प्रश्न. वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह उद्धरण आपको क्या संदेश देता है?
“ज्ञान का सर्वोच्च रूप समानुभूति है, क्योंकि इसमें व्यक्ति अपने अहंकार से परे दूसरों के अनुभव और संवेदनाओं को समझने का प्रयास करता है।”
— बिल बुलार्ड (150 शब्द)
उत्तर :
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हल करने का दृष्टिकोण:
- उद्धरण की सटीक व्याख्या से उत्तर लेखन की शुरुआत कीजिये।
- उद्धरण में निहित प्रमुख अवधारणाओं पर चर्चा कीजिये।
- उपयुक्त उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वर्तमान संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता पर प्रकाश डालिये।
- आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष दीजिये।
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परिचय:
- उपरोक्त उद्धरण, “ज्ञान का सर्वोच्च रूप समानुभूति है, क्योंकि इसमें व्यक्ति अपने अहंकार से परे दूसरों के अनुभव और संवेदनाओं को समझने का प्रयास करता है”— मानव समझ की प्रकृति के प्रति गहन नैतिक दृष्टि प्रस्तुत करता है।
- यह इस बात पर प्रकाश डालता है कि समानुभूति, मात्र बौद्धिक ज्ञान के विपरीत, लोगों और परिस्थितियों की एक गहन एवं अधिक करुणापूर्ण समझ प्रदान करती है।
- समानुभूति व्यक्तियों को सतही तर्क से आगे बढ़ने, भावनात्मक वास्तविकताओं से जुड़ने और दूसरों के साथ एक सच्चा संबंध विकसित करने में सक्षम बनाती है।
मुख्य भाग:
उद्धरण में निहित प्रमुख अवधारणाएँ।
- ज्ञान की सर्वोच्च अवस्था: इसका तात्पर्य यह है कि सूचना, तर्क और शैक्षणिक शिक्षा से परे एक श्रेष्ठ प्रकार की समझ का अस्तित्व है।
- यह विश्लेषण पर नहीं, बल्कि दूसरों की भावनात्मक एवं अनुभवात्मक वास्तविकताओं को गहराई से समझने की क्षमता पर आधारित है।
- ऐसा ज्ञान विवेक, संवेदनशीलता और मानवीय निर्णय क्षमता को बढ़ावा देता है।
- समानुभूति: समानुभूति से तात्पर्य किसी अन्य व्यक्ति के अनुभवों को महसूस करने, समझने और साझा करने की क्षमता से है।
- यह सहानुभूति (Sympathy) से अलग है, जो केवल दूर से ही किसी की भावनाओं को स्वीकार करती है।
- समानुभूति यह मांग करती है कि हम किसी अन्य व्यक्ति की भावनात्मक स्थिति में प्रवेश करें और उनकी दृष्टि से दुनिया को देखें।
- यह करुणा (Compassion), भावनात्मक बुद्धिमत्ता (Emotional intelligence) और नैतिक व्यवहार (Ethical behaviour) का आधार है।
- अपने अहंकार पर अंकुश : इसका मतलब है अस्थायी रूप से आत्म-केंद्रितता, कठोर विचारों, निर्णयों और बातचीत या दृष्टिकोणों पर हावी होने की इच्छा को छोड़ देना।
- अहंकार अक्सर सच्ची समझ को रोकता है,क्योंकि यह केवल अपने दृष्टिकोण को प्राथमिकता देता है।
- अहंकार पर अंकुश लगाने से नम्रता, खुलापन और दूसरों के अनुभवों के प्रति सम्मान के लिये जगह बनती है।
- दूसरे के संसार में जीना: इसका अर्थ है- खुद को किसी अन्य व्यक्ति की परिस्थितियों में रखकर कल्पना करना, उनके भय, आशाएँ, दबाव और सीमाओं को समझना।
- इसके लिये गहन श्रवण, नैतिक कल्पना और व्यक्तिगत सुविधा क्षेत्र से बाहर निकलने की इच्छा की आवश्यकता होती है।
- किसी अन्य व्यक्ति की परिस्थितियों में खुद को रखकर जीने से लोगों के बीच मज़बूत संबंध बनते हैं और पूर्वाग्रह, झगड़े एवं दूसरों के प्रति बेरुखी कम हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता
- बढ़ता ध्रुवीकरण, असहिष्णुता और सामाजिक विभाजन के कारण सामाजिक सामंजस्य के लिये समानुभूति अनिवार्य हो गई है।
- डिजिटल युग में तीव्र संचार के साथ-साथ भावनात्मक समझ में कमी भी देखने को मिलती है।
- समानुभूति संघर्ष की बजाय संवाद, शत्रुता की बजाय सहयोग और बहिष्कार की बजाय समावेशन को बढ़ावा देती है।
- भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में समानुभूति सहनशीलता, बहुलतावाद और शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व को बढ़ावा देती है।
प्रशासन और लोक सेवाओं में महत्त्व
- समानुभूति करुणा, सत्यनिष्ठा, न्याय एवं सम्मान जैसे मूल नैतिक मूल्यों को और दृढ़ बनाती है।
- प्रशासनिक अधिकारियों में समानुभूति के लाभ:
- वे नागरिकों की मुश्किलों को समझ पाते हैं जिससे निर्णय अधिक न्यायसंगत बनते हैं।
- वे कठोर और यांत्रिक प्रवर्तन से हटकर जन-केंद्रित शासन अपनाते हैं।
- राज्य और समाज के बीच दृढ़ विश्वास का विकास होता है।
- प्रशासनिक उदाहरण:
- सार्वजनिक वितरण प्रणाली की दुकानों के बाहर वृद्ध जनों तथा दिव्यांग जनों की लंबी कतार देखकर एक ज़िला कलेक्टर द्वारा राशन वितरण के समय में बदलाव करना।
- किसी स्थानीय विवाद में पुलिस अधिकारी द्वारा दोनों समुदायों की बात शांतिपूर्वक सुनकर परामर्श देना और स्थिति को बिगड़ने से रोकना।
- नगर निगम अधिकारी द्वारा बेघर नागरिकों की संरचनात्मक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए कल्याणकारी योजनाओं के लिये फ्लेक्सिबल डॉक्यूमेंटेशन की अनुमति देना।
निष्कर्ष:
आगे की राह में लोकसेवकों को ध्यान से सुनने की क्षमता विकसित करनी चाहिये, नागरिक-केंद्रित प्रशासन अपनाना चाहिये और कमज़ोर वर्गों से संवेदनशीलता के साथ संवाद स्थापित करना चाहिये। भावनात्मक बुद्धिमत्ता, सामुदायिक सहभागिता और आत्म-चिंतन का प्रशिक्षण प्रशासन में समानुभूति को अंतर्निहित कर सकता है जिससे नीतियाँ अधिक समावेशी एवं समाज अधिक करुणामय बन सके।