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विशेष/इन-डेप्थ: स्टीफन हॉकिंग | 17 Mar 2018 | राज्यसभा

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि
सेलेब्रिटी और आधुनिक विज्ञान के पोस्टर बॉय, अथक योद्धा और कभी हार न मानने वाले तथा सृष्टि सृजन के रहस्यों को आसान बनाने वाले जाने-माने ब्रिटिश भौतिक विज्ञानी और कॉस्मोलॉजिस्ट स्टीफन हॉकिंग का 14 मार्च को कैंब्रिज, ब्रिटेन में निधन हो गया। 8 जनवरी, 1942 को ऑक्सफोर्ड, ब्रिटेन में जन्मे स्टीफन हॉकिंग ने तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद 76 वर्ष का भरपूर और विविधता से भरा जीवन बिताया तथा कई ऐसे वैज्ञानिक और ब्रह्मांडीय रहस्यों पर से पर्दा उठाया, जिनके बारे में पहले बहुत अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं थी। 

लाइलाज बीमारी हुई 
21 साल की आयु में जब पता चला कि उन्हें मोटर न्यूरॉन डिजीज़ Amyotrophic Lateral Sclerosis है और जीवन दो साल से अधिक नहीं, तो भी उन्होंने हार नहीं मानी। शरीर ने काम करना बंद कर दिया, लेकिन इसके बावजूद भी 55 साल जी कर हॉकिंग ने बता दिया कि जिजीविषा प्रबल है तो असंभव को भी संभव बनाया जा सकता है। गंभीर बीमारी होने के बाद भी उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी और कई चौंकाने वाले शोध दुनिया के सामने रखे। वे व्हीलचेयर के सहारे चल पाते थे और एक बेहद आधुनिक कंप्यूटर सिस्टम के ज़रिये पूरी दुनिया से जुड़ते थे। मस्तिष्क को छोड़कर उनके शरीर का कोई भी भाग पूरी क्षमता से काम नहीं कर पाता था, इसलिये वह हमेशा एक विशेष प्रकार की व्हीलचेयर पर कंप्यूटर और अन्य गैजेट्स के ज़रिये अपने विचार रखते थे। स्टीफन हॉकिंग की आवाज़ सीधे उनके मुंह से नहीं, बल्कि उनकी व्हीलचेयर पर लगे कंप्यूटर के स्पीच सिंथेसाइज़र से सुनाई देती थी।

एक नज़र में स्टीफन हॉकिंग
प्रतिष्ठित कैंब्रिज विश्वविद्यालय में सैद्धांतिक ब्रह्मांड के निदेशक हॉकिंग को आइंस्टाइन के बाद सबसे विद्वान भौतिक शास्त्री के रूप में जाना जाता है।

जलवायु परिवर्तन और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर चिंता
जलवायु परिवर्तन को वह गंभीर खतरा मानते थे। उन्होंने चेताया था कि अगर मानव ने अपनी आदतें नहीं सुधारीं तो बढ़ती आबादी का बोझ पृथ्वी को लील जाएगा। उन्होंने यह भी चेतावनी दी थी कि तकनीकी विकास के साथ मिलकर मानव की आक्रामकता ज़्यादा खतरनाक हो गई है। यही प्रवृत्ति परमाणु या जैविक युद्ध के ज़रिये हम सबका विनाश कर सकती है। उनका कहना था कि कोई वैश्विक सरकार ही हमें इससे बचा सकती है, वरना एक दिन मानव जाति ही विलुप्त हो जाएगी। 

हॉकिंग ने कुछ समय पहले जिंदगी में तकनीक के बढ़ते दखल पर चिंता जताते हुए कहा था कि हम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर बहुत उत्साहित हैं, लेकिन आने वाली पीढ़ी इसे मानव सभ्यता के इतिहास की सबसे खराब घटना के तौर पर याद करेगी। उनके अनुसार तकनीक के इस्तेमाल के साथ-साथ हमें उसके संभावित खतरों को भी भाँपना चाहिये।

(टीम दृष्टि इनपुट)

