• प्रश्न :

    प्रश्न. “अफ्रीका के साथ भारत की सहभागिता अब एक विकास-केंद्रित और माँग-आधारित साझेदारी की ओर अग्रसर हुई है। इस विकसित हो रहे संबंध को आकार देने वाले प्रमुख कारकों तथा चुनौतियों का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये।” (250 शब्द)

    25 Nov, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 2 अंतर्राष्ट्रीय संबंध

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • भारत-अफ्रीका संबंधों की बदलती प्रकृति का संक्षेप में परिचय दीजिये।
    • इस विकसित होते रिश्ते को आकार देने वाले प्रमुख कारकों और चुनौतियों का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये।
    • आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    अफ्रीका के साथ भारत के संबंधों में गहन रूपांतरण हुआ है। यह संबंध अब उपनिवेश-विरोधी राजनीतिक एकजुटता से आगे बढ़कर अफ्रीका की विकसित होती प्राथमिकताओं से संचालित विकास-केंद्रित और मांग-आधारित साझेदारी में परिवर्तित हो चुका है। अफ्रीका के आर्थिक विकास, डिजिटल नवाचार एवं जनांकिकीय गतिशीलता के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरने के साथ, भारत का सहयोग अब क्षमता निर्माण, बुनियादी अवसंरचना, डिजिटल सार्वजनिक वस्तुओं और पारस्परिक लाभकारी व्यापार पर केंद्रित है।

    मुख्य भाग: 

    भारत और अफ्रीका के बीच विकसित हो रही साझेदारी को गति देने वाले प्रमुख कारक

    • आर्थिक पूरकता और विस्तारित व्यापार: भारत और अफ्रीका उल्लेखनीय आर्थिक पूरकता साझा करते हैं।
      • अफ्रीका महत्त्वपूर्ण कच्चे माल उपलब्ध कराता है, जबकि भारत निर्मित वस्तुएँ, फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग उत्पाद और डिजिटल प्रौद्योगिकी प्रदान करता है।
      • सत्र 2019-20 में द्विपक्षीय व्यापार 56 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर सत्र 2024-25 में 100 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक हो गया है, जो मज़बूत आर्थिक गति को दर्शाता है। 
        • भारत का लक्ष्य किफायती वस्तुओं, दूरसंचार समाधानों और स्वास्थ्य देखभाल उत्पादों के लिये अफ्रीका की बढ़ती मांग का लाभ उठाते हुए 2030 तक निर्यात को दोगुना करके 200 अरब अमेरिकी डॉलर तक पहुँचाना है।
    • औद्योगिक एवं अवसंरचना विकास: अफ्रीका के औद्योगीकरण में भारत का बढ़ता निवेश साझा समृद्धि के प्रति दीर्घकालिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।
      • भारतीय कंपनियों ने केन्या, नाइजीरिया और दक्षिण अफ्रीका में विनिर्माण इकाइयाँ स्थापित की हैं (विशेष रूप से फार्मास्यूटिकल्स और IT क्षेत्र में) जिससे रोज़गार का सृजन हो रहा है तथा क्षेत्रीय मूल्य शृंखलाओं को समर्थन मिल रहा है।
      • भारत, लॉजिस्टिक्स साझेदारी, प्रधानमंत्री गति शक्ति से जुड़े परिवहन गलियारों एवं स्मार्ट-सिटी सहयोग के माध्यम से अफ्रीका के बुनियादी अवसंरचना के विकास में भी योगदान देता है। 
      • वर्ष 2025 में अनुमानित 4% GDP वृद्धि के साथ, अफ्रीका भारतीय व्यवसायों के लिये विस्तार का एक प्रमुख अवसर प्रस्तुत करता है।
    • सामरिक एवं रक्षा सहयोग: रक्षा कूटनीति, आतंकवाद-रोधी प्रशिक्षण और समुद्री सहयोग के माध्यम से अफ्रीका में भारत की रणनीतिक उपस्थिति का विस्तार हो रहा है। 
      • हिंद महासागर क्षेत्र में समुद्री डकैती, उग्रवाद और अस्थिरता को लेकर साझा चिंताओं के साथ, भारत संयुक्त अभ्यासों, हाइड्रोग्राफी, निगरानी और क्षमता-निर्माण में अफ्रीकी नौसेनाओं के साथ सहयोग करता है।
      • अफ्रीका में भारत की सामरिक उपस्थिति अफ्रीका इंडिया की मैरीटाइम एंगेजमेंट (AIKEYME)- 2025 जैसे प्रयासों के माध्यम से भारत की रणनीतिक उपस्थिति और सुदृढ़ हुई है, जिसमें नौ अफ्रीकी नौसेनाओं के साथ मिलकर समुद्री डकैती-रोधी एवं मानवीय अभियानों की क्षमताओं को बढ़ाया गया है।
    • जन-जन संबंध, विकास सहयोग और मानव क्षमता निर्माण: 30 लाख की अफ्रीकी–भारतीय प्रवासी आबादी तथा बढ़ते शैक्षणिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान इस साझेदारी की भावनात्मक आधारशिला हैं।
      • भारत ने महाद्वीप भर में अवसंरचना, कृषि, ऊर्जा और शिक्षा परियोजनाओं का समर्थन करने के लिये 12 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक के रियायती ऋण एवं 700 मिलियन अमेरिकी डॉलर के अनुदान प्रदान किये हैं।
      • वर्ष 1964 में आरंभ हुए भारतीय तकनीकी और आर्थिक सहयोग कार्यक्रम (ITEC) ने अफ्रीकी पेशेवरों के कौशल-विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
    • साझा ग्लोबल साउथ पहचान और बहुपक्षीय पक्षधरता: भारत और अफ्रीका प्रायः विकासशील देशों के हितों की रक्षा के लिये वैश्विक मंचों पर सहयोग करते हैं।
      • दोनों ही संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, विश्व व्यापार संगठन (WTO) और जलवायु वित्त ढाँचों में सुधार की मांग करते हैं तथा निष्पक्षता, प्रौद्योगिकी अंतरण एवं सतत विकास का समर्थन करते हैं।
      • भारत की अध्यक्षता के दौरान अफ्रीकी संघ को G20 में शामिल किया जाना, अधिक प्रतिनिधिक वैश्विक शासन संरचना को बढ़ावा देने के प्रति भारत की प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

