संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता | 24 Feb 2026

स्रोत: द हिंदू 

चर्चा में क्यों? 

संसद का बजट सत्र 2026 सांसदों (MPs) की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर चिंताएँ उत्पन्न कर चुका है, क्योंकि भाषणों के विलोपन ने अनुच्छेद 105 के तहत प्रदत्त सुरक्षा उपायों पर प्रश्न खड़े कर दिये हैं।

सांसदों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता कैसे संरक्षित और नियंत्रित है?

संवैधानिक संरक्षण:

  • अनुच्छेद 105(1) (संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता): यह संसद और इसकी समितियों में सांसदों को सत्र के दौरान एवं संसदीय कार्यवाही के दौरान स्वतंत्र रूप से बोलने का अधिकार सुनिश्चित करता है।
    • यह संरक्षण सांसदों को निर्भीक रूप से अपने विचार व्यक्त करने की अनुमति देता है, जिससे सशक्त बहस, कार्यपालिका की समीक्षा और प्रभावी विधायिका निर्माण संभव हो पाता है।
    • यह एक विशेष संसदीय विशेषाधिकार है और यह सामान्य नागरिकों को अनुच्छेद 19 के तहत मिलने वाली अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से अलग काम करता है, जो विशिष्ट “युक्तिसंगत प्रतिबंधों” (जैसे– सार्वजनिक व्यवस्था या नैतिकता) के अधीन होती है।
  • अनुच्छेद 105(2) (कानूनी कार्यवाही से सुरक्षा): यह सांसदों को संसद और इसकी समितियों में कही गई किसी भी बात या दिये गए किसी भी मत के लिये पूर्ण नागरिक या आपराधिक दायित्व से सुरक्षा प्रदान करता है।
    • यह संरक्षण पूर्ण रूप से व्यापक है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि अदालतें संसदीय कार्यवाही के दौरान दिये गए वक्तव्यों के लिये सांसदों पर प्रश्न नहीं उठा सकतीं और उन्हें दंडित नहीं कर सकतीं
    • यह सुरक्षा मुकदमेबाज़ी के माध्यम से डराने-धमकाने को रोकती है और विधायी विचार-विमर्श की स्वतंत्रता को बनाए रखती है।
  • असदस्य पर सुरक्षा का विस्तार: अनुच्छेद 105 (2) के तहत संरक्षण उन व्यक्तियों तक भी फैलता है जिन्हें संवैधानिक रूप से संसदीय कार्यवाहियों में भाग लेने का अधिकार है, जैसे कि भारत का अटॉर्नी जनरल (महान्यायवादी)
    • यह सभी अधिकृत प्रतिभागियों को कानूनी परिणामों से सुरक्षा प्रदान करके बहस में निरंतरता और खुलापन सुनिश्चित करता है।
  • अनुच्छेद 121: यह संसदीय भाषण पर सीमा लगाता है, सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा को निषिद्ध करता है, सिवाय अभियोग कार्यवाही के दौरान।
    • यह प्रावधान विधायी स्वतंत्रता और न्यायिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित करता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि संसद में न्यायपालिका को अनायास या राजनीतिक रूप से प्रेरित आलोचना का सामना न करना पड़े।
  • प्रक्रिया नियमों के माध्यम से विनियमन:
    • विलोपन: लोकसभा कार्यविधि नियमावली का नियम 380 स्पीकर को यह विवेकाधिकार देता है कि वे संसदीय बहस में उपयोग किये गए ऐसे शब्द या अभिव्यक्तियाँ हटा दें जिन्हें मानहानिकारक, अश्लील, असंसदीय या अपमानजनक माना जाता है।
    • सब ज्यूडिस मामले: सांसद अभी न्यायालय में चल रहे मामलों पर चर्चा नहीं कर सकते।
    • व्यक्तिगत आरोप: किसी व्यक्ति के खिलाफ मानहानिकारक या आपराधिक आरोप बिना स्पीकर को पूर्व सूचना दिये लगाना प्रतिबंधित है।
    • उच्च प्राधिकारी: उच्च संवैधानिक प्राधिकरण वाले व्यक्तियों के आचरण पर नकारात्मक टिप्पणी करना प्रतिबंधित है।
    • सहकर्मी सदस्यों के प्रति आचरण: सहकर्मी सदस्यों की सद्भावना (Bona fides) पर प्रश्न उठाना सामान्यतः नियमों के विरुद्ध माना जाता है।
  • दुरुपयोग के विरुद्ध आंतरिक नियंत्रण: विशेषाधिकार समिति संसदीय विशेषाधिकार के उल्लंघन या दुरुपयोग के मामलों की जाँच करती है। यह सुनिश्चित करती है कि सांसद अपनी प्रतिरक्षा का उपयोग किसी ऐसे व्यक्ति की मानहानि या उसे नुकसान पहुँचाने के लिये न करें, जिसके पास अन्यथा सीमित कानूनी उपाय उपलब्ध हों।