आइंस्टाइन से तुलना सही नहीं 
कुछ जानकारों का मानना है कि स्टीफन हॉकिंग को अपने युग का आइंस्टाइन कहना ठीक नहीं। आइंस्टाइन का दौर प्रयोगों के दौरान मिली सफलताओं को समझने के क्रम में सृष्टि को देखने का नया नजरिया विकसित करने का था, जबकि स्टीफन हॉकिंग का दौर प्रयोगों के ठहराव से उपजी भौतिकी की सबसे बड़ी विभ्रांतियों और उलझावों का था। यह स्थिति पिछले कुछ वर्षों में बदलनी शुरू हुई है तथा सूक्ष्म और विराट, दोनों ही स्तरों के निश्चयात्मक प्रेक्षण आने शुरू हो गए हैं।

स्टीफन हॉकिंग का अपना एक अलग क्लास है और एक धारणा उन्हें वैज्ञानिक के बजाय विज्ञान प्रचारक के रूप में देखने की भी है। 1966 में गणितज्ञ रॉजर पेनरोज़ के साथ मिलकर ब्लैक होल्स पर अपने गणितीय काम की शुरुआत करने से लेकर 1990 के दशक के मध्य तक स्टीफन हॉकिंग गणित और क्वांटम फिज़िक्स की संधि पर गंभीरतम काम में जुटे रहे। 

उन्हें ब्लैक होल्स को लेकर खोजे गए उनके चार नियमों के लिये जाना जाएगा, बाद में जिनके कुछ सीमावर्ती अपवाद भी उन्होंने खोजे। उनके अनुसार ब्लैक होल ऐसी चीज है, जहाँ भौतिकी के दोनों मूलभूत सिद्धांत (Theory of Relativity) और क्वांटम मैकेनिक्स एक ही दायरे में काम करते हैं, जबकि शेष दुनिया के लिये पहले का संबंध विराट से और दूसरे का सूक्ष्म से है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

प्रमुख पुस्तकें: 1988 में वह तब चर्चा में आए, जब उनकी पुस्तक 'ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम'  बाज़ार में आई। यह 243 सप्ताह तक लगातार बेस्ट सेलर बनी और गिनीज़ बुक में शामिल पुस्तक 40 भाषाओं में उपलब्ध है। उनकी इस पुस्तक की 1 करोड़ से ज़्यादा प्रतियाँ बिकी थीं। इसे दुनिया भर में साइंस से जुड़ी सबसे ज़्यादा बिकने वाली पुस्तक माना जाता है। ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने के लिये ‘ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ के अलावा भी उन्होंने 'द ग्रैंड डिज़ाइन', 'यूनिवर्स इन नटशेल', 'माई ब्रीफ हिस्ट्री', 'द थ्योरी ऑफ एवरीथिंग' जैसी कई पुस्तकें लिखीं।

हॉकिंग का ब्लैक होल का सिद्धांत
स्टीफन हॉकिंग की सबसे प्रमुख उपलब्धियों में ब्लैक होल का उनका सिद्धांत है। ब्लैक होल के संबंध में हमारी वर्तमान समझ उनके सिद्धांत पर ही आधारित है। वर्ष 1974 में ‘ब्लैक होल इतने काले नहीं’ शीर्षक से प्रकाशित हॉकिंग के शोध पत्र ने सामान्य सापेक्षता सिद्धांत और क्वांटम भौतिकी के सिद्धांतों के आधार पर यह दर्शाया कि ब्लैक होल अल्प मात्रा में विकिरण उत्सर्जित करते हैं। उन्होंने यह भी प्रदर्शित किया कि ब्लैक होल से उत्सर्जित होने वाला विकिरण क्वांटम प्रभाव के कारण धीरे-धीरे बाहर निकलता है। इस विकिरण प्रभाव के कारण ब्लैक होल अपना द्रव्यमान धीरे-धीरे खोने लगते हैं और उनमें ऊर्जा का भी क्षय होता है। यह प्रक्रिया लंबे अंतराल तक चलने के बाद आखिरकार ब्लैक होल वाष्पन को प्राप्त होते हैं। विशालकाय ब्लैक होल से कम मात्रा में विकिरण का उत्सर्जन होता है, जबकि छोटे ब्लैक होल बहुत तेज़ी से विकिरण का उत्सर्जन करके वाष्प बन जाते हैं।