    भारत-अफ्रीका साझेदारी के विकास में बाधा डालने वाली प्रमुख चुनौतियाँ:

    • रणनीतिक निष्क्रियता और राजनयिक संलग्नता में अंतराल: एक महत्त्वपूर्ण बाधा अफ्रीका के साथ भारत की विलंबित राजनीतिक भागीदारी है। 
      • पिछले भारत-अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन के बाद लगभग एक दशक का लंबा अंतराल निरंतर रणनीतिक संवाद की कमी को दर्शाता है, जिससे महाद्वीप पर भारत की नेतृत्वकारी स्थिति कमज़ोर पड़ती है।
    • जटिल सुरक्षा परिदृश्य और कमज़ोर शासन व्यवस्था: अफ्रीका का सुरक्षा वातावरण अस्थिर है, जो इथियोपिया, सूडान एवं मध्य अफ्रीकी गणराज्य जैसे देशों में कई सैन्य तख्तापलट और चल रहे सशस्त्र संघर्षों से चिह्नित है। 
      • कमज़ोर शासन व्यवस्था, उग्रवाद और बढ़ते कट्टरपंथ से रक्षा सहयोग, शांति स्थापना एवं आतंकवाद-रोधी प्रयासों में प्रभावी ढंग से शामिल होने की भारत की क्षमता बाधित होती है।
    • संरचनात्मक आर्थिक और अवसंरचना संबंधी अड़चनें: अफ्रीका की अवसंरचना व्यापार और निवेश को बढ़ावा देने में एक बाधा बनी हुई है। 
      • खंडित परिवहन और लॉजिस्टिक्स प्रणालियाँ, जो मुख्य रूप से संसाधन निर्यात के लिये डिज़ाइन की गई औपनिवेशिक विरासत हैं, लेन-देन लागत को बढ़ाती हैं तथा क्षेत्रीय मूल्य शृंखलाओं के निर्माण के लिये महत्त्वपूर्ण अंतर-अफ्रीकी व्यापार में बाधा डालती हैं। 
    • वित्तीय बाधाएँ और वैश्विक प्रणालीगत पूर्वाग्रह: अफ्रीकी अर्थव्यवस्थाएँ बिगड़ते ऋण संकट का सामना कर रही हैं, जहाँ एक दशक से भी कम समय में ऋण-से-GDP अनुपात 30% से बढ़कर 60% हो गया है।
      • वैश्विक वित्तीय संस्थानों में मौजूद प्रणालीगत पूर्वाग्रहों से और भी बढ़ जाने वाली यह वित्तीय अस्थिरता, अफ्रीकी देशों के विकास परियोजनाओं के लिये उपलब्ध राजकोषीय संसाधनों को सीमित करती है।
    • तीव्र बहुध्रुवीय भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्द्धा: भारत चीन जैसे प्रमुख प्रतिस्पर्द्धियों के साथ प्रभाव के लिये प्रतिस्पर्द्धा करता है, जिसने बेल्ट एंड रोड पहल के माध्यम से भारी निवेश किया है तथा व्यापक सहायता एवं अवसंरचना परियोजनाओं के साथ-साथ जिबूती में अपना पहला विदेशी सैन्य अड्डा स्थापित किया है। 

