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अस्तित्व: एनजीटी की हालत और पर्यावरण का भविष्य | 31 May 2018 | जैव विविधता और पर्यावरण

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (National Green Tribunal-NGT) की स्थापना 18 अक्तूबर 2010 को एनजीटी अधिनियम, 2010 के तहत पर्यावरण संरक्षण, वन संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों सहित पर्यावरण से संबंधित किसी भी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन, दुष्प्रभावित व्यक्ति अथवा संपत्ति के लिये अनुतोष और क्षतिपूर्ति प्रदान करने एवं इससे जुडे़ हुए मामलों के प्रभावशाली और त्वरित निपटारे के लिये की गई थी।

एनजीटी की संरचना

एनजीटी के प्रमुख उद्देश्य 

क्यों ज़रूरत पड़ी एनजीटी की?

कौन जा सकता है एनजीटी में?

यदि इन सवालों का या ऐसे ही किन्हीं अन्य सवालों का जवाब 'हाँ' में है तो आपके लिये एनजीटी में जाने के रास्ते खुले हैं, जहाँ आपकी समस्या का समाधान हो सकता है।

यहाँ यह स्पष्ट कर देना भी आवश्यक है कि एनजीटी के फैसले से असंतुष्ट होने की स्थिति में 90 दिनों के भीतर इसके फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

अधिकांश पद खाली पड़े हैं एनजीटी में

संविधान में है 'पर्यावरण संरक्षण' का उल्लेख

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 323-B संसद को श्रम विवाद, पर्यावरण इत्यादि के संबंध में अधिकरण (Tribunal) बनाने के लिये विधि निर्माण की शक्ति प्रदान करता है। इसी के तहत  पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण कानून, 2010 के माध्यम से एनजीटी की स्थापना की गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने दिया था पर्यावरण को जीने के मौलिक अधिकार के समान दर्जा

1974 में संसद ने जल प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम पारित किया था। इस अधिनियम के तहत जनसरोकार के पहले मामले पर सुप्रीम कोर्ट ने 1991 में फैसला सुनाया था। यह मामला सुभाष कुमार बनाम बिहार सरकार का था, जिसमें शिकायतकर्त्ता ने बोकारो नदी में कोयले की राख फेंके जाने पर चिंता जताई थी।

इसके साथ ही पर्यावरणीय मामलों पर जन सरोकार के कानूनों के दुरुपयोग की संभावनाओं को देखते हुए अदालत ने व्यवस्था दी कि ‘‘संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत ‘जीने का अधिकार मौलिक अधिकार’ है तथा इसमें जीवन का आनंद उठाने के लिये प्रदूषण रहित पानी तथा हवा का लाभ शामिल है। यदि कानून का उल्लंघन कर जीवन की इस गुणवत्ता को नुकसान पहुँचाने का प्रयास किया जाता है तो नागरिकों को अनुच्छेद 32 के तहत यह अधिकार है कि वे पानी अथवा हवा को प्रदूषण मुक्त करने की मांग करें जो उनके जीवन की गुणवत्ता के मार्ग में बाधक हैं।’’ 

अनुच्छेद 32 के तहत प्रभावित व्यक्तियों या सामाजिक कार्यकर्त्ताओं अथवा पत्रकारों द्वारा सामूहिक रूप से याचिका दायर की जा सकती है। इस अनुच्छेद के तहत मामला तभी दायर किया जाना चाहिये जब ‘‘समाज के संरक्षण की दृष्टि से ऐसा किया जाना ज़रूरी हो।’’

(टीम दृष्टि इनपुट)

पर्यावरणीय मामलों में एनजीटी की बढ़ती सक्रियता इस बात का संकेत है कि पर्यावरण संरक्षण के मुद्दों को अब हल्के में नहीं लिया जा सकता। एनजीटी लगातार सार्वजनिक संस्थाओं और निजी क्षेत्र के साथ-साथ आम नागरिकों को पर्यावरणीय संरक्षण के लिये संवेदनशील बनाने की दिशा में प्रयास करता रहा है। एनजीटी द्वारा बार-बार इस बात पर बल दिया जाता है कि शासन-प्रशासन के विभिन्न अंगों द्वारा देश के विकास के लिये योजनाएँ एवं नीतियाँ बनाने और उन्हें लागू करने के समय इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि पर्यावरण की कीमत पर अंधाधुंध तरीके से आर्थिक संवृद्धि की राह पर चलना पर्यावरण व मानव समाज दोनों के लिये समान रूप से घातक हो सकता है।

निष्कर्ष: पर्यावरण संरक्षण का काम अकेले किसी सरकार, किसी न्यायालय, किसी अधिकरण या कुछ एनजीओ के बस का नहीं है, इसके लिये सक्रिय जनसहयोग बेहद आवश्यक है, जिसके बिना यह कार्य पूरा हो ही नहीं सकता। प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते जनसंख्या दबाव और ग्लोबल वार्मिंग के इस दौर में संपोषणीय रहन-सहन की चिंता करना समय की मांग है; और इसका इसका एकमात्र विकल्प है पर्यावरण अनुकूल प्रौद्योगिकियों, उत्पादों और स्वच्छ पर्यावरणीय ऊर्जा को अपनाना।

पर्यावरण से जुड़े मुद्दों के समाधान के लिये इस न्यायाधिकरण की स्थापना पर्यावरण सुरक्षा एवं वनों व अन्य प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण तथा पर्यावरण से संबंधित किसी कानूनी अधिकार के प्रवर्तन और व्यक्तियों व परिसंपत्तियों को क्षति पहुँचाने के लिये सहायता प्रदान करने एवं क्षतिपूर्ति देने के मामलों को प्रभावी रूप से तथा तेज़ी से निपटाने के लिये की गई थी, जिसमें यह काफी हद तक सफल भी रहा है।

1992 में रियो डि जेनेरियो में हुए पर्यावरण और विकास से संबंधित संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन में विभिन्न राष्ट्रों ने, जिनमें भारत भी शामिल था, यह निर्णय लिया था कि न्यायिक और प्रशासनिक कार्यवाहियों से यदि पर्यावरण को क्षति पहुँच रही है, तो उसका निराकरण कर पीड़ित पक्षों को समुचित राहत और मुआवज़ा प्रदान किया जाए। एनजीटी न केवल पर्यावरण लोकतंत्र को लागू करने की दिशा में कदम है, बल्कि रियो में लिये गए निर्णय को भी पूरा करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन कर रहा है।