विशेष/इन-डेप्थ: eProfiling: फेसबुक (सोशल मीडिया) प्रोफाइल से जुड़ी चिंताएँ | 23 Mar 2018

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि

सोशल मीडिया की अहमियत व दखल हमारे जीवन में दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। लेकिन सोशल मीडिया पर लोगों का प्रोफाइल सुरक्षित नहीं है, इसका पता अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव को लेकर हाल ही में हुए एक खुलासे से हुआ। अमेरिका में चुनावों के वक्त डोनाल्ड ट्रम्प की मदद करने वाली एक ब्रिटिश फर्म कैम्ब्रिज एनालिटिका पर फेसबुक के करीब पाँच करोड़ यूज़र्स की व्यक्तिगत जानकारी (Personal Information) चुराने के आरोप लगे हैं। आरोप है कि इन यूज़र्स की जानकारियों का इस्तेमाल अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों में स्विंग वोटर्स को प्रभावित करने के लिये किया गया था। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि इंटरनेट और सोशल मीडिया कैसे हमारी सोच पर हावी होकर हमारे राजनीतिक रुझान तक तैयार कर रहे हैं...और वह भी हमारी अनुमति लिये बिना।


मामला क्या है?

  • कैम्ब्रिज एनालिटिका पर आरोप है कि उसने एक क्विज एप (thisisyourdigitallife) की मदद से फेसबुक यूज़र्स का डाटा हासिल किया।
  • एप का इस्तेमाल करने वाले लोगों के फेसबुक मित्रों तक भी कैम्ब्रिज एनालिटिका पहुँच गई। 
  • फ्रेंड लिस्ट में शामिल इन यूज़र्स से पूछे बिना कैम्ब्रिज एनालिटिका ने उनका फेसबुक डाटा हासिल किया। 
  • कंपनी ने इसके लिये व्यक्तित्व संबंधी आकलन बताने वाले एक एप का इस्तेमाल किया जिसे 2.70 लाख लोगों ने डाउनलोड किया था। 
  • कंपनी ने एपडाउनलोड करने वाले लोगों तथा उनकी मित्र-सूची के लोगों की जानकारियों का इस्तेमाल किया था, जिसका उद्देश्य अमेरिकी मतदाताओं के व्यवहार का अनुमान लगाना था।
  • एप के यूज़र्स से कहा गया कि उन्हें एक सामान्य प्रश्नावली के उत्तर देने हैं, जिसका उपयोग शैक्षिक कार्यों के सर्वे के लिये किया जाना बताया गया। 

स्विंग वोटर्स: लोगों की पोस्ट और राजनीतिक पसंद के लिहाज़ से उनका वर्गीकरण किया गया और करोड़ों मतदाताओं को एक ख़ास दिशा में सोचने के लिये मजबूर किया गया। सोशल मीडिया के यूज़र्स से मिली इस जानकारी का उपयोग 'स्विंग वोटर्स' को प्रभावित करने के लिये किया गया। अनिश्चित मतदाताओं अर्थात् स्विंग वोटर्स ऐसे मतदाताओं को कहते हैं, जिनकी किसी भी राजनीतिक दल के प्रति कोई निष्ठा नहीं होती, लेकिन मतदान के दौरान इनके अप्रत्याशित रुझान के चलते चुनाव के नतीजे भी अप्रत्याशित हो सकते हैं।

(टीम दृष्टि इनपुट)

ब्रिटेन की कैंब्रिज एनालिटिका कंपनी को सूचनाओं के आधार पर आकलन करने के क्षेत्र में दुनिया की बेहतरीन कंपनियों में माना जाता है।

कैसे हासिल किया डेटा?