    अफ्रीका के साथ द्विपक्षीय संबंधों को मज़बूत करने के प्रमुख उपाय:

    • एक सशक्त बहु-हितधारक रणनीतिक संवाद को संस्थागत रूप देना: भारत को सरकारों, निजी क्षेत्र के प्रतिस्पर्द्धियों, शिक्षाविदों और नागरिक समाज के हितधारकों को शामिल करते हुए एक वार्षिक भारत-अफ्रीका रणनीतिक साझेदारी मंच की स्थापना करनी चाहिये ताकि निरंतर, अनुकूलनीय नीतिगत संवाद और संयुक्त एजेंडा निर्धारण को सुविधाजनक बनाया जा सके। 
    • अफ्रीकी प्राथमिकताओं के अनुरूप क्षेत्र-विशिष्ट रोडमैप तैयार करना: भारत को अफ्रीकी सरकारों और क्षेत्रीय आर्थिक समुदायों (REC) के साथ परामर्श करके विस्तृत क्षेत्रीय एवं देश-विशिष्ट रोडमैप सह-विकसित करने की आवश्यकता है। 
    • नवोन्मेषी तंत्रों के माध्यम से वित्तीय सहयोग का विस्तार: अफ्रीका की बढ़ती ऋण-संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए भारत को रियायती ऋण-रेखाओं का विस्तार करना चाहिये, मिश्रित वित्त साधनों का विकास करना चाहिये और बहुपक्षीय ऋण-राहत प्रयासों में भागीदारी बढ़ानी चाहिये।
    • क्षमता निर्माण और कौशल विकास कार्यक्रमों का विस्तार: भारत को अफ्रीकी देशों में ITEC कार्यक्रमों, छात्रवृत्तियों और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों का विस्तार करना चाहिये।
    • व्यापार और भुगतान तंत्रों का आधुनिकीकरण: द्विपक्षीय व्यापार को महत्त्वपूर्ण रूप से बढ़ावा देने और लेन-देन लागत को कम करने के लिये, भारत को पारंपरिक डॉलर-आधारित निपटान से आगे बढ़कर व्यापार लॉजिस्टिक्स को सरल बनाना चाहिये।
    • डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना में सहयोग को गहन करना: भारत को अफ्रीका के डिजिटल परिवर्तन का समर्थन करने के लिये UPI, डिजिटल पहचान प्रणाली और ई-गवर्नेंस जैसी डिजिटल सार्वजनिक साधनों में अपनी विशेषज्ञता का लाभ उठाना चाहिये। 
    • जन-से-जन और सांस्कृतिक संबंधों को सुदृढ़ करना: शैक्षणिक आदान-प्रदान, सांस्कृतिक कूटनीति और प्रवासी सहभागिता को बढ़ाने से मज़बूत सामाजिक पूंजी का निर्माण होगा।
    • समुद्री सुरक्षा और रक्षा साझेदारियों को सशक्त करना: भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करने के लिये समुद्री क्षेत्रीय जागरूकता, संयुक्त सैन्य अभ्यासों एवं समुद्री डकैती-रोधी अभियानों में सहयोग को और गहन किया जाना चाहिये।

    निष्कर्ष: 

    भारत-अफ्रीका संबंध साझा मूल्यों और पारस्परिक आकांक्षाओं पर आधारित एक ऐतिहासिक साझेदारी का उत्कृष्ट उदाहरण हैं। जैसा कि डॉ. शशि थरूर ने संयुक्त राष्ट्र में स्पष्ट शब्दों में कहा, “भारत और अफ्रीका ने समान पथ पर चलकर स्वतंत्रता एवं विकास के मूल्यों और सपनों को साझा किया है।” इस दृष्टिकोण को साकार करने के लिये, भारत को रणनीतिक संवादों को संस्थागत रूप देना चाहिये, निवेश को अफ्रीकी प्राथमिकताओं के अनुरूप ढालना चाहिये, क्षमता निर्माण को बढ़ावा देना चाहिये और स्थायी सांस्कृतिक एवं डिजिटल संबंधों को मज़बूत करना चाहिये। ऐसा बहुआयामी दृष्टिकोण एक सुदृढ़ और न्यायसंगत साझेदारी सुनिश्चित करेगा, जो सतत विकास एवं वैश्विक एकजुटता को आगे बढ़ाएगी।