सांसदों की वाक्-स्वतंत्रता से संबंधित सर्वोच्च न्यायालय के प्रमुख निर्णय

  • तेज किरण जैन बनाम एन. संजीव रेड्डी (1970): सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 105(2) के तहत सांसदों को पूर्ण प्रतिरक्षा (एब्सोल्यूट इम्युनिटी) प्रदान करने को निरंतर रखा। न्यायालय ने “कुछ भी”  (Anything) शब्द की सबसे व्यापक व्याख्या पर बल दिया तथा यह पुनः स्थापित किया कि संसद में दिया गया भाषण न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर है।
  • पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम राज्य (1998): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि रिश्वत का संबंध संसद में दिये गए मत (वोट) से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हो, तो सांसद उस मामले में अभियोजन से प्रतिरक्षित रहेंगे।
  • राजा राम पाल बनाम माननीय अध्यक्ष, लोकसभा (2007): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि यदि संसदीय विशेषाधिकारों के प्रयोग में संवैधानिक सीमाओं का उल्लंघन होता है, तो वे न्यायिक समीक्षा के अधीन होंगे।
  • कौशल किशोर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2023): सर्वोच्च न्यायालय ने निर्णय दिया कि किसी मंत्री का बयान स्वतः सरकार का आधिकारिक रुख नहीं माना जाएगा और जब तक सरकार उन टिप्पणियों का औपचारिक रूप से समर्थन न करे, तब तक सरकार उसके लिये उत्तरदायी नहीं होगी।
  • सीता सोरेन बनाम भारत संघ (2024): सर्वोच्च न्यायालय ने 1998 के पी.वी. नरसिम्हा राव बनाम राज्य के निर्णय को निरस्त करते हुए कहा कि सांसदों और विधायकों को सदन में वोट देने या भाषण करने के लिये रिश्वत लेने पर अभियोजन से कोई प्रतिरक्षा प्राप्त नहीं है।
    • न्यायालय ने निर्णय दिया कि रिश्वत लेना एक आपराधिक कृत्य है और इसे अनुच्छेद 105(2) या अनुच्छेद 194(2) (जो विधायकों को संरक्षण प्रदान करता है) के तहत संरक्षण प्राप्त नहीं है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 105 सासंदों को क्या प्रदान करता है?
अनुच्छेद 105 सांसदों को संसद में भाषण की स्वतंत्रता और सदन या उसकी समितियों में दिये गए किसी भी मत के लिये कानूनी कार्रवाई से प्रतिरक्षा प्रदान करता है।

2. क्या न्यायालय संसद में सांसदों द्वारा दिये गए बयान पर प्रश्न उठा सकती हैं?
नहीं। संसद में दिया गया भाषण अनुच्छेद 105(2) के तहत प्रतिरक्षित है, हालाँकि रिश्वत जैसे आपराधिक कृत्य इससे संरक्षित नहीं हैं।

3. संसदीय कार्यवाही में 'रिकॉर्ड से हटाने' का उद्देश्य क्या है?
रिकॉर्ड से हटाने (Expunction) का प्रयोग अपमानजनक, अश्लील या असंसदीय शब्दों को हटाने के लिये किया जाता है, ताकि संसदीय शिष्टाचार बना रहे और सार्थक चर्चा सुरक्षित रहे।

4. विशेषाधिकार समिति की भूमिका क्या है?
यह संसदीय विशेषाधिकार के उल्लंघन या दुरुपयोग की जाँच करती है और यह सुनिश्चित करती है कि प्रतिरक्षा का उपयोग किसी व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने या विधायी सत्यनिष्ठा को कमज़ोर करने के लिये न किया जाए।

UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ) 

प्रिलिम्स

प्रश्न. समाज में समानता होने का एक निहितार्थ यह है कि उसमें: (2017)

विशेषाधिकारों का अभाव है

अवरोधों का अभाव है

(c) प्रतिस्पर्द्धा का अभाव है
(d) विचारधारा का अभाव है

उत्तर: A

मेन्स 

प्रश्न. संसद और उसके सदस्यों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ (इम्यूनिटीज़), जैसे कि वे संविधान की धारा 105 में परिकल्पित हैं, अनेकों असंहिताबद्ध (अन-कोडिफाइड) और अ-परिगणित विशेषाधिकारों के जारी रहने का स्थान खाली छोड़ देती हैं। संसदीय विशेषाधिकारों के विधिक संहिताकरण की अनुपस्थिति के कारणों का आकलन कीजिये। इस समस्या का क्या समाधान निकाला जा सकता है? (2014)