रैपिड फायर
वोट देने के अधिकार को मौलिक अधिकार बनाना
- 02 May 2026
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विपक्षी दल मतदान के अधिकार को केवल एक वैधानिक अधिकार से उन्नत कर एक मौलिक अधिकार (संविधान के भाग III के तहत) बना ने के लिये समर्थन कर रहा है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि नागरिकों के पास मताधिकार से वंचित किये जाने के विरुद्ध संवैधानिक उपचार उपलब्ध हो।
- यह मांग विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया को लेकर चिंताओं के बीच और भी महत्त्वपूर्ण हो गई है, जिसमें मतदाता सूची से बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने के आरोप लगे हैं, जो चुनावी समावेशिता के लिये जोखिम उत्पन्न करते हैं।
- इसे मौलिक अधिकार का दर्जा देने से यह पूरी तरह से वाद-योग्य हो जाएगा, जिससे नागरिक राज्य द्वारा मनमाने ढंग से मताधिकार से वंचित किये जाने के विरुद्ध सीधे सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) या उच्च न्यायालयों (अनुच्छेद 226) तक पहुँच सकेंगे।
- यह मांग प्रारूप समिति, विशेष रूप से डॉ. बी.आर. अंबेडकर की ऐतिहासिक दूरदर्शिता के अनुरूप है, जिन्होंने चेतावनी दी थी कि भविष्य की सरकारें लोकतांत्रिक भागीदारी को दबाने के लिये चुनावी पहुँच में हेरफेर कर सकती हैं।
मतदान का अधिकार
- वर्तमान में, भारत में मतदान का अधिकार एक वैधानिक अधिकार है, जो सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के सिद्धांत पर आधारित है।
- इसका संवैधानिक आधार भारत के संविधान के अनुच्छेद 326 में निहित है, जो 18 वर्ष से ऊपर के सभी नागरिकों को मतदान के अधिकार की गारंटी देता है — यह आयु 61वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1988 द्वारा 21 से घटाकर 18 कर दी गई थी।
- इसका वैधानिक ढाँचा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 द्वारा प्रदान किया गया है, जो मतदाताओं की पात्रता (नागरिकता और निवास) को नियंत्रित करता है तथा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951, जो मतदान के अधिकारों और अयोग्यताओं को विनियमित करता है।
- मतदान की स्वतंत्रता: हालाँकि मतदान की स्वतंत्रता को अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत मौलिक अधिकार के हिस्से के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करता है।
- इसमें किसी उम्मीदवार का चयन करके या नोटा (NOTA - इनमें से कोई नहीं) का विकल्प चुनकर अपनी पसंद व्यक्त करने की मतदाता की क्षमता शामिल है, हालाँकि इस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का प्रयोग केवल वास्तविक चुनाव प्रक्रिया के दौरान ही किया जाता है।
मतदान के अधिकार की न्यायिक व्याख्या
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मामला |
न्यायिक व्याख्या |
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एन.पी. पोन्नुस्वामी (1952) |
सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मतदान का अधिकार वैधानिक है और इस पर कानून द्वारा लगाई गई सीमाएँ लागू होती हैं। |
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ज्योति बसु (1982) |
सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात की पुष्टि की कि मतदान न तो मौलिक अधिकार है और न ही सामान्य कानून के तहत मिलने वाला अधिकार है, बल्कि यह एक साधारण वैधानिक अधिकार है। |
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कुलदीप नैयर (2006) |
सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि मतदान का अधिकार वैधानिक है। |