क्या सामाजिक न्याय सुनिश्चित कर पाएगा नया राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग? | 08 Apr 2017

विदित हो कि केंद्र सरकार ने पिछड़ा वर्ग के लिये नया राष्ट्रीय आयोग बनाने के लिये लोक सभा में 123वाँ संविधान संशोधन विधेयक पेश किया है। विधेयक में यह भी प्रावधान है कि आयोग को संवैधानिक दर्जा दिया जाए। उल्लेखनीय है कि “सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग आयोग” के नाम से बनाया जा रहा यह आयोग “पिछड़ा वर्ग आयोग” की जगह लेगा। “सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग आयोग” यह नाम संवैधानिक शब्दावली के अनुरूप है, गौरतलब है कि वर्ष 1951 में जवाहरलाल नेहरू ने अनुच्छेद 15 (4) में इसी नाम पर बल दिया था। आरक्षण भारत में एक संवेदनशील मुद्दा है, जहाँ इसके उल्लेख मात्र से कहीं सरकारें बन जाती हैं तो कहीं बिगड़ भी जाती हैं। ऐसे में इस आयोग के उद्देश्य और कार्यों की समीक्षा करना अत्यंत ही ज़रूरी हो जाता है।

पृष्ठभूमि

  • गौरतलब है कि केंद्र सरकार का यह फैसला पिछड़ों के आरक्षण की संस्तुति करने वाले मंडल आयोग की भी याद दिलाता है। जनता दल सरकार ने वर्ष 1989 में मंडल आयोग की अनुशंसाओं के अनुरूप पिछड़ी जातियों को नौकरियों में आरक्षण देने का फैसला किया था।
  • तत्कालीन प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 15 अगस्त 1990 को लाल किले के प्राचीर से देश को संबोधित करते हुए इस फैसले की वज़ह बताई थी। श्री सिंह ने कहा था कि “हमारा मानना है कि कोई भी समाज केवल आर्थिक समृद्धि से ही उन्नत नहीं हो सकता है, उनका विकास तभी सम्भव है जब सत्ता में भी उन्हें हिस्सेदारी दी जाए और हम उन्हें उनका यह हिस्सा देने के लिये तैयार हैं”।
  • लेकिन मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होते ही देश के विभिन्न हिस्सों में तमाम जातियों ने पिछड़ा वर्ग में शामिल किये जाने की मांग उठानी शुरू कर दी थी। इसके लिये वर्ष 1993 में राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया। उसे यह ज़िम्मेदारी दी गई कि वह पिछड़ा वर्ग में शामिल होने की मांगों का विधिवत परीक्षण कर केंद्र सरकार को उसके बारे में ज़रूरी सलाह देगा। 

क्यों लाया जा रहा है नया आयोग?

  • पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की मांग एक पुरानी मांग थी। इस मांग के पीछे एक बड़ा आधार यह था कि अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग की तरह से पिछड़ा वर्ग आयोग को समस्याएँ सुनने और उनका निपटारा करने का अधिकार नहीं था और शायद इसीलिये तमाम आरक्षित पदों पर नियुक्तियाँ न किये जाने संबंधी शिकायतें दूर होने का नाम नहीं ले रही थीं।
  • राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा देने की तैयारी यह बताती है कि सरकार इस आयोग को वैसा ही स्वरूप देना चाहती है जैसा अनुसूचित जाति एवं जनजाति आयोग को प्राप्त है।
  • अब जब एक पुरानी मांग को पूरा करने की दिशा में कदम बढ़ा दिये गए हैं तब फिर आरक्षण व्यवस्था की खामियों को दुरुस्त कर उसे और प्रभावी बनाने पर भी ध्यान देना चाहिये। ऐसा करते हुए ऐसी कोई व्यवस्था बनाना आवश्यक है जिससे पात्र लोगों को ही आरक्षण का लाभ मिले।
  • मंडल आयोग की सिफारिशों के अनुरूप अन्य पिछड़ी जातियों को आरक्षण सामाजिक न्याय के लक्ष्य को पूरा करने के लिये प्रदान किया गया था, लेकिन पिछले कुछ समय से इस व्यवस्था को इस रूप में देखा जाने लगा है जैसे यह सरकारी नौकरियाँ हासिल करने का आसान जरिया हो।

आयोग के मुख्य कार्य

  • विदित हो कि सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिये राष्ट्रीय आयोग, वर्तमान राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा किये जाने वाले कार्यों के साथ-साथ सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिये शिकायत निवारण तंत्र का अतिरिक्त कार्य भी करेगा।
  • गौरतलब है कि इस आयोग को संवैधानिक दर्ज़ा देने के साथ ही एक नया अनुच्छेद 342 (ए) लाया जा रहा है जो पिछड़े वर्गों की सूची में किसी भी समुदाय को जोड़ने या हटाने के लिये संसद की सहमति लेना अनिवार्य कर देगा। इससे पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सकेगी।