स्टीफन हॉकिंग का कहना था कि वे यह समझ नहीं पाए कि आइंस्टाइन ने ब्लैक होल्स में यकीन क्यों नहीं किया। उनके सापेक्षता के सिद्धांत के फील्ड समीकरण बताते हैं कि एक विशाल सितारा या गैसों का सघन बादल स्वयं में ही नष्ट होकर एक ब्लैक होल को जन्म दे सकता है। आइंस्टीन खुद इस तथ्य को जानते थे, लेकिन फिर भी उन्होंने किसी तरह खुद को समझा लिया था कि किसी भी धमाके की तरह हर विस्फोट द्रव्यमान या वज़न को बाहर फेंक देने के लिये ही होता है। अर्थात वह मानते थे कि सितारों की मौत होते ही एक धमाके के साथ उसका सारा पदार्थ बाहर छिटक जाता है। लेकिन अगर विस्फोट हो ही नहीं और सितारे की मौत होते ही उसका सारा द्रव्यमान बस उसके एक ही बिंदु में सिमटकर रह जाए तो...?

(टीम दृष्टि इनपुट)

'हॉकिंग रेडिएशन'
क्वांटम थ्योरी के अनुसार, अंतरिक्ष में लगातार कण उत्पन्न होते रहते हैं और वे आपस में टकराते रहते हैं। इनमें से एक कण होता है और दूसरा प्रतिकण; एक में सकारात्मक ऊर्जा होती है और दूसरे में नकारात्मक। ऐसे में कोई नई ऊर्जा उत्पन्न नहीं होती। ये दोनों कण एक-दूसरे को तेज़ी से खत्म कर देते हैं, इसलिये इन्हें वर्चुअल पार्टिकल्स कहा जाता है। हॉकिंग का कहना था कि ब्लैक होल के पास बने ऐसे कण वास्तविक हो सकते हैं और इन दो कणों में से एक ब्लैक होल में चला जाएगा। अकेला रह गया कण अंतरिक्ष में बाहर निकल जाएगा। ब्लैक होल में यदि नकारात्मक ऊर्जा वाला कण गया तो कुल ऊर्जा कम हो जाएगी और दूसरा कण अंतरिक्ष में सकारात्मक ऊर्जा लेकर जाएगा। उनके इस प्रतिपादन के बाद ब्लैक होल से निकली ऊर्जा अब 'हॉकिंग रेडिएशन' कहलाती है।

हॉकिंग का नास्तिक दर्शन
विश्व प्रसिद्ध सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी हॉकिंग ने 2014 में स्पेनिश भाषा के समाचार पत्र 'एल मुंडो' को दिये साक्षात्कार में कहा था कि वैज्ञानिक दृष्टि से ब्रह्मांड को समझने की जरूरत है। गुरुत्वाकर्षण के नियम के मौजूद होने की वजह से ब्रह्मांड बिना किसी की मदद के खुद को तैयार कर सकता है। इसका भगवान से कोई लेना-देना नहीं है। विज्ञान 'The Theory of Everything' के करीब आ रहा है और जब ऐसा होता है तो हम ब्रह्मांड के भव्य डिज़ाइन को जान जाएंगे। 

स्टीफन हॉकिंग के अनुसार...

  • धर्म और विज्ञान के बीच एक बुनियादी अंतर है। धर्म जहाँ आस्था और विश्वास पर टिका है, वहीं विज्ञान अवलोकन (Observation) और कारण (Reason) पर चलता है। विज्ञान जीत जाएगा क्योंकि यह काम करता है।
  • हम सभी जो चाहें, उस पर विश्वास करने के लिये स्वतंत्र हैं। मेरा मानना है कि कोई भगवान नहीं है। किसी ने भी हमारा ब्रह्मांड नहीं बनाया है और कोई भी हमारे भाग्य को निर्देशित नहीं करता है।
  • हम एक बहुत ही औसत तारे के एक छोटे ग्रह पर बसे बंदरों की उन्नत नस्ल हैं। मगर, हम ब्रह्मांड को समझ सकते हैं और यह बात हमें बहुत खास बना देती है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

