• प्रश्न :

    प्रश्न. प्रारंभिक भारतीय अभिलेखों में शिव-तांडव के चित्रण तथा धार्मिक एवं कलात्मक परंपराओं में इसके प्रतीकात्मक महत्त्व पर चर्चा कीजिये। (150 शब्द)

    17 Nov, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 1 संस्कृति

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण: 

    • शिव के तांडव की संक्षिप्त परिभाषा के साथ उत्तर लेखन की शुरुआत कीजिये। 
    • प्रारंभिक भारतीय शिलालेखों में शिव के तांडव के चित्रण पर चर्चा कीजिये। 
    • धार्मिक और कलात्मक परंपराओं में इसके प्रतीकात्मक अर्थ का वर्णन कीजिये। 
    • उचित निष्कर्ष दीजिये। 

    परिचय: 

    शिव-तांडव नृत्य, जो एक प्रबल, व्यापक और ब्रह्मांडीय नृत्य है, भारत की आध्यात्मिक तथा कलात्मक विरासत के सबसे स्थायी रूपकों में से एक है। प्रारंभिक ग्रंथों में इसे विस्मयकारी एवं रूपांतरणकारी बताया गया है, जो ब्रह्मांड को संचालित करने वाली गतिशील शक्तियों का प्रतीक है। प्राचीन शिलालेख इस नृत्य को ऐतिहासिक स्मृति में और भी गहराई से स्थापित करते हैं तथा यह दर्शाते हैं कि धार्मिक तत्त्वदर्शन और कला-अभिव्यक्ति का विकास इस रूपक के इर्द-गिर्द किस प्रकार हुआ।

    मुख्य भाग: 

    प्रारंभिक भारतीय शिलालेखों में शिव का तांडव: 

    • प्रतिनिधित्व और प्रतीकात्मक अर्थ: शिव का ब्रह्मांडीय नृत्य, तांडव, भारत की धार्मिक कल्पना, कलात्मक शब्दावली और दार्शनिक चिंतन में एक केंद्रीय स्थान रखता है।प्राचीन भारतीय शिलालेख, मंदिर कला और पाठ्य परंपराओं के साथ मिलकर, इस बात की बहुमूल्य जानकारी प्रदान करते हैं कि किस प्रकार यह रूपांकन दिव्य शक्ति की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति से एक परिष्कृत सौंदर्य एवं आध्यात्मिक अवधारणा में विकसित हुआ।
    • गुप्त काल के शिलालेखों (चौथी-छठी शताब्दी ईस्वी) में शिव को सृष्टि और विनाश का दिव्य नृत्य करने वाले ईश्वर के रूप में वर्णित किया गया है। ऐसे अभिलेख प्रायः मंदिरों से जुड़े शिलालेखों में मिलते हैं, जो बताते हैं कि उस समय यह नृत्य धार्मिक रूप से अत्यंत पवित्र माना जाता था।
    • कांचीपुरम के पल्लव-कालीन अभिलेख (7वीं-8वीं शताब्दी ईस्वी) शिव के आनंद-तांडव अर्थात् आनंदमय नृत्य का उल्लेख करते हैं, जिससे एक स्थापित प्रतिमात्मक परंपरा का संकेत मिलता है। यह काल दक्षिण भारत में नटराज प्रतिमा के सुस्पष्ट रूप में विकसित होने का चरण माना जाता है।
    • चोल शिलालेख (10वीं-12वीं शताब्दी ईस्वी) इस परंपरा को और आगे बढ़ाते हुए शिव को एक साथ ब्रह्माण्डीय नर्त्तक और चिदंबरम के संरक्षक देवता के रूप में प्रतिष्ठित करते हैं।
      • ताम्रपत्रों पर अंकित अनुदान और मंदिर के शिलालेख चिदंबरम रहस्य और नृत्य से जुड़े अनुष्ठानिक प्रदर्शनों पर ज़ोर देते हैं, जो इस अवधारणा की धार्मिक परिपक्वता को दर्शाते हैं।

    धार्मिक परंपराओं में प्रतीकात्मक अर्थ

    • ब्रह्मांडीय चक्र: शिव का तांडव सृष्टि, संरक्षण, संहार, आवरण और अनुग्रह—इन पाँच क्रियाओं अर्थात् पंचकृत्य की निरंतर प्रक्रिया का प्रतीक है। यह ब्रह्माण्ड की लयबद्ध व्यवस्था को अभिव्यक्त करता है।
    • अज्ञान पर ज्ञान की विजय: नृत्य दिव्य ज्ञान के विजय का प्रतीक है। शिव के चरणों तले दबा हुआ दैत्य ‘अपस्मार’ अज्ञान का प्रतीक है। यह नृत्य दिव्य ज्ञान की विजय को निरूपित करता है।
    • गतिशील और स्थिर ऊर्जा का मिलन: शिव (स्थिरता) और शक्ति (गति) के परस्पर संबंध को तांडव में निहित किया गया है, जो उस आध्यात्मिक संतुलन का प्रतीक है जिससे अस्तित्व का संरक्षण होता है।
    • आध्यात्मिक मुक्ति: भक्तों के लिये यह नृत्य ‘आनंद (परमानंद)’ की अनुभूति और दिव्य कृपा द्वारा मोक्ष की संभावना का प्रतीक है।

    कलात्मक और सौंदर्यपरक परंपराएँ

    • मूर्तिकला: एलोरा से चिदंबरम तक, नटराज प्रतिमा शास्त्रीय भारतीय कला की पराकाष्ठा मानी जाती है। इसमें ज्यामिति, संतुलन और सांकेतिक मुद्राओं का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।
    • शास्त्रीय नृत्य: भरतनाट्यम और ओडिसी जैसे शास्त्रीय नृत्य रूपों में तांडव तत्त्वों का समावेश है, जिससे शिव को नृत्य के दिव्य संरक्षक के रूप में स्थापित किया गया है।
    • मंदिर वास्तुकला: मंडपों को प्रायः अनुष्ठानिक नृत्य के लिये उपयुक्त स्थान के रूप में रचा गया, जो गति के ब्रह्माण्डीय महत्त्व को प्रतिफलित करता है।

    निष्कर्ष:

    प्राचीन भारतीय अभिलेखों और कलात्मक परंपराओं में प्रतिबिंबित शिव का तांडव धर्मशास्त्र, दर्शन और सौंदर्यशास्त्र का एक समन्वित रूप प्रस्तुत करता है। यह उस भारतीय विश्वदृष्टि को अभिव्यक्त करता है, जहाँ दिव्य नृत्य ब्रह्माण्डीय सामंजस्य, नैतिक व्यवस्था और आध्यात्मिक उत्कर्ष का रूपक बन जाता है।