तिरुमंगई अलवार की मूर्ति भारत में वापस | 06 Mar 2026
ऑक्सफोर्ड के एशमोलियन म्यूज़ियम ने संत तिरुमंगई अलवार की 16वीं शताब्दी की एक कांस्य प्रतिमा भारत सरकार को वापस सौंप दी है। यह कदम तब उठाया गया जब शोध के माध्यम से यह पुष्टि हो गई कि यह प्रतिमा तमिलनाडु के सौंदरराज पेरुमल मंदिर की है।
- इस प्रतिमा की पहचान 'इंडिया प्राइड प्रोजेक्ट' नामक एक कल्चरल एडवोकेसी ग्रुप द्वारा की गई थी। उन्होंने एशमोलियन की कांस्य प्रतिमा की पहचान फ्रेंच इंस्टीट्यूट ऑफ पांडिचेरी के वर्ष 1957 के अभिलेखीय (archival) चित्रों से किया।
तिरुमंगई अलवर
- परिचय: तिरुमंगई 12 अलवार संतों में से अंतिम थे। अलवार तमिल कवि-संत थे, जिन्होंने 8वीं शताब्दी ईस्वी के दौरान वैष्णव परंपरा में अपना जीवन भगवान विष्णु को समर्पित कर दिया था।
- योद्धा के रूप में प्रारंभिक जीवन: मूल रूप से कालियान नाम से जाने जाने वाले, उनका जन्म कल्लर समुदाय (एक योद्धा जाति) में हुआ था और उन्होंने चोल साम्राज्य के अधीन एक सैन्य कमांडर और सरदार के रूप में सेवा की (जिसके लिये उन्हें तिरुमंगई मन्नन की उपाधि प्राप्त हुई)। वे एक कुशल तीरंदाज़ थे।
- साहित्यिक योगदान: उन्हें ‘नारकवि पेरुमल’ (उत्कृष्ट कवि) के रूप में जाना जाता है और उन्होंने 1,000 से अधिक छंदों की रचना की है। उनकी प्रमुख कृतियों में 'पेरिया थिरुमोझी', 'थिरुनेदुनथंडकम' और 'थिरुक्कुरुथंडकम' शामिल हैं, जो पवित्र 'नालयिरा दिव्य प्रबंधम' का हिस्सा हैं।
- मंदिर विरासत: उन्होंने श्रीरंगम मंदिर के संवर्द्धन में योगदान दिया और कहा जाता है कि उन्होंने सभी 108 दिव्य देशमों (पवित्र विष्णु मंदिरों) का दर्शन किया था।
- उन्होंने श्रीरंगम श्री रंगनाथस्वामी मंदिर (तिरुचिरापल्ली, तमिलनाडु) की दीवारों में से एक का निर्माण कराया था और भगवान श्री रंगनाथन पर कविताओं की रचना की थी।
- आध्यात्मिक महत्त्व: उन्हें भगवान विष्णु के 'शारंग' धनुष का अवतार माना जाता है। उनका जीवन वृत्तांत 'भक्ति' के माध्यम से सांसारिक भौतिकवाद से परम भक्ति की ओर परिवर्तन के विषय को उजागर करता है।