प्रारंभिक परीक्षा
भारत के श्रमिक आंदोलनों का विकास
- 04 May 2026
- 53 min read
चर्चा में क्यों?
भारतीय श्रमिक आंदोलनों का इतिहास औपनिवेशिक "आपराधिक साजिश" के आरोपों से लेकर संवैधानिक संरक्षणों तक के संक्रमण की एक गाथा है, जो वर्तमान में औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत नवीन चुनौतियों का सामना कर रहा है।
भारत में श्रमिक आंदोलन किस प्रकार विकसित हुए हैं?
- प्रारंभिक काल (1850–1900): औद्योगीकरण (सूती और जूट मिलों) के इस प्रारंभिक चरण के दौरान, कोई औपचारिक संघ नहीं थे। यह आंदोलन काफी हद तक परोपकारी थे, जिसका नेतृत्व समाज सुधारकों द्वारा किया जाता था।
- प्रथम आंदोलन: वर्ष 1875 में, एस.एस. बंगाली ने बंबई में कारखानों में महिलाओं और बच्चों की खराब स्थितियों को उजागर करने के लिये एक विरोध प्रदर्शन का नेतृत्व किया।
- पहला श्रम संघ: एन.एम. लोखंडे को भारतीय श्रम आंदोलन का जनक माना जाता है। उन्होंने बंबई मिल-हैंड्स एसोसिएशन (1890) की स्थापना की। हालाँकि यह एक आधुनिक ट्रेड यूनियन की तुलना में अधिक एक कल्याणकारी समूह था।
- विधायी मील का पत्थर: कारखाना अधिनियम, 1881 पारित किया गया, जिसने बाल श्रम और काम के घंटों को विनियमित किया।
- विकास और आधुनिक संघवाद (1900–1947): प्रथम विश्व युद्ध के आस-पास की अवधि ने आंदोलन को कल्याण-उन्मुख संघों से संगठित राजनीतिक निकायों में बदल दिया।
- पहला आधुनिक संघ: मद्रास लेबर यूनियन (1918), जिसकी स्थापना बी.पी. वाडिया ने की थी, भारत का पहला व्यवस्थित ट्रेड यूनियन माना जाता है।
- AITUC का गठन (1920): ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) का गठन अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) में भारत का प्रतिनिधित्व करने के लिये किया गया था। लाला लाजपत राय इसके पहले अध्यक्ष थे।
- वर्ष 1921 में, बकिंघम और कर्नाटक मिल्स मामले ने कानूनी संरक्षण की कमी को उजागर किया, क्योंकि संघ के नेताओं को श्रमिकों को संगठित करने के लिये दंडित किया गया था, जो सामान्य कानून के तहत संघों को साजिश के रूप में मानता था।
- इसके बाद एन. एम. जोशी ने कानूनी सुरक्षा उपायों का समर्थन किया, जिससे विधायी प्रावधानों के लिये निरंतर दबाव बना।
- कानूनी मान्यता: श्रमिक संघ अधिनियम, 1926 एक निर्णायक उपलब्धि साबित हुआ, जिसने यूनियनों को विधिक मान्यता दी और उनके सदस्यों को दीवानी मुकदमों तथा आपराधिक अभियोजन से सुरक्षा प्रदान की।
- वैधीकरण के बावजूद, औपनिवेशिक अधिकारियों ने मेरठ षडयंत्र केस (1929-1933) जैसे कदमों और व्यापार विवाद अधिनियम, 1929 तथा सार्वजनिक सुरक्षा विधेयक, 1928 जैसे प्रतिबंधात्मक कानूनों के माध्यम से दमनकारी नीतियाँ लागू कीं।
- इससे श्रम अधिकारों के “कानूनी प्रावधान” और “व्यावहारिक वास्तविकता” के बीच विरोधाभास उत्पन्न हो गया।
- स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिका: श्रमिक आंदोलन राष्ट्रीय संघर्ष से घनिष्ठ रूप से जुड़ गया, जहाँ लाला लाजपत राय और जवाहरलाल नेहरू जैसे नेताओं ने श्रमिकों के संगठित होने एवं उनकी सक्रिय भागीदारी का समर्थन किया।
- श्रमिक संघों में वैचारिक आधार (कम्युनिस्ट बनाम राष्ट्रवादी) पर विभाजन हुआ, जिसके परिणामस्वरूप इंडियन फेडरेशन ऑफ लेबर (IFL) जैसे समूहों का गठन हुआ। इसकी स्थापना वर्ष 1941 में एम.एन. रॉय द्वारा की गई थी, जब वे द्वितीय विश्व युद्ध के संबंध में वैचारिक मतभेदों के कारण AITUC से अलग हो गए थे।
- स्वतंत्रता के बाद (1947–1991): आज़ादी के पश्चात श्रमिक आंदोलन राजनीतिक दलों से जुड़ाव के आधार पर गहराई से विखंडित हो गया। इस दौरान प्रमुख श्रमिक महासंघों का गठन हुआ, जैसे:
- भारतीय राष्ट्रीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (INTUC) (1947): इसकी स्थापना कांग्रेस पार्टी द्वारा श्रमिक आंदोलन में कम्युनिस्ट (साम्यवादी) प्रभाव का मुकाबला करने के लिये की गई थी।
- हिंद मज़दूर सभा (HMS) (1948): इसकी स्थापना अशोक मेहता, टी.एस. रामानुजम और जी.जी. मेहता जैसे समाजवादियों द्वारा की गई थी।
