सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यों को पुलिस की मीडिया ब्रीफिंग नीति पर निर्देश दिये | 27 Jan 2026

स्रोत: द हिंदू 

भारत के सर्वोच्च न्यायालय (SC) ने सभी राज्य सरकारों को तीन महीने के भीतर पुलिस-मीडिया ब्रीफिंग के लिये एक व्यापक नीति तैयार करने का निर्देश दिया है। यह नीति, अमिकस क्यूरी (न्यायालय द्वारा आमंत्रित कानूनी विशेषज्ञ) गोपाल शंकरनारायणन द्वारा तैयार किये गए मैनुअल के आधार पर बनाई जाएगी, ताकि पारदर्शिता और आरोपी के अधिकारों के बीच संतुलन सुनिश्चित किया जा सके।

  • मामले की पृष्ठभूमि: यह निर्देश 'पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज़' (PUCL), एक नागरिक अधिकार NGO, के नेतृत्व में दायर याचिकाओं के एक समूह से उत्पन्न हुआ है।
    • यही NGO वर्ष 2014 के सर्वोच्च न्यायालय के ऐतिहासिक फैसले (PUCL बनाम महाराष्ट्र राज्य, 2014) में भी मुख्य भूमिका निभाया, जिसमें पुलिस मुठभेड़ों और न्यायालय के बाहर हत्याओं की जाँच के लिये 16 अनिवार्य दिशा-निर्देश तय किये गए थे।
  • गोपाल शंकरनारायणन पुलिस मैनुअल: इसमें अंतर्राष्ट्रीय सर्वोत्तम प्रथाओं और केंद्र सरकार के दृष्टिकोण को शामिल किया गया है।
    • यह मैनुअल एक "सिद्धांतपूर्ण, अधिकार-संगत और सुरक्षित जाँच ढाँचा" स्थापित करने का लक्ष्य रखता है, जो पीड़ितों, गवाहों और संदिग्धों की गरिमा, गोपनीयता और निष्पक्ष परीक्षण के अधिकारों की सुरक्षा करता है, साथ ही जनता की सटीक जानकारी की आवश्यकता को भी पूरा करता है।
    • मैनुअल में यह कहा गया है कि पुलिस-मीडिया ब्रीफिंग का उद्देश्य स्पष्ट और विशेष होना चाहिये: नुकसान को रोकना, अफवाहों को सही करना, जनता का सहयोग प्राप्त करना और कानून एवं व्यवस्था बनाए रखना।
  • भ्रामक सूचना पर नियंत्रण: "सोशल मीडिया युग" को ध्यान में रखते हुए न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि पुलिस केवल सही, सत्यापित और आवश्यक जानकारी ही जारी करे, ताकि ऐसे झूठे समाचारों का प्रसार रोका जा सके जो सार्वजनिक व्यवस्था को बाधित कर सकते हैं।

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