• प्रश्न :

    प्रश्न. “भारत की उर्वरक नीति को उत्पाद-आधारित सब्सिडी से परिणाम-आधारित पोषक तत्त्व प्रबंधन की ओर एक प्रतिमान परिवर्तन की आवश्यकता है।” नैनो-उर्वरकों और परिशुद्ध कृषि की उभरती भूमिका के संदर्भ में इस पर विवेचना कीजिये। (250 शब्द)

    10 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 3 अर्थव्यवस्था

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • मौजूदा उर्वरक नीति और उसकी कमियों के संबंध संक्षिप्त में परिचय दीजिये।
    • मुख्य भाग में बताइये कि नीति अप्रभावी क्यों है, सुधार की ज़रूरत क्यों है और नैनो उर्वरक एवं सटीक खेती की क्या भूमिका है।
    • तद्नुसार निष्कर्ष लिखिये।

    परिचय:

    भारत की उर्वरक नीति परंपरागत रूप से उत्पाद आधारित सब्सिडी पर आधारित रही है। इससे उर्वरक की कीमतें तो कम हुईं, लेकिन पोषक तत्त्वों के संतुलित उपयोग में विकृति आई, जिसके कारण यूरिया का अत्यधिक प्रयोग, मिट्टी में पोषण असंतुलन और कृषि उत्पादन में कमी हुई।

    • इस संदर्भ में नैनो-उर्वरक और सटीक कृषि तकनीकें पोषक तत्त्वों के उपयोग की क्षमता बढ़ाकर एवं परिणाम-आधारित पोषण प्रबंधन प्रणाली को सुदृढ़ करके कृषि में परिवर्तनकारी संभावनाएँ प्रस्तुत करती हैं।

    मुख्य भाग:

    उत्पाद-आधारित सब्सिडी अब प्रभावी क्यों नहीं रही?

    • एक समान आवेदन, भारत की कृषि-जलवायु विविधता की अनदेखी करते हुए:  
      • भारत के 15 कृषि-जलवायु क्षेत्र स्थल-विशेष पोषण प्रबंधन की मांग करते हैं, लेकिन वर्तमान प्रणाली आवश्यकतानुसार आवेदन के बजाय मात्रा-आधारित उपयोग को बढ़ावा देती है। मौजूदा नीति उपयोग को प्रोत्साहित करती है, पोषक तत्त्व के परिणामों को नहीं।
      • अत्यधिक नाइट्रोजन उपयोग को बढ़ावा: उर्वरक की मात्रा (मुख्यतः यूरिया) से जुड़ी सब्सिडी ने NPK के असंतुलित उपयोग को बढ़ावा (N:P:K ≈ 6.9:2.4:1 जबकि संतुलित अनुपात 4:2:1 होना चाहिये) दिया है। वर्तमान नीति उपयोग को बढ़ावा देती है, पोषक तत्त्व के परिणामों को नहीं।
    • मिट्टी में पोषक तत्त्वों की खनन और मृदा स्वास्थ्य में गिरावट:
      • असंतुलित उर्वरक उपयोग से मृदा में ज़िंक, सल्फर, बोरॉन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी बढ़ रही है।
      • मिट्टी में जैविक पदार्थ की कमी, सूक्ष्म पोषक तत्त्वों की कमी और उत्पादन में ठहराव यह दर्शाते हैं कि सार्वजनिक रूप से सभी जगह समान उर्वरक उपयोग से लाभ कम हो रहे हैं।
      • लीकेज, भटकाव और असक्षमता सुधारों (जैसे- उर्वरकों के लिये DBT) के बावजूद बनी हुई हैं।
    • उच्च राजकोषीय बोझ और बाज़ार में विकृति:
      • जब वैश्विक उर्वरक की कीमतें बढ़ती हैं, तो सब्सिडी स्वचालित रूप से बढ़ जाती है, जिससे राष्ट्रीय वित्त पर भारी दबाव पड़ता है।
      • उदाहरण के लिये, भारतीय सरकार ने वित्त वर्ष 2025-26 में उर्वरक सब्सिडी हेतु ₹1.84 ट्रिलियन आवंटित किये हैं।
      • यह नीति बायो-फर्टिलाइज़र, कस्टमाइज्ड उर्वरक, कोटेड उर्वरक और सूक्ष्म पोषक तत्त्व मिश्रण में निजी क्षेत्र के नवाचार को प्रोत्साहित नहीं करती।

