संसद टीवी संवाद

विशेष: मानव-वन्यजीव संघर्ष (Man-Animal Conflict) | 02 May 2018 | राज्यसभा

संदर्भ एवं पृष्ठभूमि
विकास की भूख बहुमूल्य वन्यजीवों को नष्ट कर रही है। जानवरों के लगातार हो रहे शिकार और मानव एवं  वन्यजीवों के बीच चल रहे संघर्ष ने कई अहम प्रजातियों के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। वाइल्ड लाइफ ट्रस्ट ऑफ इंडिया औऱ उत्तर प्रदेश सरकार की एक नवीनतम रिपोर्ट (LIVING WITH THE WILD: Mitigating Conflict between Humans and Big Cat Species in Uttar Pradesh) के अनुसार मनुष्यों और वन्यजीवों के बीच टकराव तथा संघर्ष लगातार बढ़ रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है इंसानी आबादी का बढ़ता दबाव जो वन्यजीवों के लिये मुसीबत बनता जा रहा है, क्योंकि जंगल कम हो रहे हैं और वन्यजीवों के रहने के प्राकृतिक अधिवास लगातार कम होते जा रहे हैं। ऐसे में मानव-वन्यजीव संघर्ष में कमी लाने के लिये उन कारणों की पड़ताल कर निदान करना ज़रूरी है, जिनकी वज़ह से यह चिंताजनक स्तर पर पहुँच गया है। 

क्या है मानव-वन्यजीव संघर्ष की परिभाषा?

मानव-वन्यजीव संघर्ष के प्रमुख कारण

पृथ्वी पर आ रहा है नया युग...एंथ्रोपोसीन (Anthropocene) 

  • 2012 में जारी WWF की एक रिपोर्ट के अनुसार मानवीय गतिविधियों के कारण ही वन्यजीवों  की आबादी घटी है। 
  • जूलॉजिकल सोसायटी ऑफ लंदन के साथ मिलकर किये गए इस  व्यापक अध्ययन के बाद पता चला कि 1970 से 2012 के बीच वन्य जीवों की आबादी में 58% की कमी आई। 2020 तक इसके 67% हो जाने का अनुमान लगाया गया है। 
  • इस रिपोर्ट से यह भी पता चला  कि वन्य जीवों के संरक्षण के लिये किये जा रहे प्रयास कोई विशेष सफल नहीं हो रहे। तब डब्ल्यूडब्ल्यूएफ इंटरनेशनल के महानिदेशक मार्को लांबर्टीनी ने कहा था कि हमारे देखते-देखते वन्यजीवन अप्रत्याशित तेज़ी से खत्म हो रहा है। 

जंगलों, नदियों और सागरों की सेहत का आधार जैव विविधता ही है।

  • हम पृथ्वी पर एक नए युग में प्रवेश करने जा  रहे हैं जिसे एंथ्रोपोसीन कहा जाएगा। एंथ्रोपोसीन हमारा वह समय है जबकि मनुष्यों की गतिविधियों का असर पर्यावरण और वन्यजीवन सहित प्रत्येक प्राकृतिक गतिविधि पर पड़ रहा है।
  • इससे पता चला कि इंसान की बढ़ती आबादी वन्यजीवन के लिये सबसे बड़ा खतरा है। शहर बनाने और खेती करने के लिये तेज रफ्तार से जंगल साफ हो रहे हैं। इसके अलावा प्रदूषण, शिकार और जलवायु परिवर्तन भी खतरनाक कारक हैं।
  • रिपोर्ट में बताया गया था कि अभी मनुष्य के पास इस चलन को पलटने का अवसर है। सकारात्मक बात यह है कि अभी आबादी घट रही है, खत्म नहीं हुई है।  
  • यह इस बात का स्पष्ट संकेत है कि पृथ्वी पर मनुष्य सबसे ताकतवर हो चुका है और वही सबके लिये फैसले ले रहा है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

वन्यजीव पर्यावासों के एकीकृत विकास की योजना

कैसे होगा बचाव?...क्या किया जा रहा है?

