संलयन ऊर्जा की व्यवहार्यता | 07 Apr 2026

स्रोत: द हिंदू

चर्चा में क्यों?

नेचर एनर्जी  में प्रकाशित हालिया अध्ययन चेतावनी देता है कि वर्तमान में नाभिकीय संलयन (न्यूक्लियर फ्यूज़न) की लागत अनुमान अधिक आशावादी हैं, जिससे स्वच्छ ऊर्जा निवेश के असमर्थनीय आवंटन को लेकर चिंता उत्पन्न हो रही है।

  • विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि इस तरह के अवास्तविक अनुमान अधिक व्यवहार्य जलवायु समाधानों के लिये धन के प्रवाह को भटका सकते हैं और लागत में कमी तथा पैमाने की क्षमता सुधारने के लिये वैकल्पिक रिएक्टर डिज़ाइन, ईंधन और छोटे विन्यासों की खोज करने का सुझाव देते हैं।

संलयन क्या है?

  • परिचय: संलयन वह प्रक्रिया है जिसमें दो छोटे, हल्के परमाणु (जैसे– हाइड्रोजन के समस्थानिक) एक साथ मिलकर एक बड़ा एवं भारी परमाणु बनाते हैं और इस दौरान विशाल मात्रा में ऊर्जा मुक्त होती है। यही वह ऊर्जा प्रक्रिया है जो सूर्य और तारों को संचालित करती है।
    • उदाहरण के लिये, सूर्य में हाइड्रोजन के नाभिक मिलकर हीलियम का निर्माण करते हैं और इस प्रक्रिया में प्रकाश और ताप के रूप में ऊर्जा मुक्त होती है।
  • ऊर्जा उत्सर्जन: नाभिकों के संलयन से ऊर्जा इसलिये मुक्त होती है क्योंकि संलयन उत्पाद का द्रव्यमान व्यक्तिगत परमाणुओं के योग से कम होता है। इस ‘लुप्त/लॉस्ट’ द्रव्यमान, जिसे मास डिफेक्ट (Mass Defect) कहते हैं, को आइंस्टीन के विशेष सापेक्षता सिद्धांत (E=mc²) के अनुसार ऊर्जा में परिवर्तित किया जाता है।

Fusion_Energy_Viability

  • संलयन के लिये आवश्यक परिस्थितियाँ:
    • उच्च तापमान: लगभग 100 मिलियन°C
    • उच्च दबाव: परमाणु नाभिकों को संलयन के लिये पर्याप्त समीप लाने हेतु।
    • प्लाज़्मा: पदार्थ उच्च-ऊर्जा अवस्था में होता है, जहाँ परमाणु आयनों और इलेक्ट्रॉनों में विभाजित हो जाते हैं।
  • टोकामक: टोकामक एक संलयन रिएक्टर है, जो प्लाज़्मा को एक डोनट-आकार के पात्र में सीमित और नियंत्रित करने के लिये चुंबकीय क्षेत्रों का उपयोग करता है। इसकी प्रभावशीलता इस बात से मापी जाती है कि यह प्लाज़्मा को बिना क्षय के कितनी देर तक बनाए रख सकता है। 
    • अधिक समय तक प्लाज़्मा को सीमित रखने से रिएक्टर निरंतर और विश्वसनीय संलयन अभिक्रियाएँ प्राप्त करने के और अधिक निकट पहुँचते हैं।
  • Q मान (ऊर्जा लाभ गुणांक): Q मान किसी संलयन रिएक्टर की दक्षता को मापता है।
    • यह उत्पन्न ऊर्जा और निवेशित ऊर्जा का अनुपात होता है। यदि Q मान 1 से अधिक हो, तो इसका अर्थ है कि रिएक्टर अपनी खपत से अधिक ऊर्जा उत्पन्न कर रहा है।
  • संलयन बनाम विखंडन: विखंडन वह प्रक्रिया है जिसका उपयोग परमाणु रिएक्टरों में किया जाता है। इसमें एक भारी नाभिक (जैसे– यूरेनियम) छोटे नाभिकों में विभाजित होकर ऊर्जा मुक्त करता है।
    • वहीं संलयन में हल्के नाभिक आपस में मिलकर ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। संलयन से विखंडन की तुलना में बहुत कम रेडियोधर्मी अपशिष्ट उत्पन्न होता है, जिससे यह स्वच्छ ऊर्जा के लिये अधिक आकर्षक विकल्प बन जाता है।

नाभिकीय संलयन बनाम नाभिकीय विखंडन

नाभिकीय विखंडन

नाभिकीय संलयन 

परिभाषा

विखंडन का आशय एक बड़े परमाणु का दो या दो से अधिक छोटे परमाणुओं में विभाजन से है।

नाभिकीय संलयन का आशय दो हल्के परमाणुओं के संयोजन से एक भारी परमाणु नाभिक के निर्माण की प्रकिया से है।

