श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी | 24 Mar 2026

स्रोत: पीआईबी 

केंद्रीय गृहमंत्री ने छठे सिख गुरु, गुरु हरगोबिंद साहिब जी को उनके ज्योति-ज्योत दिवस पर श्रद्धांजलि अर्पित की। यह दिवस 22 मार्च, 2026 को मनाया गया, जो उनके दिव्य ज्योति में विलीन होने का दिन है। इस अवसर पर उन्होंने संत-सिपाही परंपरा की स्थापना और मानवता की रक्षा में उनकी स्थायी विरासत को रेखांकित किया।

  • गुरु हरगोबिंद साहिब जी: उनका जन्म 1595 में पंजाब के अमृतसर ज़िले में हुआ था। अपने पिता गुरु अर्जुन देव जी की शहादत के बाद उन्होंने 1606 ई. में गुरुगद्दी सँभाली।
  • मीरी-पीरी की अवधारणा: उन्होंने क्रांतिकारी सिद्धांत मीरी (लौकिक/राजनीतिक शक्ति) और पीरी (आध्यात्मिक अधिकार) की शुरुआत की, जिसे उन्होंने दो अलग-अलग तलवारें धारण करके प्रतीकात्मक रूप से प्रदर्शित किया।
  • 'संत-सिपाही' परंपरा: अत्याचार के खिलाफ न्याय और आस्था की रक्षा की आवश्यकता को समझते हुए उन्होंने सिख समुदाय को एक योद्धा और आध्यात्मिक शक्ति में बदल दिया, जिससे संत-सिपाही के आदर्श की नींव रखी गई।
  • अकाल तख्त की स्थापना: धर्मनिरपेक्ष और राजनीतिक मामलों के संचालन के लिये उन्होंने 1609 में अकाल तख्त का निर्माण करवाया।
    • अमृतसर में हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर) के ठीक सामने बना यह स्थान सिख धर्म में लौकिक अधिकार के रूप में सर्वोच्च बना हुआ है।
  • बंदी छोड़ दिवस: गुरु हरगोबिंद साहिब जी को जहाँगीर ने ग्वालियर के किले में कुछ समय के लिये कैद कर लिया था। जब उन्हें रिहा करने की पेशकश की गई, तो उन्होंने 52 कैदी राजाओं को अपने साथ रिहा किये बिना जाने से इनकार कर दिया।
    • इस ऐतिहासिक मुक्ति को प्रतिवर्ष बंदी छोड़ दिवस (मुक्ति दिवस) के रूप में मनाया जाता है।
  • सैन्य संघर्ष: वह पहले सिख गुरु थे, जिन्होंने एक स्थायी सेना रखी और अपने लोगों की रक्षा के लिये युद्ध किया। उन्होंने मुगल सम्राट शाहजहाँ की सेनाओं के खिलाफ चार प्रमुख लड़ाइयों में सफलतापूर्वक नेतृत्व किया।
  • नगर की स्थापना: उन्होंने शिवालिक पहाड़ियों की तलहटी में कीरतपुर साहिब नामक शहर की स्थापना की, जहाँ उन्होंने अपने अंतिम वर्ष बिताए और अंततः 1644 में ज्योति-ज्योत प्राप्त की।

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