  • औद्योगीकरण और आधुनिकीकरण ने वनों को नष्ट कर दिया  है। वन विभिन्न प्रकार के पक्षियों और जीवों की आश्रय स्थली हैं और जब इनके घरों पर मनुष्यों ने कब्ज़ा करके अपना घर बना लिया है तो वे अपना हिस्सा मांगने हमारे घरों में ही आएंगे।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष भारत में वन्यजीवों के संरक्षण के लिये एक बड़ा खतरा है। वन कटान, पर्यावास की क्षति, शिकार (भोजन) की कमी और जंगल के बीचो-बीच से गुज़रने वाली अवैध सड़कें मानव-वन्यजीव संघर्ष के कुछ अहम कारण हैं।
  • संरक्षित क्षेत्रों से होकर गुज़रने वाली सड़कों के कारण दुर्गम जंगलों तक भी पहुँचना मनुष्य के लिये आसान हो गया है। इससे शिकारी दल आसानी से वन्यजीवों को अपना शिकार बना लेते हैं।
  • आजकल शायद ही कोई दिन ऐसा जाता है, जब मानव तथा वन्यजीवों के बीच संघर्ष की खबर सुनने को नहीं मिलती। किसी स्थान पर किसी हिंसक जानवर ने बस्ती में आकर लोगों पर आक्रमण कर दिया होता है, तो कहीं लोग ऐसे जानवर को घेरकर मार देते हैं।
  • मानव और वन्यजीवों के बीच होने वाला संघर्ष इधर कुछ वर्षों से बहुत अधिक बढ़ गया है। ऐसे में इनकी रोकथाम के साथ वन्य जीवों के हमलों की वज़ह और इन पर प्रभावी रोक के उपायों पर गौर करने की आवश्यकता बहुत अधिक है। 
  • वन्य जीवों के प्रति लोगों को जागरूक कर और वन विभाग के साथ लोगों को मॉक ड्रिल के ज़रिये तकनीकी जानकारियाँ उपलब्ध कराकर इस समस्या पर कुछ अंकुश लगाया जा सकता है।
  • पर्वतीय क्षेत्रों में दावानल (Forest Fire)  की घटनाओं की वज़ह से भी वन्यजीव मानव बस्तियों का रुख करते हैं और मारे जाते हैं। वन्यजीवों के हमले और फॉरेस्ट फायर को विशेष रणनीति के तहत रोका जाना अहम है। 
  • मानव और वन्यजीव संघर्ष को कम करने लिये जहां कदम उठाने ज़रूरी है, वहीं वन्यजीवों की उपयोगिता को लेकर जागरूकता भी ज़रूरी है। जंगलों में वन्यजीवों का भोजन कम होने की वज़ह से भी वे हमलावर हो रहे हैं। 
  • वन्यजीव प्रभावित क्षेत्रों में बच्चों और पालतू जानवरों को सुरक्षित रखना अहम है। ऐसे में वन्य जीवों से प्रभावित गाँवों में मॉडल प्रोजेक्ट के तहत लोगों को विशेष रूप से जागरूक करने के साथ ही ऐसी घटनाओं को रोकने के लिये प्रशिक्षित किया जाना चाहिये। 
  • ग्रामीणों को मॉक ड्रिल के ज़रिये गुलदार, भालू आदि वन्य जीवों के हमलों से बचने, रेसक्यू करने और इन्हें पकड़ने की तकनीकी जानकारी भी दी जानी चाहिये। 
  • जिन राज्यों में हाथियों की संख्या अधिक है वहाँ  ऐसे कॉरीडोर बनाए गए हैं, जो न केवल उनकी व्यवधानरहित आवाजाही को सुनिश्चित करते हैं, बल्कि आनुवंशिक विविधता विनिमय के आदान-प्रदान को भी बढ़ावा देते हैं। 
  • यह कॉरीडोर भूमि का ऐसा सँकरा गलियारा या रास्ता होता है जो हाथियों को उनके वृहद् पर्यावास से जोड़ता है। यह जानवरों के आवागमन के लिये एक पाइपलाइन के तरह का काम  करता है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिये ‘क्या करें, क्या न करें’ के संबंध में लोगों को जागरूक बनाने हेतु सरकार द्वारा जागरूकता अभियान चलाया जाता है। 
  • संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधन में स्थानीय समुदाय का सहयोग सुनिश्चित करने के उद्देश्य से चलाई जाने वाली पर्यावरण विकास गतिविधियों के लिये राज्य सरकारों को सहायता प्रदान की जाती है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्षों से संबंधित समस्याओं को हल करने के लिये वन कर्मचारियों और पुलिस को प्रशिक्षित किया जा रहा है।
  • वन्यजीवों के हमलों को रोकने के लिये संवेदनशील क्षेत्रों के आस-पास दीवारों तथा सोलर फेंस का निर्माण किया जा रहा है।
  • मनुष्य और वन्यजीवों के बीच संघर्ष के इस दौर में वन्यजीव अभयारण्यों और पार्कों के आस-पास रहने वाले लोगों को इस संबंध में जागरूक करना इस लिहाज़ से एक प्रभावी कदम है।
  • देहरादून स्थित भारतीय वन्यजीव संस्थान, राज्य वन विभागों और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण आदि अनुसंधान संस्थान अत्यधिक उच्च आवृत्ति वाले रेडियो कॉलर, ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम और सैटेलाइट अपलिंकिंग जैसी तकनीकों की मदद से शेर, बाघ, हाथी आदि वन्यजीवों की ट्रैकिंग करते हैं।
  • देश में 661 संरक्षित क्षेत्र हैं जो देश के संपूर्ण भौगोलिक क्षेत्र के 4.8%  में फैले हुए हैं। साथ ही देश में 100 नेशनल पार्क, 514 वन्यजीव अभयारण्य, 43 संरक्षित रिज़र्व और 4 सामुदायिक रिज़र्व हैं।