  • वोटर प्रोफाइलिंग कंपनी कैंब्रिज एनालिटिका 2013 में अस्तित्व में आई। 
  • यूनिवर्सिटी ऑफ कैंब्रिज में मनोविज्ञान के प्रोफेसर एलक्जेंडर कोगन की कंपनी ग्लोबल साइंस रिसर्च ने यूज़र्स डेटा को शेयर करने के लिये कैंब्रिज एनालिटिका से डील की। 
  • एलक्जेंडर कोगन की कंपनी के बनाए गए एप thisisyourdigitallife ने 2014 में फेसबुक यूज़र्स को एक साइकोलॉजिकल क्विज में हिस्सा लेने का झाँसा दिया। 
  • लगभग 2,70,000 यूज़र्स ने इस एप पर जाकर क्विज में हिस्सा लिया, जिनका फेसबुक पर्सनल डेटा कोगन की कंपनी ने एक्सेस कर लिया। साथ ही साथ यूज़र्स के फ्रेंड्स के डेटा में भी सेंध लगाई।
  • 2016 में अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप के समर्थन में  अभियान चलाने के लिये इसकी सेवाएँ ली गई। 
  • इसके लिये रॉबर्ट मर्सर नाम के निवेशक ने कंपनी को 15 मिलियन डॉलर दिये, जो रिपब्लिकन पार्टी के प्रचारकों के पैनल में शामिल थे। 

जाँच शुरू हुई 

  • अमेरिकी अखबार 'संडे गार्जियन' ने कैंब्रिज एनालिटिका के पूर्व कर्मी और व्हिसल ब्लोअर के हवाले से मामले का खुलासा किया। इसमें कई देशों के यूज़र्स का डेटा चोरी किया गया। 
  • जिन यूज़र्स की प्राइवेसी सेटिंग्स मजबूत नहीं थी, उनका ही डेटा एक्सेस किया गया।
  • अमेरिका में ग्राहकों के हितों की रक्षा से जुड़ी एजेंसी फेडरल ट्रेड कमीशन (एफटीसी) ने फेसबुक के खिलाफ जाँच शुरू की है कि क्या उसने प्रयोगकर्ताओं के लाखों आंकड़े एक राजनीतिक परामर्श एजेंसी को दिये थे। 
  • अब तक की जाँच में कंपनी द्वारा हनीट्रैप, फेक न्यूज कैंपेन और पूर्व जासूसों की मदद से चुनावों को प्रभावित करने की बात सामने आई है। 
  • इसी तरह से ब्रिटेन और यूरोपीय कमीशन में भी फेसबुक के खिलाफ जाँच शुरू हो गई है। यूरोपीय संघ और ब्रिटेन की संसद ने इसे लेकर फेसुबक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क ज़ुकरबर्ग को पेश होकर स्पष्टीकरण देने के लिये कहा है।
  • यह जाँच मीडिया में आई उन रिपोर्ट्स के आधार पर शुरू की गई है जिसमें यह दावा किया गया है कि फेसबुक के पाँच करोड़ ग्राहकों के डेटा से ली गई जानकारी का इस्तेमाल अमेरिकी चुनाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को जिताने के लिये किया गया है। यह पहला मामला है जिसमें सोशल साइट्स के ग्राहकों की जानकारी के आकलन के आधार पर राजनीतिक फायदा उठाने की बात सामने आई है।

भारत में फेसबुक को चेतावनी 

ब्रिटिश कंपनी कैम्ब्रिज एनालिटिका द्वारा डाटा के दुरुपयोग को लेकर उठा विवाद भारत पहुँच गया है। इसी तरह के एक अन्य मामले में भारत के विधि मंत्री रविशंकर प्रसाद ने हाल ही में सोशल मीडिया के अग्रणी फेसबुक और उसके CEO मार्क जुकरबर्ग को भारत में कथित तौर पर चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिये डेटा का दुरुपयोग करने को लेकर सख्त कार्रवाई करने की चेतावनी दी।

मांगे 6 सवालों के जवाब 

एक अन्य हालिया घटनाक्रम में भारत सरकार ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म फेसबुक के माध्यम से कई देशों में चुनावों को प्रभावित करने वाली कैम्ब्रिज एनालिटिका को कारण बताओ नोटिस जारी कर 31 मार्च तक निम्नलिखित 6 सवालों के जवाब देने को  कहा है-

  1.  क्या कंपनी ने किसी काम के दौरान भारतीयों के डेटा का प्रयोग सेंधमारी कर किया?
  2.  कौन-सी इकाइयाँ हैं जिन्होंने उससे काम लिया?
  3.  कंपनी के पास डाटा कहाँ और किस तरह से आया? 
  4. क्या कंपनी ने लोगों से इस मामले में संज्ञान लिया? 
  5. एकत्र किये गए डाटा को किस तरह से प्रयोग में लाया गया?
  6. क्या डाटा के आधार पर किसी तरह की प्रोफाइल तैयार की गई?

