प्रीलिम्स फैक्ट्स: 18 जुलाई, 2020 | 18 Jul 2020

भागीरथी ईको-सेंसिटिव ज़ोन

Bhagirathi Eco-Sensitive Zone

उत्तराखंड राज्य में चारधाम सड़क परियोजना (CHAARDHAAM ROAD PROJECT) की समीक्षा बैठक में केंद्रीय पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से बताया कि भागीरथी ईको-सेंसिटिव ज़ोन (Bhagirathi Eco-Sensitive Zone) के लिये ज़ोनल मास्टर प्लान (Zonal Master Plan- ZMP) जिसे उत्तराखंड सरकार द्वारा तैयार किया गया और भारत सरकार के जलशक्ति मंत्रालय (Union Ministry of Jal Shakti) द्वारा मूल्यांकन किया गया, को केंद्रीय पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 16 जुलाई, 2020 को मंज़ूरी प्रदान की गई।

Gangotri

प्रमुख बिंदु: 

  • 18 दिसंबर, 2012 को स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए 4179.59 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करने वाले गोमुख से उत्तराकाशी तक भागीरथी ईको-सेंसिटिव ज़ोन (Bhagirathi Eco-Sensitive Zone) की अधिसूचना को केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा जारी किया गया था।
    • जिसमें स्थानीय लोगों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उनके अधिकारों एवं विशेषाधिकारों को प्रभावित किये बिना उनकी आजीविका सुरक्षित रखने के लिये पर्यावरण अनुकूल विकास को भी सुनिश्चित किया गया था।

केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की अधिसूचना में संसोधन: 

  • 16 अप्रैल, 2018 को केंद्रीय सड़क, परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय, उत्तराखंड सरकार एवं ‘इंडियन रोड काॅन्ग्रेस’ (Indian Road Congress) के साथ परामर्श करने के बाद वर्ष 2012 की अधिसूचना में संशोधन किया गया।
  • भागीरथी ईको-सेंसिटिव ज़ोन की अधिसूचना में उत्तराखंड सरकार को ज़ोनल मास्टर प्लान तैयार करने का अधिकार प्रदान किया गया जिसे एक निगरानी समिति की देखरेख में लागू किया जाना था। 

ज़ोनल मास्टर प्लान (Zonal Master Plan- ZMP):

  • ZMP, वाटरशेड दृष्टिकोण पर आधारित है और इसमें वन एवं वन्यजीव, जल प्रबंधन, सिंचाई, ऊर्जा, पर्यटन, सार्वजनिक स्वास्थ्य एवं स्वच्छता, सड़क अवसंरचना आदि क्षेत्रों में ‘गुड गवर्नेंस’ का भी उल्लेख किया गया है।
  • ZMP के अनुमोदन से इस क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षण एवं पारिस्थितिकी को बढ़ावा मिलेगा और ZMP के अंतर्गत प्रदान की गई अनुमति के अनुसार विकासात्मक गतिविधियाँ भी शुरू की जा सकेंगी।

चारधाम सड़क परियोजना (CHAARDHAAM ROAD PROJECT):

Chardham-Road

  • चारधाम सड़क परियोजना गंगोत्री, केदारनाथ धाम, यमुनोत्री, बद्रीनाथ धाम एवं कैलाश मानसरोवर यात्रा के प्रमुख मार्ग से जोड़ी जाएगी।
  • इस परियोजना में 900 किलोमीटर राष्ट्रीय राजमार्ग शामिल हैं जो पूरे उत्तराखंड राज्य को आपस में जोड़ेगी।
    • प्रस्तावित राजमार्ग उत्तराखंड में चार पवित्र स्थानों (बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री एवं यमुनोत्री) को जोड़कर निर्माणाधीन चार धाम रेलवे (Char Dham Railway) के पूरक होंगे।

एएसपीआईआरई 

ASPIRE

‘इंटरनेशनल सेंटर ऑफ ऑटोमोटिव टेक्नोलॉजी’ (International Centre of Automotive Technology- ICAT) ऑटोमोटिव इंडस्ट्री के लिये एएसपीआईआरई (ASPIRE - ऑटोमोटिव सॉल्यूशंस पोर्टल फॉर इंडस्ट्री, रिसर्च एंड एजुकेशन) नामक टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म विकसित कर रहा है।

ASPIRE

प्रमुख बिंदु:

