कश्मीर में यूरेशियन ओटर | 17 Feb 2026

स्रोत: डाउन टू अर्थ

सिंध नहर के तट पर यूरेशियन ओटर को देखा गया है, इस प्रजाति के अचानक दिखने से कश्मीर घाटी में इसका पहला फोटोग्राफिक साक्ष्य मिला है, हालाँकि इसे कभी घाटी के कुछ भागों में स्थानीय रूप से विलुप्त माना जाता था।

यूरेशियन ओटर

  • परिचय: यूरेशियन ओटर (लुट्रा-लुट्रा), जिसे यूरोपीय या सामान्य ऊदबिलाव के नाम से भी जाना जाता है, लुट्रा वंश एवं मस्टेलिडी कुल (नेवला कुल) से संबंधित है।
  • शारीरिक संरचना: इनका शरीर सुव्यवस्थित होता है, पैर जालीदार होते हैं और जल में तैरने के लिये एक शक्तिशाली पूँछ होती है। जल में शिकार का पता लगाने के लिये इनमें मूँछें (वाइब्रिस्सी) होती हैं। इनमें  नर प्रजाति आमतौर पर मादा प्रजाति से बड़ी होती है।
  • आहार: ये मुख्यतः माँसाहारी होते हैं, जिनके आहार में लगभग 80% मछलियाँ (जैसे– ईल, सैल्मोनिड्स) शामिल हैं। ये  उभयचर, क्रस्टेशियन, जल पक्षी, छोटे स्तनधारी, सरीसृप, कीट और अंडे भी खाते  हैं।
  • व्यवहार: ये सामान्यतः एकांतप्रिय, स्थानिक होते हैं तथा अधिकतर रात्रिचर (निशाचर) या गोधूलि (संध्याचर) के समय सक्रिय रहते हैं। ये जल निकायों के निकट बिल बनाते हैं, जिन्हें होल्ट कहा जाता है।
  • पारिस्थितिकीय महत्त्व: मीठे जल के पारिस्थितिक तंत्र के महत्त्वपूर्ण शिकारी के रूप में ओटर/ऊदबिलाव एक प्रमुख प्रजाति और जलीय स्वास्थ्य का जैव-संकेतक है। इसकी उपस्थिति स्वच्छ जल, स्थिर शिकार आबादी और कार्यात्मक नदी तटीय आवासों का संकेत देती है।
  • संरक्षण की स्थिति:
  • भारत में ओटर/ऊदबिलाव की अन्य प्रजातियाँ: भारत में ओटर की 3 प्रजातियाँ पाई जाती हैं। यूरेशियन ओटर (हिमालय, पूर्वोत्तर भारत और पश्चिमी घाट में पाया जाता है) के अतिरिक्त, अन्य दो प्रजातियाँ स्मूथ-कोटेड ओटर (संपूर्ण भारत में पाया जाता है) और छोटे-पंजे वाला ओटर (हिमालय और दक्षिण भारत में पाया जाता है) हैं।

Eurasian_Otter

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