके द्वारा छोड़े गए ढीले मलबे (मोरीन) की बड़ी मात्रा शेष रह जाती है।
      • तीव्र  हिमनद विगलन के कारण यह अवसाद नदी प्रणालियों तक पहुँच जाता है, परिणामस्वरूप नदी तल में गाद (सिल्टेशन) का जमाव बढ़ जाता है।
      • इससे नदियों की जल वहन क्षमता घटती है, नदी मार्गों का बार-बार स्थानांतरण होता है तथा डाउनस्ट्रीम तटबंधों के टूटने का जोखिम बढ़ जाता है।

    आपदा जोखिम में वृद्धि

    • हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOFs): पीछे हटते हिमनद ढीले मोरीनों द्वारा अवरुद्ध अस्थिर हिमनदीय झीलों का निर्माण करते हैं। इनके आकस्मिक टूटने से डाउनस्ट्रीम क्षेत्रों में विनाशकारी बाढ़ आती है।
      • उदाहरण: उत्तराखंड में वर्ष 2021 की चमोली आपदा तथा वर्ष 2023 में सिक्किम की GLOF घटना ने यह स्पष्ट किया कि हिमनदों का ध्वंस और पिघला हुआ जल आकस्मिक बाढ़ को उत्प्रेरित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
    • आकस्मिक बाढ़ और भूस्खलन की बढ़ती आवृत्ति: अधिक हिमनद विगलन के साथ तीव्र वर्षा का संयोजन ढालों की अस्थिरता को बढ़ाता है।
      • हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम जैसे हिमालयी राज्यों में बादल फटने तथा भूस्खलनों की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है।
    • पर्माफ्रॉस्ट विगलन एवं संरचनात्मक अस्थिरता: उच्च ऊँचाइयों पर स्थित पर्माफ्रॉस्ट (स्थायी रूप से जमी हुई भूमि) पर्वतीय ढालों को एक प्रकार के ‘गोंद’ की तरह बाँधकर रखता है। इसके क्षरण से, अधिक वर्षा न होने पर भी, शैल-प्रपात (रॉकफॉल) और विशाल भूस्खलन की घटनाएँ होने लगती हैं, जिससे उच्च हिमालयी क्षेत्रों की अवसंरचना तथा ट्रेकिंग मार्ग जोखिम में पड़ जाते हैं।
      • लाहौल–स्पीति क्षेत्र के उच्च ऊँचाई वाले भागों में बार-बार होने वाले शैल-प्रपातों को प्रायः तापमान वृद्धि से उत्पन्न ढाल अस्थिरता से जोड़ा जाता है।
    • अवसंरचना के लिये खतरा: नाजुक पर्वतीय भू-भाग में स्थित सड़कें, जलविद्युत परियोजनाएँ और बस्तियाँ क्रायोस्फेरिक अस्थिरता के कारण बढ़ते जोखिम का सामना कर रही हैं।

    दीर्घकालिक जल सुरक्षा पर प्रभाव

    • पेयजल और सिंचाई पर दबाव: लगभग 600 मिलियन लोग प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हिमालयी नदी प्रणालियों पर निर्भर हैं।
      • दीर्घकाल में हिमनदों से मिलने वाले जल में कमी से उत्तरी भारत में शहरी जल आपूर्ति और सिंचाई व्यवस्था पर गंभीर खतरा उत्पन्न होता है।
    • खाद्य सुरक्षा पर प्रभाव: इंडो-गंगा के मैदानों में कृषि निरंतर नदी प्रवाह पर निर्भर करती है। जल उपलब्धता में अस्थिरता से फसल उत्पादकता घट सकती है तथा भूजल पर निर्भरता बढ़ सकती है।
    • जलविद्युत में अनिश्चितता: अल्पकाल में बढ़ा हुआ नदी प्रवाह विद्युत उत्पादन को बढ़ा सकता है, किंतु दीर्घकाल में प्रवाह में कमी और अवसाद भार की वृद्धि परियोजनाओं की व्यवहार्यता तथा सुरक्षा को प्रभावित करती है।
    • सीमा पार जल संबंधी चिंताएँ: हिमालयी नदियाँ सीमा पार प्रकृति की हैं। नदी प्रवाह में परिवर्तन से पड़ोसी देशों के साथ भारत की जल कूटनीति से जुड़ी चुनौतियाँ और तीव्र हो सकती हैं।

    प्रभाव को न्यूनतम करने के उपाय:

    • उपग्रह मानचित्रण, द्रव्यमान-संतुलन अध्ययनों तथा ISRO एवं ICIMOD जैसी संस्थाओं के माध्यम से हिमनद निगरानी और अनुसंधान को सुदृढ़ किया जाएँ, ताकि क्रायोस्फीयर से संबंधित वास्तविक समय का डेटा उपलब्ध हो सके।
    • हिमनद झील विस्फोट बाढ़ (GLOFs), हिमस्खलन और आकस्मिक बाढ़ के लिये, विशेषकर संवेदनशील हिमालयी राज्यों में, प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ विकसित की जाएँ।
    • वहन क्षमता और आपदा-जोखिम क्षेत्र आकलन के आधार पर जलविद्युत तथा सड़क परियोजनाओं को विनियमित कर जलवायु-सहिष्णु अवसंरचना को बढ़ावा दिया जाएँ।
    • ऊपरी–निचले प्रवाह क्षेत्रों की जल आवश्यकताओं में संतुलन स्थापित करने तथा मौसमी जल क्षरण को कम करने के लिये  एकीकृत नदी बेसिन प्रबंधन अपनाया जाएँ।
    • हिमनद-आधारित बेसिनों में सूक्ष्म सिंचाई, वर्षा जल संचयन और मांग-पक्ष प्रबंधन के माध्यम से जल उपयोग दक्षता बढ़ाई जाएँ।
    • सीमा पार नदियों पर डेटा साझाकरण, आपदा तैयारी और दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिये क्षेत्रीय सहयोग को सुदृढ़ किया जाएँ।

    निष्कर्ष:

    हिमालयी हिमनदों का पीछे हटना नदी प्रणालियों को स्थिर अवस्था से अत्यधिक परिवर्तनशील अवस्था में परिवर्तित कर रहा है, जिससे आपदा जोखिम बढ़ रहे हैं और दीर्घकालिक जल सुरक्षा कमज़ोर हो रही है। इस चुनौती से निपटने के लिये एकीकृत पर्वतीय शासन, सुदृढ़ हिमनद निगरानी, GLOFs के लिये प्रभावी पूर्व चेतावनी प्रणालियाँ, जलवायु-सहिष्णु अवसंरचना तथा सतत जल प्रबंधन की आवश्यकता है। आज अनुकूलन रणनीतियों को मज़बूत करना भारत के पारिस्थितिक संतुलन, आजीविकाओं और भविष्य की जल सुरक्षा को सुरक्षित रखने के लिये अत्यंत आवश्यक है।