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भारतीय रुपये का मूल्यह्रास

  • 24 Apr 2026
  • 25 min read

 स्रोत: द हिंदू

भारतीय रुपया (INR) अमेरिकी डॉलर (USD) के मुकाबले 94 के स्तर से भी नीचे कमज़ोर हो गया है। इस अवमूल्यन को बाहरी दबावों ने और अधिक बढ़ा दिया है, विशेष रूप से पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में आई तेज़ वृद्धि ने। इससे आयात लागत में काफी बढ़ोतरी हुई है और रुपये पर अतिरिक्त दबाव पड़ा है।

  • मुद्रा अवमूल्यन बनाम मुद्रा मूल्यह्रास नीति: अवमूल्यन का अर्थ है बाज़ार  शक्तियों (मांग और आपूर्ति) के कारण मुद्रा के मूल्य में गिरावट, जबकि मूल्यह्रास का अर्थ है सरकार या केंद्रीय बैंक द्वारा जानबूझकर मुद्रा के मूल्य को नीचे करना।

भारतीय रुपये के अवमूल्यन के कारण:

  • बढ़ता चालू खाता घाटा: रुपए की लंबे समय तक चलने वाली कमज़ोरी का मूल कारण बढ़ता चालू खाता घाटा है, जो कच्चे तेल की कीमतों के 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर जाने से काफी बढ़ गया है।
  • भू-राजनीतिक आपूर्ति व्यवधान: पश्चिम एशिया संघर्ष और होर्मुज़  जलडमरूमध्य में तनाव से उत्पन्न अनिश्चितताएँ ऊर्जा की कीमतों को उच्च बनाए रख रही हैं, जिससे घरेलू मुद्रास्फीति की चिंताएँ और बढ़ रही हैं।
  • पूंजी का बहिर्वाह और सुरक्षित निवेश की ओर झुकाव: मुद्रा के अवमूल्यन की स्थिति निरंतर होने वाले विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) के बहिर्वाह के कारण और अधिक बढ़ गई है, क्योंकि वैश्विक निवेशक उभरते बाज़ारों से अपनी पूंजी निकालकर पारंपरिक सुरक्षित निवेश विकल्पों (जैसे कि अमेरिकी डॉलर) की ओर जा रहे हैं।
  • इक्विटी बाज़ार का संक्रमण: व्यापक आर्थिक चिंता और युद्ध संबंधी अनिश्चितताओं ने महत्त्वपूर्ण मुनाफावसूली को प्रेरित किया, जिससे घरेलू इक्विटी बेंचमार्क सूचकांक (सेंसेक्स और निफ्टी) गिर गए।
  • प्रबंधित अस्थायी विनिमय दर प्रणाली: भारत प्रबंधित अस्थायी विनिमय दर प्रणाली का अनुसरण करता है, जिसमें रुपए का मूल्य काफी हद तक बाज़ार में मांग और आपूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित होता है तथा भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिये कभी-कभी हस्तक्षेप करता है। 
    • हालाँकि, इस प्रकार के हस्तक्षेप की सीमाएँ हैं, क्योंकि यह व्यापार घाटे या तेल की उच्च  कीमतों जैसे दीर्घकालिक संरचनात्मक दबावों को उलट नहीं सकता है तथा यह विदेशी मुद्रा भंडार द्वारा सीमित होता है। इसके अलावा अत्यधिक हस्तक्षेप घरेलू तरलता को भी कम कर सकता है और आर्थिक विकास को प्रभावित कर सकता है।

रुपये के अवमूल्यन को नियंत्रित करने के लिये RBI द्वारा उठाए गए कदम

  • यह (भारतीय रिज़र्व बैंक) अस्थिरता को कम करने के लिये अपने विदेशी मुद्रा भंडार से डॉलर बेचकर विदेशी मुद्रा बाज़ार में हस्तक्षेप करता है।
    • यह रुपए का समर्थन करने के लिये विदेशी पूंजी प्रवाह को आकर्षित करने हेतु ब्याज दरों में वृद्धि करके मौद्रिक नीति को भी सख्त कर सकता है।
  • इसके अतिरिक्त, खुला बाज़ार परिचालन (OMO) और रेपो/रिवर्स रेपो परिचालन जैसे साधनों के माध्यम से तरलता का प्रबंधन किया जाता है।
  • इसके अलावा RBI बाह्य वाणिज्यिक उधार (ECB) को सुगम बनाकर विदेशी प्रवाह को बढ़ावा देता है।
  • यह सरकार के साथ मिलकर गैर-आवश्यक आयात को नियंत्रित करने और निर्यात को बढ़ावा देने का भी कार्य करता है, जिससे चालू खाता शेष में सुधार होता है।
  • ये सम्मिलित उपाय व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखते हुए मुद्रा को स्थिर करने में सहायता करते हैं।

Depreciation_of_Indian_Rupee

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