• प्रश्न :

    प्रश्न 1. “एक लोक सेवक को राजनीतिक रूप से तटस्थ होना चाहिये, लेकिन नैतिक रूप से उदासीन नहीं।” उदाहरणों सहित इस कथन की पुष्टि कीजिये। (150 शब्द)

    07 Aug, 2025 सामान्य अध्ययन पेपर 4 सैद्धांतिक प्रश्न

    उत्तर :

    हल करने का दृष्टिकोण:

    • राजनीतिक तटस्थता और नैतिक उदासीनता की संक्षिप्त व्याख्या से उत्तर लेखन की शुरुआत कीजिये।
    • राजनीतिक तटस्थता और नैतिक संवेदनशीलता के महत्त्व पर चर्चा कीजिये।
    • नैतिक उदासीनता के खतरों पर प्रकाश डालिये।
    • आगे की राह बताते हुए उचित निष्कर्ष दीजिये।

    परिचय:

    एक लोक सेवक लोकतांत्रिक शासन की सत्यनिष्ठा बनाए रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। राजनीतिक निष्पक्षता यह सुनिश्चित करती है कि निर्णय दलगत विचारों से प्रभावित न हों, वहीं नैतिक संवेदनशीलता यह सुनिश्चित करती है कि ऐसे निर्णय न्याय, निष्पक्षता और मानवीय गरिमा के सिद्धांतों के अनुरूप हों। राजनीतिक मामलों में निष्पक्ष रहना प्रशासनिक वस्तुनिष्ठता के लिये आवश्यक है, लेकिन नैतिक उदासीनता अमानवीय, अन्यायपूर्ण या नैतिक दृष्टि से संदिग्ध परिणामों की ओर ले जा सकती है।

    मुख्य भाग:

    राजनीतिक तटस्थता: राजनीतिक तटस्थता सार्वजनिक निर्णय लेने में निष्पक्षता को संदर्भित करती है, चाहे सत्ता में कोई भी दल हो।

    • यह राजनीतिक परिवर्तनों के बावजूद शासन में निरंतरता सुनिश्चित करती है।
    • यह किसी भी राजनीतिक विचारधारा के प्रति पूर्वाग्रह को रोककर जनता का विश्वास बनाती है।
    • यह दलीय एजेंडे पर संवैधानिक सर्वोच्चता को कायम रखती है।
    • उदाहरण: चुनावों के दौरान, ज़िला मजिस्ट्रेट यह सुनिश्चित करते हैं कि आदर्श आचार संहिता सभी पक्षों पर समान रूप से लागू हो और कानून लागू करते समय निष्पक्षता बरतें।

    नैतिक संवेदनशीलता: जहाँ राजनीतिक तटस्थता पक्षपात को रोकती है, वहीं नैतिक संवेदनशीलता प्रशासन में मानवीय मूल्यों के क्षरण को रोकती है।

    • इसके लिये सहानुभूति, नैतिक निर्णय और लोक कल्याण के प्रति प्रतिबद्धता की आवश्यकता होती है।
    • यह “मैं तो बस आदेशों का पालन कर रहा था” जैसी मानसिकता को रोकता है जो अन्याय को उचित ठहरा सकती है।
    • उदाहरण: एक लोक सेवक राजनीतिक दबाव के बावजूद, पर्यावरणीय संधारणीयता और जन स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं का हवाला देते हुए, प्रदूषणकारी उद्योग को मंज़ूरी देने से इनकार कर देता है।

    नैतिक उदासीनता का खतरा: नैतिक उदासीनता अमानवीय शासन को जन्म दे सकती है, जहाँ नियमों को परिणामों की परवाह किये बिना यंत्रवत् लागू किया जाता है।

    • ऐतिहासिक उदाहरण: औपनिवेशिक भारत में भेदभावपूर्ण कानूनों का आँख मूँदकर पालन करने से जनता की पीड़ा और बढ़ गई।
    • समकालीन उदाहरण: संवेदनशील विकल्पों की खोज़ किये बिना मामूली दस्तावेज़ी त्रुटियों के कारण कमज़ोर समूहों को कल्याणकारी लाभों से वंचित करना।

    तटस्थता और नैतिकता में संतुलन:

    • लोकतांत्रिक निष्पक्षता की रक्षा के लिये राजनीतिक प्रभाव को निर्णय लेने से अलग रखना आवश्यक है।
    • यह सुनिश्चित करने के लिये कि निर्णय नागरिकों के हित में हों और न्याय को बनाए रखें, नैतिक तर्क को शामिल किया जाना चाहिये।
    • राजनीतिक आदेशों के बजाय संविधान को नैतिक मार्गदर्शक के रूप में अपनाया जाना चाहिये।
      • उदाहरण: सांप्रदायिक तनाव के दौरान, एक अधिकारी को सभी समुदायों के भड़काने वालों के विरुद्ध कार्रवाई (तटस्थता) करनी चाहिये, लेकिन साथ ही कमज़ोर समूहों को विशेष सुरक्षा (नैतिक कर्त्तव्य) भी प्रदान करनी चाहिये।

    निष्कर्ष:

    एक लोक सेवक की वैधता नैतिक उत्तरदायित्व द्वारा निर्देशित राजनीतिक निष्पक्षता पर आधारित होती है। तटस्थता निष्पक्षता सुनिश्चित करती है, जबकि नैतिकता न्याय सुनिश्चित करती है। वास्तविक शासन वही है जिसमें बिना किसी पक्षपात के, परंतु करुणा और नैतिक दृढ़ता के साथ संविधान के उद्देश्यों, विशेषकर अनुच्छेद 14, नीति निदेशक तत्त्वों तथा सिविल सेवा आचरण नियमों के आदर्शों की पूर्ति की जाये।