संसद टीवी संवाद

एक देश-एक चुनाव की अवधारणा | 24 Jun 2019 | भारतीय राजनीति

संदर्भ

19 जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक देश-एक चुनाव के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाई। इसके बाद एक बार फिर यह मुद्दा सतह पर आ गया, जो प्रधानमंत्री के एजेंडे में अहम माना जाता है। यह पहला अवसर नहीं है जब ‘एक देश-एक चुनाव’ के मुद्दे पर चर्चा हुई। विगत में विभिन्न अवसरों पर विभिन्न मंचों में यह मुद्दा चर्चा का विषय बनता रहा है। एक देश एक चुनाव के विचार के तहत देश में चुनाव चक्र को इस तरह से संरचित करने का प्रस्ताव है, जिसमें लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएंगे।

नया नहीं है ‘एक देश-एक चुनाव’ का विचार

लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाने के मुद्दे पर लंबे समय से बहस चल रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विचार का समर्थन कर इसे आगे बढ़ाया है। वैसे इस मुद्दे पर चुनाव आयोग, नीति आयोग, विधि आयोग और संविधान समीक्षा आयोग विचार कर चुके हैं। ‘एक देश-एक चुनाव’ लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं का चुनाव एक साथ करवाने का एक वैचारिक उपक्रम है। देश में इनके अलावा पंचायत और नगरपालिकाओं के चुनाव भी होते हैं, लेकिन ‘एक देश-एक चुनाव’ की प्रक्रिया में इन्हें शामिल नहीं किया जाता।

‘एक देश-एक चुनाव’ की ज़रूरत क्यों?

बेशक यह मुद्दा आज बहस के केंद्र में है, लेकिन विगत में 1952, 1957, 1962, 1967 में ऐसा हो चुका है, जब लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ करवाए गए थे। यह क्रम तब टूटा जब वर्ष 1968-69 में कुछ राज्यों की विधानसभाएँ विभिन्न कारणों से समय से पहले भंग कर दी गईं। वर्ष 1971 में पहली बार लोकसभा चुनाव भी समय से पहले हो गए थे। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब इस प्रकार चुनाव पहले भी करवाए जा चुके हैं तो अब क्या समस्या है?

चुनावों को लोकतंत्र का सबसे बड़ा उत्सव माना जाता है। अगर हम देश में होने वाले चुनावों पर नज़र डालें तो पाते हैं कि हर वर्ष किसी-न-किसी राज्य में चुनाव होते रहते हैं। चुनावों की इस निरंतरता के कारण देश लगातार चुनावी मोड में बना रहता है। इससे न केवल प्रशासनिक और नीतिगत निर्णय प्रभावित होते हैं बल्कि देश के खजाने पर भी भारी बोझ भी पड़ता है। हाल ही में हुए 17वीं लोकसभा के चुनाव में एक अनुमान के अनुसार, 60 हज़ार करोड़ रुपए से अधिक का खर्च आया और लगभग तीन महीने तक देश चुनावी मोड में रहा।

निश्चित ही ऐसी परिस्थतियों में ‘एक देश-एक चुनाव’ विचार पहली नज़र में अच्छा प्रतीत होता है, पर यह व्यावहारिक है या नहीं, इस पर विशेषज्ञों की अलग-अलग राय है। बेशक बार-बार होने वाले चुनावों के बजाय एक स्थायित्व वाली सरकार बेहतर होती है, लेकिन इसके लिये सबसे ज़रूरी है आम सहमति का होना और यह कार्य बेहद मुश्किल है। राजनीतिक सर्वसम्मति के अभाव में संविधान में आवश्यक संशोधन करना संभव नहीं होगा, क्योंकि इसके लिये दो-तिहाई बहुमत की ज़रूरत पड़ेगी, जो कि बिना आम सहमति के नहीं किया जा सकता।

(टीम दृष्टि इनपुट)

‘एक देश एक चुनाव’ कितना फायदेमंद?

‘एक देश-एक चुनाव’ के सिद्धांत को अमल में लाकर चुनाव के खर्च, पार्टी के खर्च आदि पर नज़र तथा नियंत्रण रखने में सहूलियत होगी। जब वर्ष 1951-52 में लोकसभा का पहला चुनाव हुआ था तो 53 दलों ने चुनाव में भागीदारी की थी, 1874 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था और चुनाव खर्च लगभग 11 करोड़ रुपए आया था। अब इसकी तुलना हाल ही में संपन्न 17वीं लोकसभा के चुनाव से करते हैं...610 राजनीतिक दल थे और लगभग 9000 उम्मीदवार। लेकिन इन पर लगभग 60 हज़ार करोड़ रुपए (सेंटर फॉर मीडिया स्टडीज़ का अनुमान) खर्च हुए, जबकि राजनीतिक दलों ने अपने चुनावी खर्चों की जानकारी अभी नहीं दी है। 7 चरणों में 75 दिनों में संपन्न हुए इस आम चुनाव को अब तक का सबसे खर्चीला चुनाव बताया जा रहा है। इस लिहाज़ से एक वोट पर औसतन 700 रुपए खर्च किये गए और हर लोकसभा क्षेत्र में 100 करोड़ रुपयए खर्च हुए। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में लगभग 30 हज़ार करोड़ रुपए का खर्च आया था, जो मात्र पाँच वर्षों में बढ़कर दोगुना हो गया।

