• प्रश्न :

    प्रश्न. “एक सिविल सेवक की सफलता उसकी संज्ञानात्मक क्षमता से अधिक उसकी भावनात्मक दक्षता पर निर्भर करती है।” क्या आप सहमत हैं? उदाहरणों के साथ स्पष्ट कीजिये। (150 शब्द)

    27 Nov, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • लोक सेवाओं में भावनात्मक दक्षता और संज्ञानात्मक क्षमता को परिभाषित करें।
    • वास्तविक उदाहरणों के साथ समझाएं कि भावनात्मक दक्षता प्रभावी प्रशासन को कैसे बढ़ावा देती है।
    • संज्ञानात्मक कौशल की सहायक भूमिका को संक्षेप में स्वीकार करें।
    • निष्कर्ष यह निकलता है कि सार्वजनिक सेवा में सफलता में भावनात्मक दक्षता प्रायः निर्णायक कारक बन जाती है।

    परिचय:

    लोक सेवक जटिल सामाजिक-राजनीतिक परिवेश में कार्य करते हैं, जहाँ लिये गये निर्णयों का विभिन्न और विविध हितधारकों पर प्रभाव पड़ता है। यद्यपि नीति-निर्माण के लिये संज्ञानात्मक क्षमता (Cognitive Ability)— जैसे: ज्ञान, विश्लेषणात्मक कौशल और तार्किक विवेक अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, परंतु भावनात्मक दक्षता (Emotional Competence)— जैसे: आत्म-जागरूकता, सहानुभूति, स्व-नियमन एवं सामाजिक कौशल प्रायः प्रभावी क्रियान्वयन, संघर्ष-प्रबंधन व नैतिक निर्णय-निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाती है। इसलिये वास्तविक प्रशासनिक परिस्थितियों में केवल संज्ञानात्मक क्षमता (CA) की अपेक्षा भावनात्मक दक्षता (EC) अधिक निर्णायक सिद्ध होती है।

    मुख्य भाग: 

    लोक प्रशासन में भावनात्मक दक्षता का महत्त्व अधिक है।

    • जनता की शिकायतों का निपटान और नागरिकों के साथ संवाद: सिविल सेवकों को प्रतिदिन ऐसे नागरिकों से संवाद करना पड़ता है, जो असंतोष, क्रोध अथवा मानसिक पीड़ा की स्थिति में होते हैं।
      • उदाहरण: उदाहरण के लिये, भूमि अधिग्रहण विवाद के दौरान कोई ज़िला कलेक्टर यदि विस्थापित परिवारों की बात धैर्यपूर्वक सुनता है, उनके प्रति सहानुभूति दिखाता है और पुनर्वास योजनाओं को स्पष्ट रूप से संप्रेषित करता है, तो वह उस अधिकारी की तुलना में कहीं अधिक प्रभावी होता है, जो केवल विधिक प्रावधानों को सख्ती से लागू करता है। भावनात्मक दक्षता विश्वास-निर्माण करती है और अंतर्विरोध को कम करती है।
    • संकट एवं आपदा प्रबंधन: बाढ़, महामारी, दुर्घटना जैसी आपदाओं के दौरान शांत रहने, टीमों का समन्वय करना और जनता को आश्वस्त करना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
      • उदाहरण: कोविड-19 के दौरान ज़िला स्तरीय प्रतिक्रिया का नेतृत्व करने वाले अधिकारियों ने टीमों को प्रेरित रखने, जनता के भय को नियंत्रित करने और प्रवासी संकट का मानवीय समाधान खोजने में उच्च भावनात्मक दक्षता (EC) का प्रदर्शन किया। यह दर्शाता है कि केवल संज्ञानात्मक क्षमता मानवीय पीड़ा का प्रबंधन नहीं कर सकती; भावनात्मक दक्षता करुणामय और प्रभावी निर्णय-निर्माण को संभव बनाती है।
    • टीमों का प्रबंधन और सेवा आपूर्ति में सुधार: अधिकांश प्रशासनिक परिणाम विभिन्न विभागों के बीच समन्वित कार्य पर निर्भर करते हैं।
      • उदाहरण: उदाहरण के लिये, कोई पुलिस अधीक्षक यदि अधीनस्थों को प्रेरित करता है, उनके तनाव को समझता है और आंतरिक विवादों का समाधान करता है, तो पुलिस की कार्यकुशलता एवं उत्तरदायित्व में वृद्धि होती है। भावनात्मक दक्षता मनोबल को सुदृढ़ करती है और कार्य-तनाव को कम करती है, जो पुलिस, स्वास्थ्य और राजस्व प्रशासन जैसे उच्च-दबाव वाले क्षेत्रों के लिये एक आवश्यक शर्त है।
    • राजनीतिक और सामाजिक दबावों का प्रबंधन: लोक सेवकों को प्रायः राजनीतिक हस्तक्षेप, स्थानीय सत्ता के शक्ति-संतुलन और सामुदायिक संवेदनशीलताओं का सामना करना पड़ता है।
      • उदाहरण: कोई ज़िला मजिस्ट्रेट यदि विधिक दायित्वों के साथ-साथ निर्वाचित प्रतिनिधियों से कूटनीतिक संवाद बनाकर चलता है, तो कल्याणकारी योजनाओं का क्रियान्वयन अधिक सुचारु होता है। भावनात्मक परिपक्वता अंतर्विरोध से बचाती है और सत्यनिष्ठा से समझौता किये बिना नीति-निरंतरता सुनिश्चित करती है।
    • नैतिक निर्णय निर्माण: भावनात्मक दक्षता/बुद्धिमत्ता नैतिक साहस, वंचित वर्गों के प्रति संवेदनशीलता और निष्पक्षता को प्रोत्साहित करती है।
      • उदाहरण: कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थियों के चयन के समय कोई अधिकारी यदि सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलताओं को समझते हुए राजनीतिक दबाव का प्रतिरोध करता है, तो लाभ वास्तविक पात्र व्यक्तियों तक पहुँच पाता है। इस प्रकार भावनात्मक दक्षता नैतिक मूल्यों को प्रशासनिक विवेक से जोड़ने में सहायक होती है।
    • संघर्ष समाधान और वार्ता: लोक सेवकों को प्रायः परस्पर विरोधी समूहों— किसान बनाम उद्योग, श्रमिक बनाम प्रबंधन, समुदाय बनाम प्रशासन के बीच मध्यस्थता करनी पड़ती है।
      • उदाहरण: विरोध प्रदर्शनों/आंदोलनों के दौरान ज़िला प्रशासन द्वारा अपनाया गया सहानुभूतिपूर्ण एवं संवाद-आधारित दृष्टिकोण, बल-प्रयोग की तुलना में अधिक प्रभावी ढंग से तनाव को कम करता है। भावनात्मक दक्षता हितधारकों की भावनाओं को समझने और संतुलित समाधान तैयार करने में सहायक होती है।