(टीम दृष्टि इनपुट)

भारत में वन्यजीवों के संरक्षण हेतु सरकारी उपाय 
भारत में वन और वन्यजीवों को संविधान की समवर्ती सूची में रखा गया है। एक केंद्रीय मंत्रालय वन्यजीव संरक्षण संबंधी नीतियों और नियोजन के संबंध में दिशा-निर्देश देने का काम करता है तथा राज्य वन विभागों की जिम्मेदारी है कि वे राष्ट्रीय नीतियों को कार्यान्वित करें। 

कम नहीं हैं वैधानिक प्रावधान 

राष्ट्रीय वन्यजीव योजना
केन्द्रीय वन और पर्यावरण मंत्रालय ने वन्यजीवों के सरंक्षण और स्वच्छ पर्यावास हेतु 15 वर्षों के लिये एक राष्ट्रीय वन्यजीव योजना की शुरुआत की है। वर्ष 2017 से 2031 तक के लिये तैयार की गई यह योजना पिछले वर्ष 2 अक्टूबर को जारी की गई थी। इस योजना का लक्ष्य वन्यजीवों के लिये नैदानिक सुविधाओं की व्यवस्था तथा जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याओं से निबटने की रणनीति तैयार करना है।

(टीम दृष्टि इनपुट)

वन स्थिति रिपोर्ट-2017 में उल्लेख 

  • देश के वन क्षेत्र में हो रही वृद्धि निस्संदेह एक सकारात्मक संकेत है, लेकिन इसके साथ वन्यजीवों, विशेषकर तेंदुओं, गुलदारों और बाघों जैसे संरक्षित हिंसक जीवों और मनुष्यों के बीच होने वाले संघर्ष में हो रही वृद्धि चिंता का कारण बन गई है। 
  • वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के आँकड़ों के अनुसार, देश के कुल वनक्षेत्र में लगभग एक प्रतिशत की वृद्धि के साथ ही इंसानों के साथ टकराव की जद में रहने वाले बाघ और हाथियों की संख्या में भी वृद्धि हुई है।
  • मंत्रालय से संबद्ध संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट में मानव और वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि के कारण हाथी, बाघ एवं तेंदुए जैसे हिंसक जानवरों के हमलों में मरने वालों लोगों की संख्या पर भी चिंता जताई गई है।
  • वनाच्छादित क्षेत्र के विस्तार और वन्यजीवों की संख्या में बढ़ोतरी के समानांतर मंत्रालय के आँकड़े बताते हैं कि हिंसक पशुओं के हमलों में मृतकों की संख्या भी बढ़ी है। 
  • अप्रैल 2014 से मई 2017 तक हिंसक वन्यजीवों के हमलों में 1144 जानें जा चुकी हैं। इनमें 1052 मौतें हाथियों के हमलों में हुईं। 
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष के कारण साल 2014-15 में 426 मौतें हुईं, जबकि इसके अगले साल 446 लोग हिंसक वन्यजीवों के शिकार हुए।

(टीम दृष्टि इनपुट)

निष्कर्ष: निश्चित रूप से वन्यजीव संरक्षण बेहद महत्त्वपूर्ण ही नहीं बल्कि एक पर्यावरणीय अनिवार्यता भी है, लेकिन यह भी सच है कि कम होते जा रहे जंगल वन्यजीवों को पूर्ण आवास प्रदान करने के लिये पर्याप्त नहीं हैं। एक नर बाघ को स्वतंत्र विचरण हेतु 60-100 वर्ग किमी. क्षेत्र की ज़रूरत होती है। हाथियों को कम-से-कम 10-20 किमी. प्रति दिन यात्रा करनी पड़ती है, लेकिन जंगलों के लगातार कम होते जाने के कारण वे भोजन और पानी की तलाश में बाहर निकल जाते हैं। जब तक जंगल कटते रहेंगे, मानव-वन्यजीव संघर्ष को टालने की बजाय बचाव के उपाय करना ही संभव हो सकेगा। ऐसे में संघर्ष को टालने का सबसे बेहतर विकल्प है पर्यावरण के अनुकूल विकास अर्थात् तुम भी रहो, हम भी रहें...चलती रहे जिंदगी। इस सबके मद्देनज़र ऐसी नीतियाँ बनाने की ज़रूरत है, जिससे मनुष्य व वन्यजीव दोनों ही सुरक्षित रहें।