कोकिंग कोल एक महत्त्वपूर्ण खनिज के रूप में अधिसूचित | 02 Feb 2026
भारत सरकार ने आयात पर निर्भरता कम करने तथा आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत 2047 के विज़न को समर्थन देने के उद्देश्य से खान एवं खनिज (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1957 (MMDR) के तहत कोकिंग कोल को एक महत्त्वपूर्ण और रणनीतिक खनिज घोषित किया है।
- MMDR अधिनियम, 1957 की धारा 11C का उपयोग करते हुए सरकार ने प्रथम अनुसूची में संशोधन किया है। इसके तहत भाग A में “कोयला” की परिभाषा के अंतर्गत “कोकिंग कोयला” को स्पष्ट रूप से शामिल किया गया है तथा भाग D में इसे अलग से एक महत्त्वपूर्ण और रणनीतिक खनिज के रूप में सूचीबद्ध किया गया
कोकिंग कोल
- परिचय: कोकिंग कोयला (धातुकर्म कोयला) बिटुमिनस कोयले का एक विशिष्ट प्रकार है, जिसे कार्बनीकरण प्रक्रिया के माध्यम से कोक में बदला जाता है। यह कोक पारंपरिक ब्लास्ट फर्नेस आधारित इस्पात उत्पादन में लौह अयस्क को पिग आयरन में बदलने के लिये अनिवार्य होता है।
- गुण: इसका महत्त्व इसकी विशिष्ट कोकिंग विशेषताओं (गर्म करने पर नरम होना और फूलना) तथा कम अशुद्धियों (कम राख, सल्फर और फॉस्फोरस) के कारण है।
- इस्पात उत्पादन से संबंध: लगभग 1 टन इस्पात उत्पादन के लिये करीब 780 किग्रा. कोकिंग कोयले की आवश्यकता होती है, जो इस्पात उद्योग हेतु इसके प्रत्यक्ष रणनीतिक महत्त्व को दर्शाता है।
- वैश्विक उत्पादन: कोकिंग कोयले के प्रमुख उत्पादक देशों में चीन, ऑस्ट्रेलिया, रूस, अमेरिका और कनाडा शामिल हैं।
- भारतीय परिदृश्य: विश्व का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा इस्पात उत्पादक होने के बावजूद भारत कोकिंग कोयले के लिये आयात पर अत्यधिक निर्भर है। इस्पात क्षेत्र की लगभग 95% आवश्यकता आयात से पूरी होती है, जिसमें ऑस्ट्रेलिया की हिस्सेदारी प्रमुख है।
- कोकिंग कोयले के आयात में लगातार वृद्धि हुई है और वर्ष 2024–25 में यह 57.58 मिलियन टन तक पहुँच गया, जो पर्याप्त घरेलू संसाधनों के बावजूद भारत की बढ़ती आयात निर्भरता को दर्शाता है।
- भारत के पास लगभग 37.37 अरब टन कोकिंग कोयले का अनुमानित भंडार है, जिसका मुख्य भंडार झारखंड में स्थित है, जबकि मध्य प्रदेश, पश्चिम बंगाल और छत्तीसगढ़ में भी इसके भंडार पाए जाते हैं।