लक्कुंडी की खुदाई से यूनेस्को दावेदारी को बढ़ावा | 29 Jan 2026

स्रोत: द हिंदू

हाल ही में कर्नाटक के गदग ज़िले के लक्कुंडी गाँव में कोटे वीरभद्रेश्वर मंदिर के निकट उत्खनन के दौरान नवपाषाण काल के अवशेष प्राप्त हुए हैं, जिससे इस स्थल को यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल करने के प्रयासों को गति मिली है।

लक्कुंडी

  • परिचय: लक्कुंडी, जिसे पहले लौक्किगुंडी कहा जाता था, गदग से लगभग 12 किमी. दूर स्थित है और ऐतिहासिक रूप से इसे “सौ कुओं और मंदिरों का गाँव” कहा जाता था।
  • ऐतिहासिक महत्त्व: लक्कुंडी का उल्लेख 11वीं–12वीं शताब्दी के अभिलेखों में मिलता है और समृद्धि के कारण इसकी तुलना कभी इंद्र की राजधानी अमरावती से की जाती थी।
    • यहाँ एक टांकशाला (टकसाल) थी और इस क्षेत्र पर चालुक्य, यादव और होयसल शासकों ने शासन किया।
    • 1192 ईस्वी में यहाँ होयसल राजा वीर बल्लाल की राजधानी थी।
  • सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत: यह गाँव जैन दानी और धर्मप्रचारक रानी अट्टिमब्बे की कर्मभूमि  रहा है, जो मंदिरों, जैन बसदियों और कुओं के निर्माण के लिये प्रसिद्ध थीं।
    • उनके सम्मान में राज्य सरकार ने “दाना चिंतामणि अट्टिमब्बे प्रशस्ति” नामक पुरस्कार की स्थापना की है।
    • जैन धर्म के उत्कर्ष के साथ-साथ लक्कुंडी ने 12वीं शताब्दी के शरण, जैसे– अजगंण्ण और मुक्तायक्क को भी पोषित किया, जो बसवेश्वर के सुधारवादी आंदोलन से संबंध रखते थे।
  • स्थापत्य विशेषताएँ: यद्यपि कई संरचनाएँ अब अस्तित्व में नहीं हैं, अभिलेखों में कल्याण चालुक्य स्थापत्य शैली के 13 विद्यमान मंदिरों तथा सुंदर नक्काशीदार बावड़ियों (सीढ़ीदार कुओं) का उल्लेख मिलता है।
  • समर्थन: राज्य सरकार भारतीय राष्ट्रीय कला एवं सांस्कृतिक विरासत न्यास (INTACH) के सहयोग से लक्कुंडी के स्मारकों को यूनेस्को के विश्व धरोहर स्थलों (WHS) की संभावित सूची में शामिल करने हेतु प्रस्ताव को अंतिम रूप दे रही है।

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