समस्याएँ और चुनौतियाँ

  • पिछड़ा वर्ग आयोग के स्थान पर सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग आयोग बनाने और उसे संवैधानिक दर्जा देने का फैसला जहाँ एक सुधारवादी कदम है वहीं इस बात की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि इसका एक मकसद जाट, मराठा, पाटीदार आदि को आरक्षण प्रदान करना भी हो सकता है।
  • यदि ऐसा किया जाता है तो अदालतें इन जातियों को दिये जाने वाले आरक्षण को खारिज नहीं कर सकती। लेकिन इससे होगा यह कि कुछ और जातियाँ भी आरक्षण की मांग करने लगेंगी, देश-व्यापी हड़ताल और तोड़-फोड़ करेंगी, तो क्या हर बार सरकार एक नया आयोग बनाती रहेगी?
  • बहुत से लोगों का यह मानना है कि आरक्षण सामाजिक आधार पर न देकर आर्थिक आधार पर दिया जाए, यह धारणा भी आपने आप में विसंगतियों से युक्त है। विदित हो कि आरक्षण एक गरीबी निवारक योजना नहीं है।
  • दरअसल, सरकार बहुत सी ऐसी योजनाएँ चलाती है जो गरीबी हटाने से संबंधित हैं, आरक्षण का एकमात्र उद्देश्‍य प्रतिनिधित्‍व है। आरक्षण का उद्देश्य यह कतई नहीं है कि किसी समाज के हर व्यक्ति का कल्याण आरक्षण के माध्यम से ही होगा, बल्कि आरक्षण केवल उस वर्ग के लोगों को भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में प्रतिनिधित्व दिलाता है जो भेदभाव का शिकार रहे हैं।
  • आयोग का कार्य यह भी है कि वह उन जातियों की पहचान करे, जिन्हें अब आरक्षण की ज़रूरत नहीं है साथ ही आयोग यह भी देखेगा की कौन से ऐसी जातियाँ या वर्ग हैं जिन्हें आरक्षण प्राप्त करने योग्य जातियों की सूची में शामिल किया जा सकता है।
  • आयोग की भूमिका यहीं तक सिमित करने के बजाय उसे सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े वर्गों की उन्नति एवं विकास सुनिश्चित करने का उत्तरदायित्व भी देना चाहिये। आयोग इनके कल्याण का उपाय करे और इन उपायों के बारे में केंद्र और राज्यों को सलाह दे।
  • आरक्षण की प्रभावशीलता और उपयोगिता के साथ-साथ पिछड़े वर्गों की प्रगति और अन्य सभी संबंधित कार्यों की निगरानी का कार्य भी आयोग को सौंप देना चाहिये।

क्या किया जाना चाहिये?

  • हमारे यहाँ एक पुरानी कहावत है कि ‘जाति कभी नहीं जाती’। यह भी सच है कि हमारे देश में कितने ही उद्देश्यपूर्ण आयोग, राजनैतिक हस्तक्षेप के शिकार हो गए हैं। इन सभी बातों का ख्याल रखते हुए हमें सबसे पहले आयोग के सदस्यों के चुनाव में पारदर्शिता लानी होगी। इस आयोग की सरंचना कुछ इस प्रकार से होनी चाहिये-

• अध्यक्ष के रूप में एक पूर्व न्यायाधीश।
• सदस्य सचिव के रूप में एक केंद्रीय सचिव स्तर का अधिकारी।
• एक सामाजिक वैज्ञानिक।
• सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों से संबंधित मामलों की विशेष जानकारी रखने वाले दो व्यक्ति।

  • वैसे गरीब और बेरोज़गार जिन्हें पिछड़े वर्गों के लोगों के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जाता है, उन्हें छात्रवृत्ति और शैक्षिक ऋण जैसे साधनों के माध्यम से मदद की जानी चाहिये न कि आरक्षण के माध्यम से।
  • सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक मंजूरी देने के क्रम में आरक्षण व्यवस्था की नीर-क्षीर ढंग से समीक्षा की जानी चाहिये।
  • यह वक्त की मांग है कि हमारे नीति-निर्माता इस पर भी विचार करें कि आजादी के 70 वर्ष बाद भी कुछ वर्गों के लोग शैक्षणिक रूप से पिछड़े क्यों हैं? अच्छा होगा कि आरक्षण के साथ शिक्षा व्यवस्था को भी दुरुस्त करने पर विचार हो।
  • वस्तुतः आरक्षण हमेशा से एक विवादित विषय रहा है, लेकिन आज़ादी के बाद के दशकों में आरक्षण सर्वाधिक ज्वलंत मुद्दा बन गया है। विडम्बना यह है कि भारत में उद्यमिता का अभाव है, ऐसे में हर कोई सरकारी नौकरी की तरफ देखता है और अपनी सुविधानुसार आरक्षण की व्याख्या करता है।
  • इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश में सामाजिक सहभागिता को बढ़ावा देने के लिये आरक्षण की नितांत आवश्यकता है, किन्तु एक सच यह भी है कि आरक्षण के उद्देश्यों के बारे में अधिकांश लोग अनजान हैं।
  • आज आवश्यकता इस बात की है कि आरक्षण की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि को समझने में लोगों की मदद की जाए। भारत की जातीय, लैंगिक और क्षेत्रीय विविधताओं के बारे में बच्चों को बताया जाए और आरक्षण के लिये व्यावहारिक सहमति बनाई जाए।

निष्कर्ष
नया पिछड़ा आयोग बनाने का मामला हमेशा ही एक जटिल और गंभीर मसला रहा है। इसकी गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जहाँ गुजरात में व्यापक पाटीदार आंदोलन के चलते आनंदीबेन को अपनी कुर्सी गँवानी पड़ गई थी वहीं हरियाणा में जाट आन्दोलन के दौरान करोड़ों की सरकारी और निजी सम्पति बर्बाद कर दी गई। दरअसल, पिछड़े वर्गों के लिये नया आयोग बनाने के फैसले के पीछे राजनीतिक मकसद के लोभ से बच पाना आसान नहीं है, लेकिन यह अतिमहत्त्वपूर्ण है कि इसमें शैक्षणिक पिछड़ेपन की हकीकत को शिद्दत से स्वीकार किया गया है। बहुत देर से हमें यह अहसास हुआ है कि देश में शैक्षणिक पिछड़ापन भी मौजूद है जो असल में सामाजिक पिछड़ेपन का ही उपोत्पाद( by-product) है।