प्रश्न. “कार्यपालिका का प्रभुत्व प्रायः शासन में संस्थागत नियंत्रण और संतुलन को कमज़ोर कर देता है।” चर्चा कीजिये। (150 शब्द)
उत्तर :
हल करने का दृष्टिकोण:
- शक्ति पृथक्करण का उल्लेख करते हुए अपने उत्तर की शुरुआत कीजिये।
- स्पष्ट कीजिये कि कार्यपालिका का प्रभुत्व संस्थागत नियंत्रणों और संतुलन को किस प्रकार कमज़ोर करता है।
- इस समस्या के निवारण के उपाय प्रस्तावित कीजिये।
- तदनुसार उचित निष्कर्ष दीजिये।
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परिचय:
संवैधानिक लोकतंत्र में, सत्ता के केंद्रीकरण को रोकने के लिये शक्तियों का पृथक्करण तथा संस्थागत नियंत्रण एवं संतुलन आवश्यक हैं। हालाँकि, व्यवहार में राजनीतिक बहुमत, प्रशासन पर नियंत्रण व अध्यादेश स्थापित करने की शक्तियों द्वारा संचालित कार्यपालिका का प्रभुत्व प्रायः अन्य संस्थानों की स्वायत्तता एवं प्रभावशीलता को कमज़ोर करता है, जिससे लोकतांत्रिक शासन के लिये चिंताएँ बढ़ जाती हैं।
मुख्य भाग:
कार्यकारी प्रभुत्व किस प्रकार नियंत्रण और संतुलन को कमज़ोर करता है:
- संसदीय निगरानी का कमज़ोर होना: अनुच्छेद 123 के तहत अध्यादेशों का बार-बार प्रयोग (उदाहरण के लिये, डी.सी. वधवा बनाम बिहार राज्य, 1987 मामले में पुनः-प्रख्यापन की प्रवृत्ति को असंवैधानिक ठहराया गया) विधायी परीक्षण से बचने का माध्यम बन जाता है।
- महत्त्वपूर्ण विधेयकों को कभी-कभी धन विधेयक के रूप में पारित किया जाता है, जिससे राज्यसभा द्वारा उनकी जाँच सीमित (उदाहरण के लिये, आधार अधिनियम विवाद) हो जाती है।
- स्वतंत्र संस्थानों पर प्रभाव: नियुक्तियों तथा स्थानांतरणों पर कार्यपालिका का नियंत्रण अन्वेषण अभिकरणों जैसी संस्थाओं की स्वायत्तता को प्रभावित करता है।
- CBI और ED जैसे अभिकरणों के चयनात्मक प्रयोग के आरोप उनके राजनीतिकरण को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करते हैं। कई राज्यों द्वारा CBI को दी गयी सामान्य सहमति वापस लिया जाना इसी असंतोष को दर्शाता है।
- संघीय नियंत्रणों का क्षरण: उपकर और अधिभार जैसे राजकोषीय साधनों के माध्यम से केंद्रीकरण से राज्यों के विभाज्य करों में हिस्सेदारी कम हो जाती है।
- भारत में उपकर और अधिभार में काफी वृद्धि हुई है, जो केंद्रीय राजस्व का एक बड़ा, गैर-साझा करने योग्य हिस्सा बन गया है, जो महामारी से पहले लगभग 10% से बढ़कर सत्र 2021-22 तक 20% से अधिक हो गया है।
- न्यायिक स्वतंत्रता पर दबाव: कॉलेजियम प्रणाली के तहत न्यायिक नियुक्तियों में विलंब और असहमति ने कार्यपालिका-न्यायपालिका संबंधों में तनाव उत्पन्न कर दिया है।
- दिसंबर 2025 तक, भारत के उच्च न्यायालयों में 297 से अधिक रिक्तियाँ हैं।
शासन में नियंत्रण और संतुलन को सुदृढ़ करना:
- संसदीय निगरानी को सुदृढ़ करना: विधेयकों को विभाग-संबंधी स्थायी समितियों को अधिकाधिक संदर्भित करना अनिवार्य किया जाना चाहिये, जिससे विशेषज्ञ परीक्षण तथा द्विदलीय विमर्श सुनिश्चित हो सके।
- स्वतंत्र संस्थाओं की स्वायत्तता सुनिश्चित करना: अन्वेषण अभिकरणों को कार्यकाल की सुरक्षा और कार्यात्मक स्वतंत्रता प्रदान की जानी चाहिये, जैसा कि विनीत नारायण मामले में प्रतिपादित किया गया था।
- न्यायिक स्वतंत्रता का संरक्षण: रचनात्मक कार्यपालिका-न्यायपालिका सहयोग के माध्यम से समयबद्ध न्यायिक नियुक्तियों को सुनिश्चित करना चाहिये।
- न्यायिक निर्णयों का सम्मान किया जाना चाहिये और चयनात्मक अनुपालन से बचना चाहिये।
- न्यायाधिकरण सुधारों को मद्रास बार एसोसिएशन के निर्णयों में निर्धारित सिद्धांतों के अनुरूप तर्कसंगत बनाया जाना चाहिये।
- संघवाद को सुदृढ़ बनाना: उपकरों और अधिभारों पर अत्यधिक निर्भरता कम की जानी चाहिये, जिससे राज्यों को पूर्वानुमानित राजकोषीय अंतरण सुनिश्चित हो सके।
- अंतर-राज्य परिषद जैसे संस्थागत मंचों के माध्यम से सहकारी और प्रतिस्पर्द्धी संघवाद को प्रोत्साहित किया जाना चाहिये।
निष्कर्ष:
यद्यपि एक सशक्त कार्यपालिका प्रशासनिक दक्षता को बढ़ा सकती है, किंतु अत्यधिक प्रभुत्व संस्थागत नियंत्रण एवं संतुलन को कमज़ोर करने का जोखिम उत्पन्न करता है। संवैधानिक नैतिकता की रक्षा के लिये विधायिकाओं को सशक्त करना, पर्यवेक्षणकारी संस्थाओं की स्वायत्तता सुनिश्चित करना तथा न्यायिक स्वतंत्रता का सम्मान करना लोकतांत्रिक शासन की निरंतरता हेतु अनिवार्य है।