साइलेंट वैली का द्विलिंगी केकड़ा | 18 Mar 2026
शोधकर्त्ताओं ने स्वच्छ जल में पाए जाने वाले केकड़ों की एक प्रजाति, वेला कार्ली, में गाइनांड्रोमोर्फी (Gynandromorphy) का दुर्लभ मामला पाया है, यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें जीव में दोनों लिंगों के लक्षण दिखाई देते हैं, जैसे कि पुरुष प्रजनन संरचनाओं के साथ महिला गोनोपोर (gonopores) होना।
- प्रजाति और स्थान: वेला कार्ली स्वच्छ जल में पाए जाने वाले केकड़े की एक स्वदेशी प्रजाति है, जो पश्चिमी घाट में स्थित साइलेंट वैली नेशनल पार्क के वृक्ष के खोखले गड्ढों (Tree Holes) में पाई गई है।
- वैज्ञानिक महत्त्व: इस अध्ययन में स्वच्छ जल के केकड़े परिवार गेकार्सिनुसिडे में गाइनांड्रोमोर्फी का पहला मामला दर्ज किया गया है। अन्य क्रस्टेशियनों में यह ज्ञात है, लेकिन इस विशेष परिवार में इससे पहले कभी रिपोर्ट नहीं किया गया था।
- क्रस्टेशियंस जलजीव अधजीवियों (Aquatic Invertebrates) का एक समूह हैं, जो आर्थ्रोपॉड श्रेणी में आते हैं, ये ऐसे जीव हैं जिनके जोड़ वाले पैर और बाहरी कंकाल (External Skeleton) होते हैं। इसमें केकड़े, लॉबस्टर, झींगा, प्रॉन आदि शामिल हैं।
साइलेंट वैली नेशनल पार्क
- परिचय: केरल की नीलगिरि की पहाड़ियों में स्थित साइलेंट वैली नेशनल पार्क एक अछूता उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन है। इसे दक्षिण-पश्चिमी घाट के अंतिम अविकृत क्षेत्रों में से एक माना जाता है और यह नीलगिरि बायोस्फीयर रिज़र्व (1986), भारत का पहला बायोस्फीयर रिज़र्व, का मुख्य क्षेत्र है।
- भौगोलिक विशेषता: पार्क के भीतर कुंथिपुझा नदी बहती है। ‘साइलेंट वैली’ नाम शोरगुल पैदा करने वाले कीटों की ऐतिहासिक अनुपस्थिति के कारण पड़ा।
- जैव विविधता हॉटस्पॉट: यह पार्क पश्चिमी घाट विश्व धरोहर स्थल (UNESCO, 2012) का हिस्सा है। यह संकटग्रस्त लायन-टेल्ड मेकाक के लिये सबसे महत्त्वपूर्ण संरक्षित आवास है, जो इसकी प्रमुख प्रजाति है। इसके अलावा यहाँ नीलगिरि लंगूर, मलबार जाइंट स्क्विरल, नीलगिरि तहर और महान भारतीय हॉर्नबिल भी पाए जाते हैं।
- ऐतिहासिक महत्त्व: 1970 के दशक में कुंथिपुझा नदी पर प्रस्तावित बांध के कारण ‘सेव साइलेंट वैली’ आंदोलन (1973) शुरू हुआ। इस आंदोलन के परिणामस्वरूप परियोजना को रद्द किया गया और क्षेत्र को 1984 में नेशनल पार्क घोषित किया गया।
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