  • भारत सरकार का भारी उद्योग एवं सार्वजनिक उद्यम मंत्रालय (Ministry of Heavy Industries & Public Enterprises) ने भारत में विभिन्न क्षेत्रों के लिये नवाचार, अनुसंधान एवं विकास और उत्पाद विकास को बढ़ावा देने हेतु एक मिशन शुरू किया है।
  • इस मिशन की ओर पहला कदम ‘प्रौद्योगिकी मंच ई-पोर्टल’ का निर्माण है जहाँ इस तरह के प्रौद्योगिकी विकास, सूचना विनिमय एवं नवाचार की सुविधा हो सकती है।
  • विभिन्न संगठनों द्वारा विशिष्ट क्षेत्रों के लिये पाँच पोर्टल विकसित किये जा रहे हैं। 
    • बिजली क्षेत्र के उपकरणों के लिये भेल (BHEL)
    • मशीन टूल्स के लिये एचएमटी (HMT)
    • विनिर्माण प्रौद्योगिकी के लिये सीएमएफटीआई (CMFTI)
    • मोटर वाहन क्षेत्र के लिये आईसीएटी (ICAT) और एआरएआई (ARAI) 
  • इन पोर्टलों का उद्देश्य एक ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है जो समाधान चाहने वालों और समस्या हल करने वालों को एक साथ लाएगा। इनमें उद्योग, शिक्षा, अनुसंधान संस्थान, स्टार्ट-अप, पेशेवर एवं विशेषज्ञ शामिल हैं।
  • उल्लेखनीय है कि ICAT ऑटोमोटिव इंडस्ट्री के लिये एएसपीआईआरई (ASPIRE - ऑटोमोटिव सॉल्यूशंस पोर्टल फॉर इंडस्ट्री, रिसर्च एंड एजुकेशन) नामक टेक्नोलॉजी प्लेटफॉर्म विकसित कर रहा है।

एएसपीआईआरई (ASPIRE):

ASPIRE

  • इस पोर्टल का मुख्य उद्देश्य भारतीय मोटर वाहन उद्योग को आत्मनिर्भर बनाने की सुविधा प्रदान करना है।
  • इस मिशन के उद्देश्य को विभिन्न संबद्ध तरीकों से हितधारकों को एक साथ ला कर नवाचार एवं वैश्विक तकनीकी प्रगति को अपनाने में सहायता करके प्राप्त किया जाएगा।
  • इसकी गतिविधियों में निम्नलिखित क्षेत्र शामिल किये जाएंगे।
    • अनुसंधान एवं विकास
    • उत्पाद प्रौद्योगिकी विकास 
    • उद्योग के लिये तकनीकी एवं गुणवत्ता समस्या समाधान
    • विनिर्माण एवं प्रक्रिया प्रौद्योगिकी विकास
    • प्रौद्योगिकी विकास के लिये आने वाली चुनौतियाँ और भारतीय ऑटो उद्योग के रूझानों की पहचान के लिये ‘मार्केट रिसर्च एंड टेक्नोलॉजी सर्वे’ का आयोजन करना। 

गौरतलब है कि इन उपायों को भारत में मज़बूत एवं आत्मनिर्भर मोटर वाहन उद्योग के विकास के लिये विकसित किया जा रहा है जो भारत सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के विज़न के अनुरूप है।  


होप

Hope

खराब मौसम की स्थिति के कारण संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के पहले मंगल मिशन होप (Hope) को अब 19 जुलाई, 2020 को जापान में तानेगाशिमा स्पेस सेंटर (Tanegashima Space Center) से लॉन्च किया जाएगा।

Hope

प्रमुख बिंदु: 

  • संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने लाल ग्रह (मंगल ग्रह) के वातावरण का पहला एकीकृत मॉडल बनाने के उद्देश्य से वर्ष 2015 में ‘होप’ नामक ‘एमिरेट्स मार्स मिशन’ की घोषणा की थी।
  • इसका वजन लगभग 1500 किग्रा है और यह अंतरिक्ष यान के एक तरफ लगे वैज्ञानिक उपकरणों को ले जाएगा जिनमें एमिरेट्स एक्सप्लोरेशन इमेज़र (Emirates eXploration Imager- EXI) जो एक उच्च-रिज़ॉल्यूशन वाला कैमरा है, एमिरेट्स मार्स अल्ट्रावॉयलेट स्पेक्ट्रोमीटर (Emirates Mars Ultraviolet Spectrometer- EMUS), एक फॉर-यूवी इमेजिंग स्पेक्ट्रोग्राफ (Far-UV Imaging Spectrograph), एमिरेट्स मार्स इंफ्राड्रेड स्पेक्ट्रोमीटर (Emirates Mars InfraRed Spectrometer- EMIRS) और FTIR स्कैनिंग स्पेक्ट्रोमीटर (FTIR Scanning Spectrometer) शामिल हैं।
  • यह अंतरिक्ष यान मंगल ग्रह के वायुमंडल तथा बाह्य अंतरिक्ष एवं सौर हवाओं के साथ इसके संबंध का अध्ययन करेगा। साथ ही मंगल ग्रह की जलवायु से संबंधित डेटा एकत्र करेगा जिससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि मंगल के वातावरण का अंतरिक्ष में क्षरण क्यों हो रहा है?
  • एक बार लॉन्च होने के बाद ‘होप’ लगभग 200 दिनों तक मंगल की परिक्रमा करेगा जिसके बाद यह संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की स्थापना की 50वीं वर्षगांठ के साथ वर्ष 2021 तक लाल ग्रह की कक्षा में प्रवेश करेगा।
  • इस मिशन को संयुक्त अरब अमीरात की अंतरिक्ष एजेंसी ‘मोहम्मद बिन राशिद स्पेस सेंटर’ (Mohammed bin Rashid Space Centre) द्वारा संचालित किया जा रहा है।
  • ‘होप’ (Hope) मंगल ग्रह पर अरब जगत का पहला मिशन है। 

स्वदेशी बग

Indigenous Bug

हाल ही में एंटोमोलॉजिस्टों (Entomologists) की एक टीम ने तीन स्वदेशी बग (Indigenous Bug) का आकलन किया जो ‘वूली वाइटफ्लाई’ (Woolly Whitefly) नामक कीट को नियंत्रित कर सकता है।

Indigenous-Bug

प्रमुख बिंदु:

  • इनमें दो स्वदेशी बग कोक्सिनेल्लिडाय (Coccinellidae) परिवार की ‘लेडीबर्ड बीटल’ से और एक स्वदेशी बग न्यूरोप्टेरा (Neuroptera) क्रम की ‘ग्रीन लेसविंग फ्लाई’ (Green Lacewing Fly) से संबंधित है।
  • इसमें दो प्रकार के स्वदेशी बग ‘लेडीबर्ड बीटल’ (Ladybird beetles) एक कैरिबियन-मूल के ‘वूली वाइटफ्लाई’ (Woolly Whitefly) के खिलाफ जैविक हथियार हैं जो भारतीय फल किसानों को भी नुकसान पहुँचाता है। 
    • इन कीड़ों का जीवन चक्र चार चरणों [अंडा (Egg), ग्रब (Grub), प्यूपा (Pupa) और वयस्क (Adult)] में विभाजित होता हैं और ये 30-40 दिनों में अपना जीवन चक्र पूरा करते हैं।
    • ये कीड़े 10-12 दिनों के लिये सक्रिय ग्रब चरण (Active Grub Stage) के दौरान ‘वूली वाइटफ्लाई’ (Woolly Whitefly) का सेवन करते हैं।
    • एक स्वदेशी बग अपने पूरे जीवन चक्र में 200-300 ‘वूली वाइटफ्लाई’ को खा सकता है।

वूली वाइटफ्लाई (Woolly Whitefly):

Woolly-Whitefly

  • इसका उल्लेख पहली बार वर्ष 1896 में जमैका में किया गया था और वर्ष 1909 में संयुक्त राज्य अमेरिका के फ्लोरिडा में संसूचित किया गया।
  • इसकी नव-उष्णकटिबंधीय (Neo-Tropical) उत्पत्ति दुनिया के कई गर्म भागों में पाई जाती है और इसे ‘साइट्रस व्हाइटफ्लाई’ (Citrus Whitefly) भी कहा जाता है।
  • यह व्हाइटफ्लाई (एलेरोथ्रिक्सस फ्लोक्कोसुस- Aleurothrixus Floccosus) आक्रामक एवं पॉलीफैगस (Polyphagous) है अर्थात् यह विभिन्न प्रकार के भोजन पर निर्भर रहता है।
  • बेंगलुरु में ICAR के राष्ट्रीय कृषि कीट संसाधन ब्यूरो (National Bureau of Agricultural Insect Resources) ने कैरिबियाई द्वीप से कीट के प्रसार को वर्ष 2019 में संक्रमित पौधों के परिवहन के माध्यम से रिपोर्ट किया था।
  • यह भारत में लगभग 20 वनस्पति प्रजातियों को प्रभावित कर चुका है जिनमें अमरूद की प्रजाति प्रमुख है।  
  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (Indian Council of Agricultural Research- ICAR) के अनुसार, ये कीट वर्षभर में देश की 30-35% फसलों को नुकसान पहुँचाते हैं।