भारत में भी ऐसी मीडिया रिपोर्ट्स आई हैं जिनमें कहा गया है कि कैम्ब्रिज एनालिटिका ने अपनी गतिविधियों के जरिये लोगों से संज्ञान लिये बिना फेसबुक डाटा का दुरुपयोग किया है। यह आरोप भी सामने आया है कि लोगों के व्यवहार को प्रभावित करने कि लिये भी इस डेटा का उपयोग किया गया।

(टीम दृष्टि इनपुट)

जुकरबर्ग ने मांगी माफी

एक नवीनतम घटनाक्रम में फेसबुक डेटा लीक मामले में उसके मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क जुकरबर्ग ने दो अरब फेसबुक उपयोगकर्ताओं से उनका विश्वास तोड़ने के लिए माफी मांगी और डेटा को सुरक्षित रखने के लिए कई कदम उठाने का बात कही। वह अमेरिकी कांग्रेस के सामने मामले से जुड़े सवालों का जवाब देने के लिए भी तैयार हैं। मार्क जुकरबर्ग ने कहा कि मैंने फेसबुक शुरू किया था और अंतत: यहां जो कुछ भी हुआ उसके लिए मैं ही जिम्मेदार हूं। दोबारा इस तरह की गलती न हो इसके लिए फेसबुक ने कई कदम उठाए हैं। इस प्रक्रिया में फेसबुक हजारों एप की गहन समीक्षा करेगी।

क्या है सोशल मीडिया प्रोफाइलिंग?

  • जब भी आप किसी भी सोशल नेटवर्किंग साइट पर जाते हैं तो दुनियाभर की कंपनियों, ग्रुप्स, राजनीतिक दलों के लिये एक संभावित उपभोक्ता बन जाते हैं। 
  • लोगों के मूड और रुझान को जानने-समझने के लिये उनकी सोशल मीडिया प्रोफाइलिंग की जाती है। 
  • लोगों के सोशल मीडिया प्रोफाइल पर नज़र रखकर उनके बारे में राय बनाई जाती है और उसी के हिसाब से उनसे बात की जाती है। 
  • ये सभी सोशल मीडिया प्रोफाइलिंग के ज़रिये आपकी रुचि और पसंद के अनुसार आपको टारगेट करते हैं। 

कैसे होती  है सोशल मीडिया प्रोफाइलिंग?

अगर आप एंड्राइड स्मार्टफोन इस्तेमाल करते हैं तो आपने महसूस किया होगा कि गूगल आपकी रुचि के मुताबिक़ विज्ञापन दिखाने की कोशिश करता है। आप जब भी अमेज़न, माइक्रोसॉफ्ट, ट्विटर या फेसबुक जैसी वेबसाइट पर जाते हैं तो वहाँ पर भी कोशिश यही होती है कि आप जो तलाश रहे हैं, उसी के  अनुसार विज्ञापन आपको दिखाए जाएँ। जब आप किसी दूसरी वेबसाइट पर चले जाते हैं, तो भी इंटरनेट के ये विज्ञापन आपका पीछा करते रहते हैं। इसे एक उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं...मान लीजिये, आपने अपनी कार के लिये टायरों की तलाश किसी वेबसाइट पर की तो कई दिन तक आपको उससे मिलते-जुलते विज्ञापन दिखेंगे, जबकि इस बीच आपने अपनी गाड़ी के टायर बदलवा भी दिये हो सकते हैं।

 (टीम दृष्टि इनपुट)

  • दरअसल कंपनियाँ अपने कस्टमर्स की सोशल मीडिया पोस्ट पर नज़र रखकर उनके बारे में राय बनाती हैं और उसी के हिसाब से उनसे बात करती हैं। 
  • ई-कॉमर्स कंपनियाँ सोशल मीडिया प्रोफाइलिंग के जरिए कस्टमर्स की रुचि का पता लगाती हैं और उसी के हिसाब से विज्ञापनों का चयन करके उन्हें लक्ष्य बनाती हैं। 