विधि आयोग की 170वीं रिपोर्ट

  • वर्ष 1999 में विधि आयोग ने अपनी 170वीं रिपोर्ट में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को एक साथ कराने का समर्थन किया था।
  • चुनाव सुधारों पर विधि आयोग की इस रिपोर्ट को देश में राजनीतिक प्रणाली के कामकाज पर अब तक के सबसे व्यापक दस्तावेज़ों में से एक माना जाता है। इस रिपोर्ट का एक पूरा अध्याय इसी मुद्दे पर केंद्रित है।
  • राजनीतिक व चुनावी सुधारों से संबंधित इस रिपोर्ट में दलीय सुधारों की बात भी कही गई है। राजनीतिक दलों के कोष, चंदा एकत्रित करने के तरीके और उसमें अनियमितताएँ तथा इन सबका राजनीतिक प्रक्रियाओं पर प्रभाव आदि का भी इस रिपोर्ट में विश्लेषण किया गया है।
  • आज EVM में नोटा (NOTA) का जो विकल्प है, उसकी सिफारिश भी विधि आयोग ने अपनी इस रिपोर्ट में नकारात्मक मतदान की व्यवस्था लागू करने की बात कहकर की थी। इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश पर यह विकल्प मतदाताओं को दिया गया।

(टीम दृष्टि इनपुट)

‘एक देश-एक चुनाव’ के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ

लॉजिस्टिक संबंधी चुनौतियाँ

फिलहाल लागू कर पाना संभव नहीं

यह सही है कि एक साथ चुनाव कराने से सरकारी राजस्व और समय की बचत होगी तथा नीति निर्णयन प्रक्रिया प्रभावित नहीं होगी। प्रायः देखा जाता है कि जब चुनाव का समय नज़दीक आता है तो मंत्रियों सहित पूरा सरकारी अमला बेहद व्यस्त हो जाता है, इसके साथ ही चुनाव आचार संहिता लागू होने से विकास कार्य भी ठप पड़ जाते हैं। लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र भारत हर समय चुनावी चक्रव्यूह में घिरा हुआ नजर आता है। देश को चुनावों के इस चक्रव्यूह से देश को निकालने के लिये एक व्यापक चुनाव सुधार अभियान चलाने की आवश्यकता है। इसके तहत जनप्रतिनिधित्व कानून में सुधार, कालेधन पर रोक, राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण पर रोक, लोगों में राजनीतिक जागरूकता पैदा करना शामिल है। ‘एक देश-एक चुनाव’ की अवधारणा में कोई बड़ी खामी नहीं है, किंतु राजनीतिक दलों द्वारा जिस तरह से इसका विरोध किया जा रहा है उससे लगता है कि इसे निकट भविष्य में लागू कर पाना संभव नहीं है।

लंबी कवायद के बाद दो वर्ष पहले देश में GST लागू हुआ था और कमोबेश ठीक-ठाक काम भी कर रहा है। ‘एक देश-एक चुनाव’ के समर्थक तर्क देते हैं कि जब एक देश-एक टैक्स लागू किया जा सकता है तो ‘एक देश-एक चुनाव’ के विचार को भी आगे बढ़ाया जा सकता है। लेकिन इसके लिये यह आम सहमति बनाने की ज़रूरत है कि क्या राष्ट्र को ‘एक देश-एक चुनाव’ की जरूरत है या नहीं। सभी राजनीतिक दलों को इस मुद्दे पर होने वाली बहसों में सहयोग करना चाहिये, इसके बाद ही जनता की राय को ध्यान में रखा जा सकता है। एक परिपक्व लोकतंत्र होने के नाते भारत इसके बाद लिये गए किसी भी फैसले पर अमल कर सकता है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

अभ्यास प्रश्न: भारत के संदर्भ में ‘एक-देश एक चुनाव’ की व्यवहार्यता पर प्रकाश डालिये? ‘एक देश-एक कर’ की तरह इसे लागू करने की राह में आने वाली चुनौतियों की चर्चा कीजिये।