अरावली पर सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ही फैसले पर लगाई रोक | 01 Jan 2026

स्रोत: द हिंदू

 सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने नवंबर 2025 के अपने उस निर्णय को स्थगित कर दिया है, जिसमें 100 मीटर ऊँचाई और 500 मीटर क्लस्टर मानदंड के आधार पर अरावली पहाड़ियों की एक संकीर्ण परिभाषा को बरकरार रखा गया था।

  • स्वतः संज्ञान (Suo Motu Cognisance): स्वतः संज्ञान लेते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने उल्लेख किया कि राजस्थान में 100 मीटर के मानदंड के अनुसार 12,081 पहाड़ियों में से केवल 1,048 ही ठहरेंगी, जिससे निम्न ऊँचाई वाली पहाड़ी शृंखलाएँ पर्यावरणीय संरक्षण से वंचित हो सकती हैं।
  • विशेषज्ञ समिति का प्रस्ताव: SC ने एक उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा है, जो वर्तमान परिभाषा से बाहर किये गए क्षेत्रों में सतत या विनियमित खनन के अल्पकालिक और दीर्घकालिक पारिस्थितिक प्रभावों का आकलन करेगी।

अरावली पर्वतमाला

  • परिचय: यह विश्व की सबसे प्राचीन वलित पर्वत प्रणालियों में से एक है, जो प्रोटेरोज़ोइक युग की है और एक प्राचीन, अत्यधिक क्षयित पर्वत प्रणाली का क्लासिक उदाहरण प्रस्तुत करता है।
  • भौगोलिक विस्तार: यह पर्वतमाला गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में तिरछे (उत्तर-पूर्व–दक्षिण-पश्चिम, 690–800 किमी) रूप में फैली हुई है।
  • भू-आकृतिक विभाजन: अरावली को दो मुख्य खंडों में विभाजित किया गया है:
  • सांभर–सिरोही शृंखला: दक्षिणी खंड, अधिक ऊँचा और वनाच्छादित, इसमें गुरु शिखर (सबसे ऊँचा शिखर, माउंट आबू, राजस्थान) शामिल है।
  • सांभर-खेतड़ी शृंखला: उत्तरी खंड, निचला और अधिक क्षयित।
  • जलवायु और पर्यावरणीय भूमिका: यह थार मरुस्थल के पूर्व दिशा में फैलाव के खिलाफ एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक बाधा का कार्य करता है, साथ ही भूजल पुनर्भरण और स्थानीय जलवायु नियंत्रण में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
  • यह सिंधु और गंगा नदी प्रणालियों के बीच एक महत्त्वपूर्ण जलग्रहण क्षेत्र विभाजन का निर्माण करता है।
  • नदी प्रवाह: बनास और साहिबी (यमुना की सहायक नदियाँ), लूनी नदी जो पश्चिम की ओर कच्छ के रण में बहती है (आंतरिक जल निकासी)।

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