इसका इस्तेमाल कस्टमाइज्ड मार्केटिंग के लिये भी किया जाता है। जैसे-कोई क्रेडिट कार्ड कंपनी अपने बड़े कस्टमर्स की फेसबुक, इंस्टाग्राम, ट्विटर और स्नैपचैट प्रोफाइल का विश्लेषण करती है। इसके हिसाब से फ्लाइट टिकट के बारे में प्लान कर रहे कस्टमर्स को वह टिकट पर डिस्काउंट भी दे देती है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

  • सोशल मीडिया प्रोफाइलिंग के लिये कंपनियाँ अपने पोर्टल को बेहद आकर्षक और उपयोगी बनाती हैं। 
  • ई-कॉमर्स कंपनियाँ आपकी ऑनसाइट गतिविधियों को ट्रैक करती हैं, जैसे-आपने किस पेज को लाइक किया और किस विज्ञापन को क्लिक किया।
  • ई-कॉमर्स कंपनियों को यह भी पता चल जाता है कि आप कौन से ब्रांड का मोबाइल फोन या कौन-सी कंपनी का इंटरनेट कनेक्शन इस्तेमाल करते हैं।

फेसबुक प्रोफाइलिंग

जब भी आप फेसबुक (या कोई अन्य सोशल मीडिया साइट) पर लॉग-ऑन करते हैं तो उस वेबसाइट को पता चल जाता है कि आपने कौन-कौन सी साइटें देखी हैं। इसी के आधार पर सोशल मीडिया वेबसाइट विज्ञापन तथा अन्य चीज़ें तैयार करती है। इससे विज्ञापनदाताओं को भी आपके प्रोफाइल से जुड़ी जानकारियाँ मिल जाती हैं। 2016 की दूसरी तिमाही में केवल विज्ञापनों के ज़रिये फेसबुक को 640 करोड़ रुपए की आय  हुई थी, जो 2015 की इसी अवधि में होने वाली आय से 63% अधिक थी।

यह कैसे होता है?: इसमें कोई भी विश्लेषक आपका प्रोफाइल और टाइमलाइन देखकर पसंद-नापसंद और किसी मुद्दे पर प्रतिक्रिया के आधार पर आपकी फेसबुक प्रोफाइलिंग कर सकता है। आपकी जाति, नस्ल, लैंगिक वरीयता, विवाहित हैं या नहीं, कहाँ रहते हैं, क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं, कहाँ जाते हैं, किनके साथ घूमते हैं, कहाँ पढ़े हैं, आपके धार्मिक और राजनीतिक रुझान क्या हैं...इनके आधार पर लोगों का वर्गीकरण किया जाता है। इसके बाद तय किया जाता है कि किन अलग-अलग मार्केटिंग टूल्स की सहायता से इन तक पहुँचा जा सकता है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

  • सोशल मीडिया प्रोफाइलिंग की वज़ह से कौन, कहाँ, कब और कैसे जैसे सवालों के जवाब आपकी जेब में हैं और 3-4 क्लिक के माध्यम से किसी के बारे में भी जानकारी प्राप्त की जा सकती है। 
  • आज सोशल मीडिया प्रोफाइलिंग मार्केटिंग कंपनियों का एक बड़ा हथियार बन चुका है और राजनीतिक दल भी समर्थक बढ़ाने के लिये इसका इस्तेमाल करने लगे हैं। 
  • निजी और सरकारी सुरक्षा एजेंसियां भी सोशल मीडिया प्रोफाइलिंग से मिली जानकारी का इस्तेमाल निगरानी, जासूसी से लेकर कॉरपोरेट सुरक्षा के लिये करती हैं। इसमें खोज, विश्लेषण, जाँच और तेज़ी से मामले सुलझाने की सुविधा देने की बात कही जाती है। 
  • ये सभी पोस्ट के कंटेंट पर फोकस कर इसके पीछे छिपी मंशा भांपने का प्रयास करते हैं। ऐसा करने के पीछे पोस्ट करने वाले के मनोविज्ञान को पढ़ना भी एक बड़ा कारण होता है और यह भी ध्यान रखा जाता है कि कोई व्यक्ति अन्य लोगों के साथ किस प्रकार संवाद कर रहा है; और इसके बाद शुरू होता है उसके पास पहुँचने का उपक्रम।

