रैपिड फायर
चाबहार बंदरगाह पर अमेरिकी छूट समाप्त
- 28 Apr 2026
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हाल ही में ईरान के चाबहार बंदरगाह पर अमेरिकी प्रतिबंध छूट 26 अप्रैल, 2026 को समाप्त हो गई, जिससे ईरान के रास्ते अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक भारत की दीर्घकालिक संपर्क परियोजना को लेकर अनिश्चितता उत्पन्न हो गई है।
- अब भारत के सामने एक सामरिक विकल्प है: या तो इस परियोजना में अपनी भागीदारी कम कर दे/समाप्त कर दे या फिर अमेरिकी प्रतिबंधों की चपेट में आने का जोखिम उठाए।
- प्रतिबंधों के जोखिम को न्यूनतम करने के लिये सरकार ने चाबहार से अपने कर्मियों को वापस बुला लिया है, अपनी 120 मिलियन अमेरिकी डॉलर की निवेश प्रतिबद्धता का पूर्व भुगतान कर दिया है और शहीद बेहेश्ती टर्मिनल में अपनी हिस्सेदारी एक ईरानी कंपनी को हस्तांतरित करने पर विचार कर रही है। हालाँकि यह हस्तांतरण अभी भी चर्चा के अधीन है और इसे अभी तक लागू नहीं किया गया है।
चाबहार बंदरगाह
- परिचय: चाबहार ईरान का भारत के सबसे निकट का समुद्री बंदरगाह है, जो ओमान की खाड़ी के तट पर मकरान तट के साथ सीस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थित है।
- इसमें दो टर्मिनल हैं — शहीद कलंतरी और शहीद बेहेश्ती टर्मिनल, जिसमें भारत बाद वाले टर्मिनल के विकास में शामिल है।
- समझौते: चाबहार बंदरगाह समझौते पर 2003 में हस्ताक्षर किये गए थे, हालाँकि इससे संबंधित वर्ष 2016 में एक त्रिपक्षीय समझौता (भारत–ईरान–अफगानिस्तान) इस बंदरगाह को संचालित करने के लिये किया गया था।
- यह परियोजना पाकिस्तान को दरकिनार करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच प्रदान करती है।
- महत्त्व: पाकिस्तान को बायपास करते हुए अफगानिस्तान और मध्य एशिया के लिये एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है।
- अंतर्राष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (INSTC) के लिये एक द्वार के रूप में कार्य करता है, जो भारत को रूस, मध्य एशिया और यूरोप से जोड़ता है।
- आर्थिक एवं संपर्क लाभ: परिवहन लागत और समय को कम करता है, व्यापार दक्षता में सुधार करता है, तथा भारत को कज़ाखस्तान और उज़्बेकिस्तान जैसे मध्य एशियाई बाज़ारों तक सीधी पहुँच प्रदान करता है।
- सामरिक महत्त्व: चीन के ग्वादर बंदरगाह के विकल्प के रूप में भारत के क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ाता है, साथ ही अफगानिस्तान को मानवीय सहायता पहुँचाने में सक्षम बनाता है।
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