• प्रश्न :

    प्रश्न. बढ़ती वैश्विक आर्थिक अस्थिरता के परिप्रेक्ष्य में भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता मुद्रास्फीति, बाह्य क्षेत्र की संवेदनशीलताओं एवं पूँजी प्रवाहों के विवेकपूर्ण प्रबंधन पर निर्भर करती है। इस संदर्भ में नीतिगत संतुलनों की विवेचना कीजिये। (250 शब्द)

    17 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 3 अर्थव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • वैश्विक आर्थिक अस्थिरता का उल्लेख करते हुए उत्तर लेखन की शुरुआत कीजिये। 
    • व्यापक आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करने वाले समझौतों पर चर्चा कीजिये।
    • बढ़ती वैश्विक आर्थिक अस्थिरता को कम करने के उपाय प्रस्तावित कीजिये।
    • तदनुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय: 

    हाल के वर्षों में, रूस-यूक्रेन संघर्ष, कोविड-19 के बाद आपूर्ति शृंखला में व्यवधान और अमेरिकी फेडरल रिज़र्व द्वारा सक्रिय मौद्रिक सख्ती जैसे वैश्विक झटकों ने आर्थिक अस्थिरता को बढ़ा दिया है। 

    • इस संदर्भ में, भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता की परीक्षा मुद्रास्फीति, बाह्य क्षेत्र की कमज़ोरियों और अस्थिर पूंजी प्रवाह को एक साथ प्रबंधित करने की आवश्यकता से होती है, जिसमें विकास, स्थिरता एवं नीतिगत विश्वसनीयता के बीच कठिन समझौता करना शामिल है।

    मुख्य भाग: 

     व्यापक आर्थिक स्थिरता को प्रभावित करने वाले नीतिगत समझौते

    • मुद्रास्फीति नियंत्रण बनाम विकास समर्थन: RBI के मुद्रास्फीति-लक्ष्यीकरण कार्यढाँचे (4% ± 2%) के लिये कीमतों में वृद्धि होने पर मौद्रिक सख्ती की आवश्यकता होती है, जैसा कि खाद्य और ईंधन मुद्रास्फीति के प्रत्युत्तर में वर्ष 2022-24 के ब्याज दरों में वृद्धि के दौरान (RBI, मौद्रिक नीति रिपोर्ट) देखा गया।
      • हालाँकि, उच्च ब्याज दरें उधार लेने की लागत को बढ़ाती हैं, जिससे निवेश और उपभोग, विशेष रूप से लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) में मंदी आ सकती है।
        • इस प्रकार, क्रय शक्ति की रक्षा के लिये मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना प्रायः अल्पकालिक विकास की कीमत पर होता है।
    • बाह्य क्षेत्र की स्थिरता बनाम विनिमय दर लोच: अमेरिकी फेडरल रिज़र्व द्वारा ब्याज दरों में सख्ती जैसे वैश्विक झटके पूंजी के बहिर्वाह और रुपये के अवमूल्यन का कारण बनते हैं।
      • RBI द्वारा विदेशी मुद्रा भंडार (वर्ष 2024 में USD 640 बिलियन से अधिक) के माध्यम से किया गया हस्तक्षेप अस्थिरता को नियंत्रित करने में सहायक होता है (RBI आँकड़े), किंतु अत्यधिक हस्तक्षेप से भंडार क्षरण का जोखिम रहता है।
      • रुपये के अवमूल्यन की अनुमति देने से निर्यात को समर्थन मिलता है, परंतु इससे विशेषकर तेल के मामले में आयातित मुद्रास्फीति बढ़ती है।
    • पूंजी प्रवाह प्रबंधन बनाम वित्तीय खुलापन: भारत को अपने चालू खाता घाटे (CAD) के वित्तपोषण के लिये पूंजी प्रवाह से लाभ होता है, जो हाल के वर्षों में GDP के लगभग 1-2% के आसपास रहा है।
      • हालाँकि, अस्थिर पोर्टफोलियो प्रवाह बाज़ारों को अस्थिर कर सकता है, जैसा कि ‘टेपर टैंट्रम’ जैसी घटनाओं के दौरान देखा गया है।
      • यहाँ नीतिगत समझौता निवेशक विश्वास बनाये रखने तथा आकस्मिक बहिर्गमन को कम करने हेतु मैक्रो-प्रूडेंशियल उपायों के उपयोग के बीच निहित है।
      • इसके साथ ही, व्यापक स्थिरता और निवेशकों के विश्वास को बनाए रखने के लिये राजकोषीय समेकन आवश्यक है। फिर भी वैश्विक मंदी के दौर में मांग को समर्थन देने हेतु विस्तारवादी राजकोषीय नीति की आवश्यकता होती है, जैसा कि महामारी के बाद पूँजीगत व्यय में वृद्धि से स्पष्ट है।
        • यह ऋण-स्थिरता तथा संवृद्धि समर्थन के बीच एक और संतुलन बनाना पड़ता है। 

    भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता पर वैश्विक प्रभावों को कम करने के उपाय

    • मुद्रास्फीति प्रबंधन को मज़बूत बनाना: केवल ब्याज दरों पर पड़ने वाले बोझ को कम करने के लिये मौद्रिक नीति के साथ-साथ राजकोषीय उपकरणों (बफर स्टॉक, खाद्य/ईंधन पर कैलिब्रेटेड आयात शुल्क) का उपयोग किया जाना चाहिये।
      • खाद्य मुद्रास्फीति की अस्थिरता को कम करने के लिये कृषि आपूर्ति शृंखलाओं और भंडारण में सुधार किया जाना चाहिये।
    • निर्यात विविधीकरण को प्रोत्साहन: कुछ ही बाज़ारों और वस्तुओं पर निर्भरता कम करने के लिये निर्यात विविधीकरण (वस्तुओं और सेवाओं) को बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
      • ऊर्जा विविधीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार के माध्यम से तेल की निर्भरता को कम किया जाना चाहिये।
    • पूंजी प्रवाह की अस्थिरता का प्रबंधन: अस्थिर पोर्टफोलियो प्रवाह की तुलना में स्थिर दीर्घकालिक पूंजी प्रवाह (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, संप्रभु निधि) को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
      • प्रतिचक्रीय पूंजी बफर और अत्यधिक अल्पकालिक उधार पर सीमा जैसे व्यापक विवेकपूर्ण उपायों का उपयोग किया जाना चाहिये।
      • अचानक होने वाले उलटफेर से बचने के लिये पूंजी खाते का क्रमिक और सुनियोजित उदारीकरण आवश्यक है।
    • विनिमय दर जोखिम न्यूनीकरण: बाज़ार द्वारा निर्धारित विनिमय दर की अनुमति दी जानी चाहिये तथा RBI का हस्तक्षेप केवल अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिये हो, न कि निश्चित स्तरों की रक्षा के लिये।
      • कंपनियों को बाह्य झटकों से बचाने के लिये घरेलू मुद्रा डेरिवेटिव और हेजिंग बाज़ारों को मज़बूत किया जाना चाहिये।
    • राजकोषीय और संस्थागत समन्वय: विकास को बढ़ावा देने वाले पूंजीगत व्यय की रक्षा करते हुए एक विश्वसनीय मध्यम अवधि के राजकोषीय समेकन मार्ग को बनाए रखना आवश्यक है।
      • निवेशकों की अपेक्षाओं को स्थिर करने के लिये डेटा पारदर्शिता और संचार को मज़बूत किया जाना चाहिये।
    • रुपये के अंतर्राष्ट्रीयकरण को बढ़ावा देना: सीमा पार व्यापार निपटान, द्विपक्षीय विनिमय व्यवस्था तथा ऊर्जा और वस्तु आयात के बिलिंग में भारतीय रुपये के उपयोग का विस्तार किया जाना चाहिये।
      •  इससे अमेरिकी डॉलर जैसी मज़बूत मुद्राओं पर निर्भरता कम होगी, मुद्रास्फीति पर विनिमय दर का प्रभाव कम होगा तथा वैश्विक वित्तीय संकटों के प्रति भारत की समुत्थानशीलता बढ़ेगी।

    निष्कर्ष: 

    वैश्विक स्तर पर अनिश्चित आर्थिक वातावरण में भारत बाह्य प्रसार प्रभावों से पूर्णतः बच नहीं सकता, किंतु समुत्थानशीलता तथा नीतिगत विवेक के माध्यम से उनका प्रबंधन अवश्य कर सकता है।

    मुद्रास्फीति नियंत्रण, बाह्य क्षेत्र बफरों तथा पूँजी प्रवाह प्रबंधन का एक संतुलित मिश्रण, मज़बूत संस्थानों और स्पष्ट नीतिगत संप्रेषण के साथ संवृद्धि की गति बनाये रखते हुए व्यापक आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित करने में निर्णायक होगा।