    संज्ञानात्मक क्षमता की भूमिका – आज भी महत्त्वपूर्ण है

    • संज्ञानात्मक क्षमता नीतियों के प्रारूपण, विधि की व्याख्या, आँकड़ों के विश्लेषण और साक्ष्य-आधारित कार्यक्रमों की रूपरेखा तैयार करने के लिये अनिवार्य है।
    • यह तर्कसंगत निर्णय-निर्माण और प्रशासनिक योजना बनाने के लिये आवश्यक बौद्धिक आधार प्रदान करती है।
    • हालाँकि, वास्तविक परिस्थितियों में व्यवहार को निर्देशित करने के लिये भावनात्मक दक्षता के बिना केवल संज्ञानात्मक कौशल अपर्याप्त सिद्ध होते हैं।
    • सहानुभूति, धैर्य या भावनात्मक स्व-नियमन से वंचित अधिकारी, उच्च बौद्धिक क्षमता के बावजूद नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू नहीं कर पाते।
    • अतः सफल लोक-सेवा के लिये संज्ञानात्मक क्षमता के साथ-साथ भावनात्मक दक्षता का समन्वय होना आवश्यक है।

    निष्कर्ष

    यद्यपि भावनात्मक दक्षता और संज्ञानात्मक क्षमता—दोनों आवश्यक हैं, परंतु वास्तविक प्रशासनिक सफलता इस बात पर अधिक निर्भर करती है कि लोक सेवक जनता के साथ किस प्रकार संवाद और व्यवहार करते हैं, न कि केवल इस पर कि वे कितना जानते हैं। भावनात्मक दक्षता विश्वास-निर्माण, संघर्ष-निवारण, नैतिक आचरण और मानवीय शासन को संभव बनाती है, जो एक लोक-सेवक के लिये अपरिहार्य गुण हैं। इस प्रकार, भावनात्मक दक्षता प्रायः वह निर्णायक गुण बन जाती है, जो प्रशासनिक ज्ञान को प्रभावी एवं नागरिक-केंद्रित सार्वजनिक सेवा में रूपांतरित करती है।