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संसदीय बनाम अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली | 25 Jul 2020 | भारतीय राजनीति

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में संसदीय बनाम अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली व उससे संबंधित विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

भारत का संविधान न तो ब्रिटेन की संसद से पारित हुआ और न ही यह किसी धर्म संहिता पर आधारित है। भारत के लोगों के संकल्प की प्रतिनिधि संस्था ‘संप्रभु संविधान सभा’ ने संविधान का निर्माण किया है, जिसकी प्रस्तावना ने हमारी आगे की दिशा तय की। संविधान सभा में काफी सोच-विचार और बहस-मुबाहिसे के बाद शासन की संसदीय व्यवस्था चुनी गई। केंद्र व राज्य दोनों ही स्तर पर शासन की संसदीय व्यवस्था को अपनाया गया। संविधान के अनुच्छेद 74 और 75 के अंतर्गत केंद्र में तथा अनुच्छेद 163 और 164 के अंतर्गत राज्यों में संसदीय प्रणाली की व्यवस्था की गई है। 

भारत में शासन की संसदीय प्रणाली का चयन किया गया क्योंकि यह भारतीय संदर्भ में अधिक मुफीद और कारगर थी। इसका चयन करते समय हमारे संविधान निर्माताओं ने स्‍थायित्व की जगह जवाबदेही को महत्त्व दिया, परंतु वर्तमान में राजनीतिक दलों का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना रह गया है। विधायी सदनों का कामकाज काफी लंबे समय से घटा है। बहस की गुणवत्ता लगातार घटी है। राजस्थान विधानसभा इस तथ्य का ज्वलंत उदाहरण है। इन घटनाओं से कुछ विशेषज्ञों ने भारत में अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली को अपनाने का सुझाव दिया है।

इस आलेख में संसदीय शासन व्यवस्था तथा अध्यक्षात्मक शासन व्यवस्था का तुलनात्मक अध्ययन किया जाएगा।  

संसदीय शासन व्यवस्था से तात्पर्य 

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सरकार के गठन की प्रक्रिया

संसदीय प्रणाली की विशेषताएँ

संसदीय शासन व्यवस्था के दोष

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अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली से तात्पर्य 

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की विशेषताएँ 

अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली के दोष 

संसदीय व्यवस्था की स्वीकार्यता के कारण 

भारतीय एवं ब्रिटिश संसदीय व्यवस्था में विभेद

प्रश्न- संसदीय व अध्यक्षात्मक शासन प्रणाली की तुलनात्मक विवेचना कीजिये साथ ही भारत में संसदीय शासन व्यवस्था को अपनाने के कारणों का उल्लेख कीजिये।