घटना

विखंडन प्रकिया सामान्य रूप से प्रकृति में घटित नहीं होती है।

प्रायः सूर्य जैसे तारों में संलयन प्रक्रिया घटित होती है।

ऊर्जा आवश्यकता

विखंडन प्रकिया में दो परमाणुओं को विभाजित करने में बहुत कम ऊर्जा लगती है।

दो या दो से अधिक प्रोटॉन को एक साथ लाने के लिये अत्यधिक उच्च ऊर्जा की आवश्यकता होती है।

प्राप्त ऊर्जा

विखंडन से निकलने वाली ऊर्जा रासायनिक प्रतिक्रियाओं की तुलना में लगभग एक लाख गुना अधिक होती है, लेकिन यह नाभिकीय संलयन द्वारा उत्पन्न ऊर्जा से कम होती है।

संलयन से प्राप्त ऊर्जा विखंडन से निकलने वाली ऊर्जा से तीन से चार गुना अधिक होती है।

ऊर्जा उत्पादन 

विखंडन प्रकिया का उपयोग परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में किया जाता है।

यह ऊर्जा उत्पादन के लिये  एक प्रायोगिक तकनीक है।

नाभिकीय संलयन की आर्थिक व्यवहार्यता के समक्ष चुनौतियाँ

  • संलयन विद्युत संयंत्र बड़े पैमाने के और अत्यधिक पूंजी-गहन होते हैं, जिन्हें शीतलन और तापन जैसी आंतरिक प्रक्रियाओं को बनाए रखने के लिये बहुत अधिक ऊर्जा उत्पादन की आवश्यकता होती है।
  • यह तकनीक अत्यंत जटिल है और प्रायः परमाणु विखंडन से अधिक जटिल होती है, जिसमें आपस में जुड़ी हुई डिज़ाइन संरचनाएँ होती हैं, जो मानकीकरण और बड़े पैमाने पर विस्तार को सीमित करती हैं।
  • संलयन संयंत्रों को भूकंपीय जोखिम, जल उपलब्धता और नियामकीय परिस्थितियों जैसे कारकों के आधार पर स्थल-विशिष्ट अनुकूलन की आवश्यकता होती है, जिससे इनके बड़े पैमाने पर मानकीकृत निर्माण की संभावना कम हो जाती है।
  • ये सीमाएँ लागत में कमी की कम संभावना उत्पन्न करती हैं, जिससे मामूली लाभ के लिये भी बड़े पैमाने पर विस्तार की आवश्यकता होती है और यह तकनीक सौर ऊर्जा तथा उन्नत विखंडन तकनीकों के साथ प्रतिस्पर्द्धा करने में सीमित रह जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. नाभिकीय संलयन क्या है?
संलयन वह प्रक्रिया है जिसमें हल्के नाभिक एक भारी नाभिक बनाने के लिये संयोजित होते हैं, जिससे बड़ी मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित होती है।

2. संलयन के लिये किन परिस्थितियों की आवश्यकता होती है?
 संलयन के लिये अत्यधिक उच्च तापमान, उच्च दाब और प्लाज़्मा की आवश्यकता होती है, जिसे प्रायः टोकामक का उपयोग करके प्राप्त किया जाता है।

3. संलयन में Q मान क्या है?
Q मान निर्गत ऊर्जा का निवेशित ऊर्जा से अनुपात है, Q>1 का अर्थ है शुद्ध ऊर्जा लाभ।

4. संलयन की आर्थिक व्यवहार्यता के लिये क्या चुनौतियाँ हैं?
उच्च लागत, जटिल डिज़ाइन, सीमित मानकीकरण और विस्तारशीलता (स्केलेबिलिटी) संलयन को आर्थिक रूप से कम प्रतिस्पर्द्धी बनाती हैं।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा,  विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स

प्रश्न. परमाणु रिएक्टर में भारी पानी का कार्य होता है: (2011)

(a) न्यूट्रॉन की गति को धीमा कर देना।

(b) न्यूट्रॉन की गति बढ़ाना।

(c) रिएक्टर को ठंडा करना।

(d) परमाणु प्रतिक्रिया को रोकना।

उत्तर: (a)


मेन्स

प्रश्न. ऊर्जा की बढ़ती हुई ज़रूरतों के परिप्रेक्ष्य में क्या भारत को अपने नाभिकीय ऊर्जा कार्यक्रम का विस्तार करना जारी रखना चाहिये? नाभिकीय ऊर्जा से संबंधित तथ्यों एवं भयों की विवेचना कीजिये। (2018)