निरसन और संशोधन अधिनियम, 2025 | 13 Apr 2026
निरसन और संशोधन अधिनियम, 2025 71 अप्रचलित कानूनों (1886-2023 तक के) को हटाकर और चार प्रमुख अधिनियमों में संशोधन करके भारत के कानूनी ढाँचे को सुव्यवस्थित करता है। यह अनावश्यक कानूनों को खत्म करने, कानूनी अव्यवस्था को कम करने और वैधानिक संदर्भों को अद्यतन करने के लिये एक विधायी "हाउसकीपिंग" उपाय के रूप में कार्य करता है। यह अधिनियम शासन सुगमता और व्यापार सुगमता को भी बढ़ावा देता है।
- निरसन (Repeal) का अर्थ है किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा कानून को हटाना या उसे रद्द करना, जबकि संशोधन (Amendment) का अर्थ है मौजूदा कानून में प्रावधानों को जोड़कर, हटाकर या प्रतिस्थापित करके उसमें बदलाव करना।
- निरसन और संशोधन अधिनियम, 2025: इस अधिनियम की पहली अनुसूची उन कानूनों को सूचीबद्ध करती है जिन्हें निरस्त कर दिया गया है क्योंकि वे अब अप्रचलित हो चुके हैं या अपना उद्देश्य पूरा कर चुके हैं, जबकि दूसरी अनुसूची मौजूदा कानूनों में लक्षित संशोधन पेश करती है, जिसमें भाषा को अद्यतन करना, त्रुटियों को सुधारना और विसंगतियों को दूर करना शामिल है।
- विशेष रूप से, वर्ष 2014 से अब तक 1,500 से अधिक पुराने केंद्रीय कानूनों को निरस्त किया जा चुका है, जिससे 'स्टैट्यूट बुक' (कानून की किताब) अधिक संक्षिप्त और समझने में आसान हो गई है।
- लक्षित वैधानिक संशोधन:
- CPC, 1908 और सामान्य खंड अधिनियम में पुराने डाक संदर्भों (उदाहरण के लिये, "पंजीकृत पोस्ट" को अब "पंजीकरण और डिलीवरी के प्रमाण के साथ स्पीड पोस्ट" से बदल दिया गया है) का प्रतिस्थापन। यह वर्तमान भारतीय डाक सेवाओं के साथ संयोजन सुनिश्चित करता है और प्रक्रियागत भ्रम को दूर करता है।
- भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 213 को हटाना, परीक्षण आवश्यकताओं में समुदाय-आधारित असमानताओं को समाप्त किया जा सके और उत्तराधिकार के मामलों में निष्पक्षता तथा एकरूपता सुनिश्चित की जा सके।
- आपदा प्रबंधन अधिनियम में किये गए सुधार- "रोकथाम" शब्द को "तैयारी" शब्द से बदल दिया गया है, जो यह सुनिश्चित करके वैधानिक ढाँचे को मज़बूत करता है कि कानून राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के प्रचालनगत अधिदेश को सटीक रूप से दर्शाता है।
- बचत खंड: यह अधिनियम यह सुनिश्चित करता है कि निरसन से पुराने कानूनों के तहत स्थापित मौजूदा अधिकारों, दायित्वों या चल रही कानूनी कार्यवाहियों पर कोई प्रभाव न पड़े।
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