    परिणाम-आधारित पोषक तत्त्व प्रबंधन की आवश्यकता

    • मूल्यांकन को मात्रा से दक्षता पर केंद्रित करता है:
      • परिणाम-आधारित पोषण प्रबंधन (RBNM) पोषक तत्त्व उपयोग दक्षता (NUE) बढ़ाता है, यह सुनिश्चित करके कि उर्वरक सही मात्रा में, सही समय पर और सही तरीके से लगाया जाए।
      • यह परिवर्तन वैश्विक 4R पोषण प्रबंधन ढाँचे (उर्वरक के लिये सही स्रोत, सही दर, सही समय और सही स्थान) के अनुरूप है।
    • मिट्टी की सेहत के क्षरण को सीधे संबोधित करता है:
      • यह साइट-स्पेसिफिक न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट (SSNM), फसल-विशिष्ट सिफारिशें और मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड आधारित उर्वरक आवेदन को बढ़ावा देता है।
      • यह मृदा परीक्षण, फसल-विशेष आवश्यकताओं और वास्तविक समय निदान को एकीकृत करता है, जिससे किसान सर्वत्र समान खुराक की बजाय वैज्ञानिक पोषण अनुप्रयोग अपनाने के लिये प्रोत्साहित होते हैं।
    • पर्यावरणीय बाह्य प्रभाव को कम करता है:
      • यह प्रणाली नाइट्रेट लीचिंग, यूट्रोफिकेशन, अमोनिया उत्सर्जन और भूजल प्रदूषण जैसी पर्यावरणीय समस्याओं को घटाती है।
      • इसके अलावा यह भारत को पेरिस समझौते की प्रतिबद्धताओं की दिशा में आगे बढ़ने में मदद करती है और कृषि के कार्बन पदचिह्न को कम करती है।
    • बेहतर उत्पादकता के माध्यम किसानों की आय में सुधार होता है:
      • संतुलित पोषण इनपुट के अपव्यय को कम करता है और फसल की प्रतिक्रिया दर को बेहतर बनाता है, जिससे उच्च उपज एवं बेहतर इनपुट-आउटपुट दक्षता सुनिश्चित होती है।
      • RBNM छोटे किसानों के लिये विशेष रूप से मार्जिन और लाभप्रदता को काफी बढ़ा सकता है।
    • उर्वरक उद्योग में इनोवेशन के लिये जगह बनाता है:
      • चूँकि सब्सिडी उत्पाद के बजाय प्रदर्शन से जुड़ी होगी, RBNM कंपनियों को बायोफर्टिलाइजर्स, कोटेड उर्वरक, नैनो-फॉर्मूलेशन आदि में नवाचार करने के लिये प्रोत्साहित करता है।
      • यह भारत के उर्वरक पारिस्थितिकी तंत्र को मात्रा-आधारित उत्पादन से विज्ञान-आधारित पोषण समाधान की ओर बदल देता है।

    पैराडाइम शिफ्ट को सक्षम बनाने में नैनो-उर्वरकों की भूमिका

    • नैनो-स्तरीय वितरण से पोषक तत्त्वों की उपयोग दक्षता बढ़ाना
      • नैनो-उर्वरक जैसे नैनो यूरिया और नैनो DAP का सतह-क्षेत्र से आयतन अनुपात अत्यधिक उच्च होता है, जिससे पौधों की पत्तियों द्वारा पोषक तत्त्वों को अधिक प्रभावी ढंग से अवशोषित किया जा सकता है।
      • यह पोषक तत्त्व उपयोग दक्षता (NUE) को बढ़ाता है और रासायनिक उर्वरकों के बड़े पैमाने पर उपयोग से परिणाम-उन्मुख पोषण अनुप्रयोग की ओर बदलाव का समर्थन करता है।
    • उपज से समझौता किये बिना उर्वरक की मात्रा में कमी:
      • नैनो यूरिया की 500 मिलीलीटर की एक बोतल 45 किलोग्राम यूरिया की बोरी का स्थान ले सकती है, जिससे परिवहन, भंडारण और उपयोग की लागत में कमी आती है।
      • यह परिणाम-आधारित पोषक तत्त्व प्रबंधन के अनुरूप है, क्योंकि इसमें सब्सिडी को खरीदी गई मात्रा के बजाय फसल के प्रदर्शन और पोषक तत्त्व दक्षता से जोड़ा जाता है।
    • लीचिंग, रनऑफ और वाष्पीकरण से होने वाले नुकसान को कम करता है:
      • पारंपरिक उर्वरकों में अक्सर नाइट्रोजन के वाष्पीकरण, भूजल में लीचिंग और सतही बहाव के कारण पोषक तत्त्वों की हानि होती है।
      • नैनो-उर्वरक इन हानियों को काफी हद तक कम कर देते हैं, क्योंकि पोषक तत्त्व सीधे पौधों की चयापचय प्रक्रियाओं तक पहुँचाए जाते हैं, जिससे प्रभावी उपयोग सुनिश्चित होता है और पर्यावरणीय क्षति न्यूनतम रहती है।
    • जलवायु-अनुकूल कृषि का समर्थन करता है:
      • नैनो-उर्वरक अतिरिक्त नाइट्रोजन के उपयोग को कम करके नाइट्रस ऑक्साइड (N₂O) के उत्सर्जन को घटाते हैं, जो सबसे शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसों में से एक है।
      • यह भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं के अनुरूप है और अधिक हरित एवं सतत कृषि प्रणाली को समर्थन देता है।
    • मृदा स्वास्थ्य में सुधार और रासायनिक भार में कमी
      • भारी मात्रा में उपयोग किये जाने वाले रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता को कम करके नैनो-फॉर्मूलेशन मृदा को अधिक स्वस्थ बनाए रखने में मदद करते हैं।
      • कम रासायनिक भार से सूक्ष्मजीवों की सक्रियता और मृदा कार्बनिक कार्बन के स्तर में सुधार होता है।