- भारतीय मज़दूर संघ (BMS) (1955): इसकी स्थापना आर.एस.एस. (RSS) द्वारा की गई थी और वर्तमान में यह भारत का सबसे बड़ा श्रमिक संगठन है।
- सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (CITU) (1970): इसका गठन CPI(M) द्वारा AITUC से अलग होकर (विभाजन के परिणामस्वरूप) किया गया था।
- उदारीकरण के बाद का दौर (1991–वर्तमान): आउटसोर्सिंग और ठेका प्रणाली में वृद्धि ने औपचारिक क्षेत्र में पारंपरिक ट्रेड यूनियनों की शक्ति को कमज़ोर किया है। मार्च 2026 तक भारत (श्रम एवं रोज़गार मंत्रालय) में 12 मान्यता प्राप्त केंद्रीय ट्रेड यूनियन संगठन हैं।
- हाल के वर्षों में सरकार ने 29 श्रम कानूनों को समेकित कर 4 श्रम संहिताओं में परिवर्तित किया है- वेतन संहिता (2019), औद्योगिक संबंध संहिता (2020), सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020) और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ (OSH) संहिता (2020)।
- व्यवसाय करने में सुगमता को बढ़ावा देने के उद्देश्य के बावजूद, श्रमिक संघों ने हड़ताल के अधिकारों और सामूहिक सौदेबाज़ी में कमी आने पर चिंता व्यक्त की है। उदाहरणतः जहाँ औद्योगिक संबंध संहिता 2020 में उन्मुक्ति संबंधी प्रावधानों को बनाए रखा गया है, वहीं यह संघ की मान्यता के लिये 51% समर्थन की उच्च सीमा तथा हड़ताल हेतु 60 दिनों की नोटिस अवधि का प्रावधान भी प्रस्तुत करता है।
- वर्ष 2030 तक अनुमानित 2.35 करोड़ प्लेटफॉर्म श्रमिकों की उपस्थिति के बावजूद, नया कोड गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिकों के संबंध में मौन है। इन्हें ‘स्वतंत्र संविदाकार’ के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जिसके कारण इन्हें औपचारिक सामूहिक सौदेबाज़ी के अधिकार प्राप्त नहीं हैं।
- हाल के वर्षों में सरकार ने 29 श्रम कानूनों को समेकित कर 4 श्रम संहिताओं में परिवर्तित किया है- वेतन संहिता (2019), औद्योगिक संबंध संहिता (2020), सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020) और व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थितियाँ (OSH) संहिता (2020)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. भारतीय श्रम आंदोलन का जनक किसे माना जाता है?
एन. एम. लोखंडे को भारतीय श्रम आंदोलन का अग्रदूत माना जाता है। उन्होंने वर्ष 1890 में बॉम्बे मिल-हैंड्स एसोसिएशन की स्थापना की तथा कारखाना अधिनियम, 1881 और साप्ताहिक अवकाश के लिये सफल अभियान चलाया।
2. भारत के प्रथम आधुनिक ट्रेड यूनियन की स्थापना किसने की?
बी. पी. वाडिया ने वर्ष 1918 में मद्रास लेबर यूनियन की स्थापना की, जिसे नियमित सदस्यता एवं राहत कोष के साथ भारत का प्रथम व्यवस्थित आधुनिक ट्रेड यूनियन माना जाता है।
3. ट्रेड यूनियन अधिनियम, 1926 का कानूनी महत्त्व क्या था?
इस अधिनियम ने पंजीकृत ट्रेड यूनियनों को कानूनी मान्यता प्रदान की तथा वैध सामूहिक सौदेबाज़ी गतिविधियों के लिये पदाधिकारियों को IPC की धारा 120B के अंतर्गत आपराधिक षड्यंत्र के आरोपों से संरक्षण दिया।
UPSC सिविल सेवा परीक्षा, विगत वर्ष के प्रश्न (PYQ)
प्रिलिम्स
प्रश्न. भारत में, निम्नलिखित में कौन एक, उन फैक्टरियों में जिनमें कामगार नियुक्त हैं, औद्योगिक विवादों, समापनों, छँटनी और कामबंदी के विषय में सूचनाओं को संकलित करता है? (2022)
(a) केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय
(b) उद्योग संवर्द्धन और आंतरिक व्यापार विभाग
(c) श्रम ब्यूरो
(d) राष्ट्रीय तकनीकी जनशक्ति सूचना प्रणाली
उत्तर:(c)
प्रश्न. निम्नलिखित में से कौन 1948 में स्थापित ‘हिंद मज़दूर सभा’ के संस्थापक थे? (2018)
(a) बी. कृष्ण पिल्लई, ई.एम.एस. नम्बूदिरिपाद और के.सी. जॉर्ज
(b) जयप्रकाश नारायण, दीन दयाल उपाध्याय और एम.एन. रॉय
(c) सी.पी. रामास्वामी अय्यर, के. कामराज और वीरेशलिंगम पंतुलु
(d) अशोक मेहता, टी.एस. रामानुजम और जी.जी. मेहता
उत्तर: (d)
