• प्रश्न :

    प्रश्न. पाल व चोल काल की कांस्य मूर्तिकला परम्पराओं की तुलना कीजिये। यह कलागत भिन्नताएँ दोनों साम्राज्यों के सामाजिक-धार्मिक परिवेशों के अंतर को किस प्रकार प्रतिबिंबित करती हैं? (150 शब्द)

    08 Dec, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 1 संस्कृति

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • काल का उल्लेख कीजिये और उनकी मूर्तिकला परंपरा का संक्षिप्त परिचय दीजिये।
    • मुख्य भाग में सौंदर्यशास्त्रीय शैली, तकनीक और सामाजिक-धार्मिक संदर्भ के आधार पर दोनों की तुलना कीजिये।
    • निष्कर्ष में उनकी विशिष्ट और अद्वितीय प्रकृति को रेखांकित कीजिये।

    परिचय: 

    पाल (8वीं–12वीं शताब्दी ई.) और चोल (9वीं–13वीं शताब्दी ई.) साम्राज्यों ने भारत की दो सबसे परिष्कृत कांस्य मूर्तिकला परंपराओं का पोषण किया। जहाँ दोनों ने प्राचीन शास्त्रीय शैलियों से प्रेरणा ली, उनके शैलीगत चयन, विषय तथा तकनीक में महत्त्वपूर्ण अंतर था। ये अंतर उनके विभिन्न धार्मिक परिवेश, संरक्षक नेटवर्क एवं सांस्कृतिक भौगोलिक स्थितियों में निहित थे।

    मुख्य भाग

     रूप और सौंदर्य शैली

    • पाल कांस्य मूर्तियाँ: इनकी लंबी, दुबली आकृति और शांत चेहरे उनकी विशेषता हैं। ये मूर्तियाँ शांत, ध्यानमग्न मुद्रा में दिखाई देती हैं, जो नालंदा, विक्रमशिला तथा ओदंतपुरी के सामाजिक और भिक्षु-परंपरागत परिवेश को दर्शाती हैं।
      • वस्त्राभूषण का चित्रण सूक्ष्म एवं रेखीय है और आभूषणों की सजावट पूर्वी भारतीय कला शब्दावली से प्रेरित है।
      • उदाहरण के लिये अवलोकितेश्वर, तारा और मंजुश्री की कांस्य मूर्तियाँ।
    • चोल कांस्य मूर्तियाँ: चोल मूर्तियाँ सटीक, जीवंत आकृति और गतिशील मुद्राओं (त्रिभंग, नटराज मुद्रा) के लिये प्रसिद्ध हैं। इनका मुख्य ध्यान गति, जीवंतता तथा लयबद्ध सुंदरता पर केंद्रित है।
      • शिव नटराज की मूर्तियाँ तरलता, शारीरिक सटीकता और आदर्शीकृत मानव रूप को प्रदर्शित करती हैं।

     तकनीक और शिल्प कौशल

    • पाल: ये लॉस्ट-वैक्स तकनीक हेतु प्रसिद्ध हैं, लेकिन इनमें जटिल प्रतीकात्मकता और वज्रयान बौद्ध धर्म के लिये आवश्यक प्रतीकात्मक विशेषताओं पर विशेष ध्यान दिया गया है।
      • पाल कलाकारों ने उच्च-टिन कांस्य का उपयोग किया, जिससे इन मूर्तियों में विशिष्ट गहरी चमक उत्पन्न होती थी।
      • उदाहरण के लिये भूमि-स्पर्श मुद्रा में बैठे बुद्ध पाल काल के गहरे रंगीन फिनिश का एक विशिष्ट उदाहरण हैं।
    • चोल: इन्होंने ‘सिरे पेरद्यू’ (लॉस्ट-वैक्स) तकनीक को बेमिसाल निपुणता के साथ परिष्कृत किया। चोलों ने खोखले ढाले हुए, पोर्टेबल काँसे की मूर्तियाँ बनाईं, जिनका उपयोग मंदिर के जुलूसों में होता था और यह कला का सार्वजनिक अनुष्ठानों के साथ एकीकरण दर्शाता है।

    सामाजिक-धार्मिक संदर्भ

    • पाल: महायान–वज्रयान बौद्ध धर्म के संरक्षक के रूप में पाल शासकों ने विद्वानों और मठों की संस्कृति को बढ़ावा दिया। उनकी मूर्तियाँ मुख्य रूप से मठों, विद्वानों तथा धार्मिक अनुष्ठानों में लगे साधकों के लिये बनाई जाती थीं, इसलिये इनमें ध्यानमय एवं गूढ़ प्रतीकात्मक चित्रण दिखाई देता है।
      • उदाहरण के लिये काँसे की मूर्तियाँ, जैसे– मंजुश्री और मैत्रेय मुख्य रूप से मठों के मंदिरों और तांत्रिक अनुष्ठानों (ध्यान, मंडल दान तथा सुरक्षा संबंधी कर्मकांड) के लिये बनाई जाती थीं।
    • चोल: गहराई से मंदिर-केंद्रित, भक्ति-प्रधान समाज। शाही संरक्षण ने शैव और वैष्णव भक्ति को बढ़ावा दिया इसलिये काँसे की मूर्तियाँ  उत्सवों (जुलूसों) के लिये बनाई जाती थीं, जिससे देवता तथा भक्त के बीच निकटता एवं संवाद संभव हो सके।
      • उदाहरण के लिये चोल शासन व्यवस्था मंदिर-केंद्रित और भक्ति-प्रेरित थी।
      • विष्णु और पार्वती की उत्सव मूर्तियाँ मंदिर पूजा और सार्वजनिक पर्वों (जैसे जुलूस तथा अरुद्र/प्रदोष अनुष्ठान) के लिये निर्मित की जाती थीं।

    निष्कर्ष

    पाल और चोल कांस्य परंपराएँ, यद्यपि साझा भारतीय कलात्मक विरासत में निहित थीं, फिर भी अलग-अलग धार्मिक और सांस्कृतिक दिशाओं में विकसित हुईं। पाल शैली बौद्ध बौद्धिक परंपरा तथा अनुष्ठानवाद को अभिव्यक्त करती है, जबकि चोल सौंदर्यशास्त्र सार्वजनिक भक्ति, आनुष्ठानिक गतिशीलता एवं मंदिर-केंद्रित धार्मिकता को दर्शाता है। ये दोनों मिलकर मध्यकालीन भारतीय आध्यात्मिकता व शिल्प कौशल का एक समृद्ध स्वरूप प्रस्तुत करती हैं।