ओल चिकी लिपि | 17 Feb 2026
भारत के राष्ट्रपति ने नई दिल्ली में संस्कृति मंत्रालय द्वारा आयोजित ओल चिकी लिपि के शताब्दी समारोह का उद्घाटन किया, जो इस लिपि के 100 वर्ष पूर्ण होने तथा संथाल पहचान के संरक्षण में इसकी निर्णायक भूमिका को चिह्नित करता है।
- इस अवसर पर लिपि के 100 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में एक स्मारक सिक्का तथा डाक टिकट भी जारी किये गए।
- आविष्कार एवं इतिहास: ओल चिकी लिपि का आविष्कार पंडित रघुनाथ मुर्मू द्वारा वर्ष 1925 में संथाली भाषा के लिये एक विशिष्ट एवं स्वदेशी लिपि उपलब्ध कराने के उद्देश्य से किया गया था। इससे पूर्व संथाली भाषा को रोमन, देवनागरी,ओडिया अथवा बंगाली लिपियों में लिखा जाता था।
- ओडिशा के मयूरभंज ज़िले के पंडित रघुनाथ मुर्मू ने ओल चिकी में पहली पुस्तक हाई सेरेना (1936) की रचना की तथा बिदु-चंदन जैसी कृतियों के माध्यम से संथाली संस्कृति का सजीव चित्रण किया।
- भाषिक संरचना: यह लिपि 30 वर्णों से निर्मित है तथा पूर्णतः ध्वन्यात्मक सिद्धांत पर आधारित है, अर्थात प्रत्येक चिह्न किसी विशिष्ट ध्वनि का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करता है।
- ओल चिकी लिपि संथाली भाषा (जो ऑस्ट्रो-एशियाटिक भाषा परिवार से संबंधित है) में निहित ग्लॉटल स्टॉप तथा विशिष्ट स्वर-पैटर्न का सटीक निरूपण करती है।
- भौगोलिक विस्तार: यह झारखंड, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बिहार और असम में संथालीभाषियों के लिये प्रमुख अभिव्यक्ति का माध्यम है।
- संवैधानिक दर्जा: ओल चिकी लिपि में लिखी जाने वाली संथाली भाषा को वर्ष 2003 में 92वें संविधान संशोधन अधिनियम के माध्यम से भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया।
- लोकतांत्रिक पहुँच: भाषायी न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम के रूप में दिसंबर 2025 में भारतीय संविधान का संथाली भाषा में ओल चिकी लिपि के माध्यम से अनुवाद किया गया।