• प्रश्न :

    प्रश्न. जवाबदेही और पारदर्शिता नैतिक शासन के आधारभूत मूल्य हैं। इनके नैतिक महत्त्व का विश्लेषण कीजिये तथा स्पष्ट कीजिये कि इन मूल्यों के अभाव में लोकतांत्रिक संस्थानों में जन-विश्वास किस प्रकार प्रभावित होता है। (150 शब्द)

    18 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • नैतिक शासन के आधारभूत मूल्यों की व्याख्या करते हुए उत्तर लेखन की शुरुआत कीजिये।
    • मुख्य भाग में, जवाबदेही और पारदर्शिता के नैतिक महत्त्व पर प्रकाश डालिये।
    • इन आधारभूत मूल्यों के अभाव के प्रभाव का विश्लेषण कीजिये तथा इन्हें सुदृढ़ करने के उपाय प्रस्तावित कीजिये। 
    • तदनुसार उचित निष्कर्ष दीजिये। 

    परिचय:

    जवाबदेही और पारदर्शिता लोकतंत्र में सत्ता के उचित उपयोग को सुनिश्चित करने वाले मूलभूत नैतिक सिद्धांत हैं। जवाबदेही का तात्पर्य है कि सार्वजनिक अधिकारी अपने कार्यों के लिये उत्तरदायी हों, जबकि पारदर्शिता निर्णय-निर्माण में खुलापन तथा सूचना तक अभिगम्यता सुनिश्चित करती है। दोनों मिलकर विधि का शासन, न्याय और जन-संप्रभुता जैसे संवैधानिक मूल्यों को व्यवहार में क्रियान्वित करते हैं तथा नैतिक शासन की आधारशिला का निर्माण करते हैं।

    मुख्य भाग: 

    जवाबदेही और पारदर्शिता का नैतिक महत्त्व 

    • सत्ता के दुरुपयोग की रोकथाम: पारदर्शिता निर्णयों को सार्वजनिक निरीक्षण के दायरे में लाती है, जबकि जवाबदेही दण्ड और सुधारात्मक कार्रवाई के माध्यम से अधिकार के दुरुपयोग को रोकती है।
      • उदाहरण के लिये, लोक सेवकों द्वारा संपत्ति की अनिवार्य घोषणाएँ अनुपातहीन संपत्ति के संचय को रोकने में सहायक होती हैं।
    • निष्ठा और नैतिक आचरण का संवर्द्धन: जब कार्य दृश्य और उत्तरदायी होते हैं, तब अधिकारी ईमानदारी और निष्पक्षता से कार्य करने के लिये अधिक प्रेरित होते हैं।
      •  उदाहरण: पारदर्शी क्रय-प्रणाली पोर्टल सार्वजनिक व्यय में विवेकाधिकार और नैतिक अंतर्विरोधों को कम करते हैं।
    • सूचित सहभागिता का विस्तार: पारदर्शिता नागरिकों को सूचित निर्णय लेने और शासन में अर्थपूर्ण सहभागिता करने में सशक्त बनाती है।
      • उदाहरण के लिये, बजटीय आँकड़ों तक अभिगम्यता नागरिक समाज को पक्षपाती नीतिगत प्राथमिकताओं पर प्रश्न उठाने में सक्षम बनाती है।
    • संस्थागत वैधता को सुदृढ़ करना: अंकेक्षण, संसदीय निगरानी और सतर्कता संस्थाओं जैसे जवाबदेही तंत्र राज्य की नैतिक वैधता को सुदृढ़ करते हैं।
      •  संवैधानिक निकायों की रिपोर्टें नियंत्रण और संतुलन बनाए रखने में सहायक होती हैं। 

    जवाबदेही और पारदर्शिता के अभाव का जनविश्वास पर प्रभाव

    • विश्वसनीयता का क्षरण और विश्वास का संकट: अपारदर्शी निर्णय-प्रक्रिया भ्रष्टाचार और पक्षपात के प्रति संदेह को जन्म देती है। नागरिक सार्वजनिक संस्थानों के उद्देश्यों पर अविश्वास करने लगते हैं।
    • भ्रष्टाचार और दंडमुक्ति का सामान्यीकरण: जवाबदेही के अभाव में ऐसी संस्कृति विकसित होती है जिसमें कदाचार दण्डित नहीं होता, जिससे नैतिक मानक दुर्बल हो जाते हैं।
      •  उदाहरण के लिये, घोटालों पर विलंबित कार्रवाई जाँच अभिकरणों में विश्वास को कम करती है।
    • विमुखता और लोकतांत्रिक उदासीनता: जब लोगों को लगता है कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही है या उन्हें गुमराह किया जा रहा है, तो मतदाताओं की उदासीनता और संशय बढ़ जाता है, जिससे लोकतांत्रिक सहभागिता कमज़ोर हो जाती है।
    • विधि के शासन का क्षरण: चयनात्मक जवाबदेही से ‘विधि के शासन’ के स्थान पर ‘विवेकाधिकार द्वारा शासन’ की धारणा बनती है, जो लोकतांत्रिक विश्वसनीयता को क्षति पहुँचाती है।