    पैराडाइम शिफ्ट को सक्षम बनाने में प्रिसीजन एग्रीकल्चर की भूमिका

    • डिजिटल और स्मार्ट टूल्स का उपयोग:
      • रिमोट सेंसिंग, GIS और सैटेलाइट आधारित निगरानी बड़े कृषि क्षेत्रों में पोषक तत्त्वों की कमी एवं फसल की वृद्धि पर नज़र रखने में मदद करती है।
      • IoT से जुड़े मृदा सेंसर (Soil Sensor) नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटैशियम, pH और जैविक कार्बन से संबंधित रीयल-टाइम डेटा प्रदान करते हैं।
    • सटीक आपूर्ति तंत्र:
      • ड्रोन आधारित छिड़काव, GPS-निर्देशित उर्वरक लगाने वाले उपकरण और वैरिएबल रेट तकनीक (VRT) उर्वरकों को सटीक रूप से लगाने की सुविधा देते हैं।
      • नैनो-उर्वरक परिशुद्ध कृषि (PA) के साथ पूरी तरह एकीकृत होते हैं क्योंकि इन्हें माइक्रो-डोज़ और लक्षित छिड़काव की आवश्यकता होती है, जिससे लीकिंग तथा वाष्पीकरण के कारण होने वाली हानि कम होती है।
    • साइट-स्पेसिफिक न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट (SSNM):
      • परिशुद्ध कृषि (PA) मृदा परीक्षण, भौगोलिक मानचित्रण, IoT सेंसर और ड्रोन से प्राप्त डेटा का उपयोग करके मृदा में विविधता, नमी, पोषक तत्त्वों का स्तर एवं फसल की स्थिति का आकलन करता है।
      • इससे किसान केवल आवश्यक स्थान पर और केवल आवश्यक मात्रा में उर्वरक का प्रयोग कर पाते हैं, जिससे नुकसान कम होता है।
    • परिणाम-आधारित नीति ढाँचा को सक्षम बनाना:
      • परिशुद्ध कृषि (PA) मापन योग्य डेटा उत्पन्न करता है, जिससे सरकार सब्सिडी को ऐसे परिणामों की ओर ले जा सकती है जो मापनीय हों, जैसे- प्रति हेक्टेयर कम उर्वरक की खपत, मिट्टी के स्वास्थ्य में सुधार आदि।
      • यह न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट में परफॉर्मेंस-लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) शैली के लिये आवश्यक निगरानी और सत्यापन की सुविधा भी प्रदान करता है।

    निष्कर्ष:

    मृदा स्वास्थ्य को बहाल करने, पर्यावरणीय स्थिरता सुनिश्चित करने और दीर्घकालिक कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिये परिणाम-आधारित न्यूट्रिएंट मैनेजमेंट की ओर बदलाव अत्यंत आवश्यक है। नैनो-उर्वरक तथा परिशुद्ध कृषि उपकरण लक्षित और मापन योग्य आवेदन के माध्यम से पोषक तत्त्वों के उपयोग की दक्षता को काफी बढ़ा सकते हैं। इन नवाचारों को नीति में शामिल करना भारत को वैज्ञानिक, कुशल एवं सतत उर्वरक प्रणाली बनाने में मदद कर सकता है, जो आत्मनिर्भर भारत व जलवायु-प्रतिरोधी कृषि के लक्ष्यों के अनुरूप हो।