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मी टू अभियान और भारत | 12 Oct 2018 | सामाजिक न्याय

संदर्भ

#MeToo अभियान जिसकी शुरुआत अक्तूबर, 2017 में हॉलीवुड के बड़े निर्माताओं में शामिल हार्वी वाइनस्टीन पर कई महिलाओं द्वारा यौन उत्पीड़न और बलात्कार के आरोप लगाए जाने के बाद हुई थी, आखिरकार अब भारत में पहुँच गया है। इसके माध्यम से महिलाएँ अपने खिलाफ हुए उत्पीड़न को तेज़ी से सोशल मीडिया पर शेयर भी कर रही हैं। यह अभियान भारत में इतनी तेज़ी से फ़ैल रहा है कि नेता से लेकर अभिनेता तक कोई भी वर्ग ऐसा नहीं है जो इसके दायरे में नहीं आया हो। यहाँ कुछ घटनाएँ तो ऐसी हैं जो लगभग एक दशक पुरानी हैं। ऐसे में सवाल यह उठता है कि अभी तक इन महिलाओं ने इसके खिलाफ आवाज़ क्यों नहीं उठाई? इसका जवाब चाहे जो भी हो लेकिन यह स्पष्ट है कि #मी टू अभियान उन महिलाओं के लिये एक बड़ा संबल बनकर उभरा है, जिन्होंने यौन शोषण के विरुद्ध चुप्पी तोड़ते हुए खुलकर बात करने का साहस दिखाया है।

क्या है #Me Too?

शोषण क्या है?

शोषण की परिभाषा एक महिला के लिये कुछ और है, जबकि पुरुष के लिये कुछ और। जो बात एक पुरुष के लिये सामान्य हो सकती है, हो सकता है वही एक महिला के लिये शोषण के दायरे में शामिल होती हो। ऐसी स्थिति में यह स्पष्ट करना बेहद कठिन है कि इस शब्द की व्यापकता को कैसे बांधा जाए?

भारत में महिलाओं का उत्पीड़न

कार्यस्थल पर महिलाओं के साथ यौन उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013

  • यह अधिनियम  9 दिसंबर, 2013 को प्रभाव में आया था।
  • यह अधिनियम उन संस्थाओं पर लागू होता है जहाँ दस से अधिक लोग काम करते हैंl यह क़ानून कार्यस्थल पर महिलाओं के यौन उत्पीड़न को अवैध करार देता हैl
  • यह क़ानून यौन उत्पीड़न के विभिन्न प्रकारों को चिह्नित करता है और यह बताता है कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की स्थिति में शिकायत किस प्रकार की जा सकती है।
  • यह क़ानून हर उस महिला के लिये बना है जिसका किसी भी कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न हुआ हो।
  • इस क़ानून के अनुसार यह ज़रूरी नहीं है कि जिस कार्यस्थल पर महिला का उत्पीड़न हुआ है, वहाँ वह नौकरी करती हो।
  • कार्यस्थल कोई भी कार्यालय/दफ्तर हो सकता है, चाहे वह निजी संस्थान हो या सरकारी।

यौन उत्पीड़न कानून कब, कहाँ और किसके खिलाफ?

शिकायत दर्ज कराने की समय-सीमा

निष्कर्ष