पवित्र कमल में ऊष्माजनन | 30 Jan 2026

स्रोत: द हिंदू 

हाल ही में एक अध्ययन में यह रेखांकित किया गया है कि पवित्र कमल (Nelumbo nucifera) में पुष्पन के दौरान ऊष्मा उत्पन्न करने की विशिष्ट क्षमता होती है, जो पौधों में एक दुर्लभ प्राकृतिक घटना है।

  • परिचय: पवित्र कमल उत्तर एवं मध्य भारत का देशज पौधा है, जो तालाबों, झीलों तथा मंद प्रवाह वाले जलाशयों में उगता है। इसका पुष्पन ग्रीष्म ऋतु के आरंभ में होता है और प्रत्येक पुष्प सामान्यतः तीन से चार दिनों तक खिला रहता है।
  • ऊष्माजनन: पुष्पन अवस्था के दौरान कमल में ऊष्माजनन (थर्मोजेनेसिस) की क्षमता पाई जाती है, अर्थात यह ऊष्मा उत्पन्न करता है। यह गुण स्कंक कैबेज और एरम लिली जैसे कुछ अन्य पौधों में भी देखा जाता है और मुख्यतः परागण की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के लिये एक अनुकूलन के रूप में विकसित हुआ है।
  • मुख्य ऊष्मीय विशेषता: पुष्पन अवस्था के दौरान कमल का फूल अपना आंतरिक तापमान लगभग 30–35°C बनाए रखता है, भले ही परिवेश का तापमान लगभग 10°C तक क्यों न गिर जाए।
  • ऊष्मा उत्पन्न करने की प्रक्रिया: ऊष्माजनन उस समय प्रारंभ होती है जब पंँखुड़ियाँ गुलाबी होने लगती हैं और पुष्प अपने मादा चरण (Female Phase) में प्रवेश करता है। इस अवस्था में, पुंकेसर-वहन करने वाले पुष्पासन (रिसेप्टेकल) में कैल्सियम आयनों की तीव्र वृद्धि माइटोकॉन्ड्रिया को सक्रिय करती है, जो वैकल्पिक ऑक्सीडेज मार्ग के माध्यम से संचित स्टार्च और वसा को सीधे ऊष्मा में परिवर्तित कर देते हैं।
  • परागण में भूमिका: पुष्प के आधार से निकलने वाली खुशबू परागण करने वाले भृंगों (बीटल) को आकर्षित करती है। पंँखुड़ियाँ आंशिक रूप से बंद होकर एक उष्ण कक्ष का निर्माण करती हैं और इसके बाद के पुष्पन अवस्था में कीट परागकण लेकर अन्य पुष्पों तक पहुँचते हैं, जिससे परस्पर परागण (क्रॉस-पोलिनेशन) संभव होता है।
  • जैविक महत्त्व: ऊष्माजनन की प्रक्रिया परागण की दक्षता को बढ़ाती है, आनुवंशिक विविधता को बढ़ावा देती है और पौधे की समग्र प्रजनन सफलता में वृद्धि करती है।

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