    सार्वजनिक विश्वास बढ़ाने हेतु जवाबदेही और पारदर्शिता को सुदृढ़ करने के उपाय

    • कानूनी और संस्थागत निगरानी का सशक्तीकरण: भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक और भारत के लोकपाल जैसे स्वतंत्र निकायों को पर्याप्त स्वायत्तता, कर्मचारियों की उपलब्धता तथा समयबद्ध प्रतिवेदन की व्यवस्था प्रदान की जानी चाहिये ताकि सत्ता के दुरुपयोग पर प्रभावी नियंत्रण सुनिश्चित किया जा सके।
    • सक्रिय प्रकटीकरण और ओपन डेटा: सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत सुओ मोटो प्रकटीकरण को अनिवार्य किया जाना चाहिये तथा बजट, अनुबंध, प्रदर्शन डैशबोर्ड और लाभार्थी सूचियाँ मशीन-रीडेबल फॉर्मेट में प्रकाशित की जानी चाहिये, जिससे सूचना-विषमता कम हो।
    • डिजिटलीकरण और ई-गवर्नेंस सुधार: एंड-टू-एंड डिजिटल प्लेटफॉर्म (ई-प्रोक्योरमेंट, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, ऑनलाइन शिकायत पोर्टल) का उपयोग कर विवेकाधिकार को न्यूनतम किया जाना चाहिये, ऑडिट-ट्रेल तैयार किये जाने चाहिये तथा रियल-टाइम मॉनिटरिंग सक्षम किया जाना चाहिये, जिससे भ्रष्टाचार और विलंब पर नियंत्रण हो।
    • समयबद्ध शिकायत निवारण और अपील व्यवस्था: वैधानिक समय-सीमाएँ, एस्केलेशन मैट्रिक्स और शिकायतों की सार्वजनिक ट्रैकिंग सुनिश्चित की जानी चाहिये, ताकि प्रशासनिक उदासीनता पर अंकुश लगे।
    • व्हिसलब्लोअर संरक्षण और नैतिक अवसंरचना: मज़बूत व्हिसलब्लोअर सुरक्षा, आंतरिक सतर्कता इकाइयाँ और नैतिक समितियाँ क्रियान्वित की जानी चाहिये, जिससे प्रतिशोध के भय के बिना रिपोर्टिंग को प्रोत्साहन मिले।
    • पारदर्शी नियुक्तियाँ और स्थानांतरण: नियुक्ति, पदस्थापन और स्थानांतरण हेतु नियम-आधारित तथा सार्वजनिक रूप से घोषित मानदंड अपनाये जाने चाहिये, ताकि मनमानी और संरक्षणवाद (वंशवाद) को रोका जा सके।
    • सामाजिक अंकेक्षण और नागरिक सहभागिता: सामाजिक अंकेक्षण, जन-सुनवाई और सहभागी बजटिंग को संस्थागत रूप दिया जाना चाहिये, जिससे शासन में सामुदायिक निगरानी सुनिश्चित हो।
    • क्षमता निर्माण और नैतिक नेतृत्व: अधिकारियों को पारदर्शिता मानदंडों, हितों के अंतर्विरोध के प्रबंधन और अभिलेख प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिये तथा नैतिक नेतृत्व एवं निष्ठा को मान्यता प्रणालियों के माध्यम से पुरस्कृत किया जाना चाहिये।
    • स्वतंत्र मूल्यांकन और सार्वजनिक संप्रेषण: तृतीय-पक्ष मूल्यांकन कराये जाने चाहिये तथा उनके निष्कर्ष नागरिकों तक स्पष्ट रूप से पहुँचाये जाने चाहिये, जिससे फीडबैक-लूप पूर्ण हो और विश्वास सुदृढ़ हो।

    निष्कर्ष:

    जवाबदेही और पारदर्शिता मात्र प्रशासनिक उपागम नहीं, बल्कि वे नैतिक अनिवार्यताएँ हैं, जो लोकतांत्रिक विश्वास को बनाये रखती हैं। इनके अभाव में संस्थागत निष्ठा का क्षरण होता है तथा नागरिकों एवं राज्य के बीच दूरी बढ़ती है। अतः सामाजिक अंकेक्षण, स्वतंत्र निगरानी, सक्रिय प्रकटीकरण और नैतिक नेतृत्व को सशक्त करना, लोकतंत्र में विश्वास के पुनर्निर्माण तथा नैतिक शासन सुनिश्चित करने के लिये अनिवार्य है।