पार्किंसंस रोग | 17 Apr 2026
अप्रैल माह को पार्किंसंस रोग जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है, जो जीवन की गुणवत्ता में सुधार के लिये शीघ्र निदान और समय पर उपचार के महत्त्व को उजागर करता है।
- यूरोप के पार्किंसंस ने अप्रैल 1997 में विश्व स्वास्थ्य संगठन के समर्थन से विश्व पार्किंसंस दिवस की स्थापना की, ताकि जेम्स पार्किंसंस के जन्मदिन को चिह्नित किया जा सके, जिन्होंने पहली बार वर्ष 1817 में इस बीमारी का वर्णन किया था।
पार्किंसंस रोग
- परिचय: पार्किंसंस रोग एक प्रगतिशील न्यूरोडीजेनरेटिव विकार है जो गति को क्षीण करता है और अंततः गतिहीनता और मनोभ्रंश का कारण बन सकता है।
- व्यापकता: पिछले 25 वर्षों में पार्किंसंस रोग का वैश्विक बोझ दोगुना हो गया है, जिसमें भारत में लगभग 10% मामले हैं।
- आयु और लिंग: यह आमतौर पर लोगों को उनके 5वें-6ठे दशक (जब वे 50 या 60 वर्ष की आयु में होते हैं) में प्रभावित करता है, हालाँकि युवा व्यक्ति भी प्रभावित हो सकते हैं और पुरुष महिलाओं की तुलना में अधिक प्रभावित होते हैं।
- प्रमुख लक्षण: इस रोग की पहचान कंपन (Tremors), गति में धीमापन (ब्रैडीकिनेसिया) और माँसपेशियों की जकड़न (Rigidity) से की जाती है।
- गैर-गतिशील लक्षण: प्रारंभिक संकेतों में कब्ज़ और नींद संबंधी विकार शामिल हो सकते हैं, जो शारीरिक लक्षणों के प्रकट होने से कई वर्ष पहले दिखाई दे सकते हैं।
- निदान की चुनौती: लक्षणों को अक्सर गलत समझ लिया जाता है या नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है, जिससे निदान में देरी होती है और रोगी को लंबे समय तक कष्ट सहना पड़ता है।
- उपचार: इसका कोई निश्चित इलाज नहीं है, लेकिन दवाओं के माध्यम से लक्षणों को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सकता है और जीवन की गुणवत्ता में काफी सुधार किया जा सकता है।
- उपचार की उन्नत तकनीकें: डीप ब्रेन स्टिमुलेशन (DBS) और MR-गाइडेड फोकस्ड अल्ट्रासाउंड जैसी आधुनिक पद्धतियाँ विशिष्ट रोगियों के लिये प्रभावी विकल्प हैं। ये तकनीकें सीधे प्रभावित क्षेत्र पर केंद्रित होकर लक्षणों को नियंत्रित करने में उच्च स्तर की सटीकता प्रदान करती हैं।
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