छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती | 20 Feb 2026

स्रोत: पीआईबी

केंद्रीय गृह मंत्री ने छत्रपति शिवाजी महाराज की जयंती (19 फरवरी) पर उनका वंदन करते हुए हिंदवी स्वराज की स्थापना और राष्ट्र के सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा के प्रति उनके आजीवन समर्पण को याद किया।

  • छत्रपति शिवाजी महाराज: यह पुणे के पास शिवनेरी किले में 19 फरवरी, 1630 को जन्मे, मराठा साम्राज्य के संस्थापक और एक दूरदर्शी नेतृत्वकर्त्ता थे, जिन्होंने मुगल शासन का विरोध तथा स्वशासन का समर्थन किया।
  • शिवाजी महाराज द्वारा लड़े गए प्रमुख युद्ध: प्रतापगढ़ का युद्ध (1659), पवन खिंड का युद्ध (1660), सूरत का युद्ध (1664), पुरंदर का युद्ध (1665), सिंहगढ़ का युद्ध (1670) और संगमनेर का युद्ध (1679)।
    • वाघ नख का उपयोग शिवाजी ने वर्ष 1659 में प्रतापगढ़ के युद्ध में अफज़ल खान को मारने के लिये किया था। 
  • हिंदवी स्वराज की परिकल्पना: कम उम्र में ही शिवाजी महाराज ने हिंदवी स्वराज (स्वशासन) की स्थापना का संकल्प लिया था, जो स्वदेशी संप्रभुता, नैतिक शासन और विदेशी प्रभुत्व से मुक्त राजनीतिक स्वतंत्रता की प्रगतिशील अवधारणा थी।
    • उन्होंने स्वधर्म (अपना धर्म/कर्त्तव्य), स्वराज (स्वशासन) और स्वभाषा (अपनी भाषा) के मूल आदर्शों के इर्द-गिर्द जनता को सफलतापूर्वक एकजुट किया और प्रशासन की भाषाओं के रूप में फारसी के स्थान पर मराठी और संस्कृत को अपनाया।
  • सैन्य और नौसैनिक प्रतिभा: उन्होंने समाज के सभी वर्गों से मिलकर एक विशाल, समावेशी सेना का गठन किया। 
  • उन्हें उनकी नवोन्मेषी गुरिल्ला युद्ध रणनीति (गनिमी कावा) के लिये विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त है। इसके अतिरिक्त, पश्चिमी तट की रक्षा के लिये एक मज़बूत बेड़ा और सिंधुदुर्ग जैसे तटीय किलों के निर्माण के कारण, उन्हें ‘भारतीय नौसेना के जनक’ के रूप में भी जाना जाता है।
  • प्रगतिशील प्रशासन: उनकी कुशल शासनकला (जो उनके अदम्य साहस की तरह ही उल्लेखनीय थी) अष्टप्रधान मंडल (आठ मंत्रियों की परिषद) पर आधारित एक प्रगतिशील प्रशासन प्रणाली थी।
    • शिवाजी ने प्रत्यक्ष रूप से किसानों से कर संग्रह करने की व्यवस्था शुरू की, जिससे बिचौलियों के शोषण को समाप्त किया जा सका।
  • उपाधियाँ और महत्त्व: उन्हें छत्रपति, शककर्त्ता, क्षत्रिय कुलवंत और हिंदव धर्मोधारक जैसी उपाधियों से विभूषित किया गया था। ये उपाधियाँ उनकी संप्रभुता, महान योद्धा परंपरा और धर्म के संरक्षक के रूप में उनकी भूमिका को स्पष्ट रूप से दर्शाती हैं।

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