भारत भी आए थे हॉकिंग
वर्ष 2001 में हॉकिंग 16 दिन की भारत यात्रा पर आए थे और यह उनकी दूसरी भारत यात्रा थी। इसके पहले वे 1959 में भी यहाँ आ चुके थे, लेकिन उनकी दूसरी यात्रा ने भारत के आम लोगों को इस भौतिक विज्ञानी से परिचित करवाया, जब इस दौरान उन्होंने कई अकादमिक संस्थानों के आयोजनों में शिरकत की। उन्होंने भारतीयों के गणित और भौतिकी के ज्ञान की भी तारीफ की थी। इस यात्रा के दौरान मुंबई स्थित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में इंटरनेशनल फिज़िक्स सेमिनार के दौरान अपनी रिसर्च के लिये उन्हें पहले सरोजिनी दामोदरन फेलोशिप अवॉर्ड से नवाज़ा गया था।

बिग बैंग से पहले का ब्रह्मांड 
स्टीफन हॉकिंग का दावा था कि बिग बैंग से पहले केवल अनंत ऊर्जा और तापमान वाला एक बिंदु था। हम आज समय को जिस तरह महसूस करते हैं, ब्रह्मांड के जन्म से पहले का समय ऐसा नहीं था। इसमें चार आयाम थे। उन्होंने बताया था कि भूत, भविष्य और वर्तमान को तीन समानांतर रेखाएँ समझें तो उस वक्त एक और रेखा भी मौजूद थी जो वर्टीकल थी। उसे आप काल्पनिक समझ सकते हैं, लेकिन उनका कहना था कि काल्पनिक समय कोई कल्पना नहीं है, बल्कि यह हकीकत है। हां आप इसे देख नहीं सकते, लेकिन महसूस ज़रूर कर सकते हैं।

(टीम दृष्टि इनपुट)

निष्कर्ष: "मैं मौत से नहीं डरता, लेकिन मुझे मरने की कोई जल्दी नहीं है; मुझे अभी बहुत कुछ करना है।" यह कहना था ब्रह्मांड की रचना, ब्लैक होल और बिग बैंग सिद्धांत में अपना अहम योगदान देने वाले आम लोगों के वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग का। 

हॉकिंग का एक और प्रसिद्ध कथन है..."ईश्वर को पाँसों का खेल पसंद है, लेकिन वह अपने पाँसे उस समय फेंकता है, जब कोई देखने वाला नहीं होता।" वह जीने की इच्छा और चुनौतियों को स्वीकार करने के लिये एक मिसाल के अलावा अपने अनूठे हास्यबोध के लिये भी जाने जाएंगे और इसके लिये भी कि उन्होंने साहस के साथ यह साबित किया कि मृत्यु निश्चित है, लेकिन यह हम पर निर्भर करता है कि जीवन और मरण के बीच अपनी जिंदगी को क्या दिशा दें। हम खुद को मुश्किलों से घिरा पाकर निराशावादी नजरिये के साथ मौत का इंतजार करें या जीने की इच्छा और चुनौतियों को स्वीकार करते हुए अपने सपनों के प्रति समर्पण के साथ एक उद्देश्यपूर्ण जीवन जिएं? उन्होंने शारीरिक अक्षमता को दरकिनार करते हुए प्रमाणित किया कि अगर व्यक्ति में इच्छाशक्ति हो तो वह बहुत कुछ हासिल कर सकता है। अंधविश्वासों को तोड़ने वाले को खुद के जीवन में कट्टरता से किस तरह दूर रहना चाहिये, स्टीफन हॉकिंग इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं। उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि यही रही कि आज दुनिया हॉकिंग को उनके शुरुआती 21 वर्षों की वज़ह से नहीं, बल्कि बाद के 55 उपलब्धिपूर्ण वर्षों की वज़ह से जानती है।