बचाव का तरीका 

सोशल मीडिया व तकनीकी सलाह देने वाली प्रमुख साइट लाइफ हैकर के अनुसार प्रतिवर्ष 100 डॉलर चुकाकर सोशल मीडिया एकाउंट्स को सुरक्षित रखा जा सकता है। इसके लिये ऑनलाइन रेप्यूटेशन मैनेजमेंट सॉफ्टवेयर दिया जाता है, जिसके माध्यम से सोशल मीडिया एकाउंट को नकारात्मकता से दूर रखकर  सकारात्मक वेब उपस्थिति दर्शाई जा सकती है। उदाहरण के तौर पर इस सॉफ्टवेयर का एक फीचर आपके सोशल मीडिया एकाउंट पर ऐसी पोस्ट आने से रोकता है जिनमें एल्कोहल, ड्रग्स यूज, सेक्स जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया गया हो। नकारात्मकता से बचने के लिये सभी सोशल मीडिया एकाउंट्स की प्राइवेसी सेटिंग्स जाँच करने के बाद उन्हें 'प्राइवेट' पर सेट करके कस्टमाइज़ भी किया जा सकता है।

आज आम आदमी को हैंकिंग, स्‍पैमिंग, मालवेयर और डेटा चोरी होने की समस्‍याओं का सामना करना पड़ रहा है। इसके बावजूद देश में साइबर सुरक्षा के बारे में जागरूकता काफी कम है। इस दिशा में प्रभावशाली साइबर सुरक्षा ढाँचे के निर्माण की आवश्यकता है ताकि भारत के नागरिकों को एक सुदृढ़ एवं सुरक्षित डिजिटल संसार का हिस्सा बनाया जा सके।

(टीम दृष्टि इनपुट)

निष्कर्ष:  सोशल मीडिया आज अधिकांश लोगों के लिये सूचना का पहला स्रोत बन चुका है। ऐसे में जनता से सीधे जुड़ने के बजाय सोशल मीडिया के माध्यम से संवाद की प्रवृत्ति को बल मिल रहा है, जिसके फायदे तो हैं ही लेकिन हानियाँ भी कम नहीं हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव में कैम्ब्रिज एनालिटिका कंपनी ने फेसबुक यूज़र्स के साइकोलॉजिकल प्रोफाइलिंग के साथ अपने क्लाइंट के समर्थन में और विरोधी के खिलाफ सूचनाएँ प्लांट की, ऐसी आशंका जताई गई कि इससे जनमत प्रभावित हुआ। आरोप लगाया गया है कि कैंब्रिज एनालिटिका ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के 2016 के चुनाव अभियान में इन आँकड़ों का इस्तेमाल किया था।

आप क्या पसंद करते हैं, क्या नापसंद, आप क्या चाहते हैं, इच्छाएँ क्या हैं, इंटरनेट पर सबकुछ 'सेव' हो रहा है और इसकी बोली लग सकती है। किसी एप को डाउनलोड करते समय हम बिना देखे उसके टर्म और कंडीशन को 'ओके' कर अकाउंट बना लेते हैं। हम ऐसी डिजिटल दुनिया में रह रहे हैं जहाँ कुछ भी निजी नहीं है।

हाल ही में जब इसी प्रकार का मुद्दा भारत में उठा तो केंद्र सरकार ने स्पष्ट किया कि किसी भी भारतीय का डेटा फेसबुक की मिलीभगत से लीक हुआ तो कानूनी कार्यवाही की जाएगी। 20 करोड़ भारतीय फेसबुक का इस्तेमाल करते हैं और यह अमेरिका से बाहर कंपनी के लिये दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। ऐसे में सोशल साइट्स यूज़र्स के हितों की रक्षा को लेकर जो नियम-कानून अभी हैं, सरकार उनकी नए सिरे से समीक्षा कर सकती है।