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15वें वित्त आयोग की अंतरिम रिपोर्ट | 04 Feb 2020 | भारतीय अर्थव्यवस्था

इस Editorial में The Hindu, The Indian Express, Business Line आदि में प्रकाशित लेखों का विश्लेषण किया गया है। इस लेख में 15वें वित्त आयोग की हालिया अंतरिम रिपोर्ट और वित्त आयोग की भूमिका की चर्चा की गई है। आवश्यकतानुसार, यथास्थान टीम दृष्टि के इनपुट भी शामिल किये गए हैं।

संदर्भ

भारतीय संविधान की संघीय व्यवस्था इसकी प्रमुख विशेषताओं में से एक है, जो केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति तथा कार्यों के विभाजन की अनुमति देती है और इसी आधार पर कराधान की शक्तियों को भी केंद्र एवं राज्यों के बीच विभाजित किया जाता है। केंद्र और राज्यों के मध्य वित्त विभाजन को राजकोषीय संघवाद के रूप में भी परिभाषित किया जाता है तथा वित्त आयोग इस संदर्भ में महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। ज्ञात हो कि भारतीय संविधान में इस बात की परिकल्पना की गई है कि वित्त आयोग देश के राजकोषीय संघवाद में संतुलन की भूमिका निभाएगा। हाल ही में 15वें वित्त आयोग ने संसद के समक्ष अपनी अंतरिम रिपोर्ट प्रस्तुत की है, जिसमें केंद्र और राज्यों के मध्य राजस्व के विभाजन का विस्तृत विश्लेषण कर विभिन्न सिफारिशें की गई हैं।

15वें वित्त आयोग की अंतरिम रिपोर्ट

जनसंख्या के रूप में मापदंड की आलोचना

दक्षिणी राज्यों की सरकारों ने आयोग द्वारा उपयोग किये जाने वाले जनसंख्या मापदंड की आलोचना की है। 14वें वित्त आयोग ने राज्यों के हिस्से की गणना के लिये वर्ष 1971 और वर्ष 2011 के जनगणना आँकड़ों का उपयोग किया था और 2011 की अपेक्षा 1971 के आँकड़ों को अधिक महत्त्व दिया था। 14वें वित्त आयोग के विपरीत 15वें वित्त आयोग ने सिर्फ वर्ष 2011 के जनगणना आँकड़ों का प्रयोग किया है। आयोग ने तर्क दिया है कि मौजूदा राजकोषीय समीकरण को देखते हुए यह आवश्यक था कि नवीन जनगणना आँकड़ों का प्रयोग किया जाए। आलोचना करने वाले राज्यों का मानना है कि वर्ष 2011 के जनगणना आँकड़ों के उपयोग से उत्तर प्रदेश और बिहार जैसी बड़ी आबादी वाले राज्यों को ज़्यादा हिस्सा मिल जाएगा, जबकि कम प्रजनन दर वाले छोटे राज्यों के हिस्से में काफी कम राजस्व आएगा। हिंदी भाषी उत्तरी राज्यों (बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और झारखंड) की संयुक्त जनसंख्या 47.8 करोड़ है, जो कि देश की कुल आबादी का 39.48 प्रतिशत है। इस क्षेत्र के करदाताओं की कर राजस्व में मात्र 13.89 प्रतिशत का योगदान है, जबकि उन्हें कुल राजस्व में से 45.17 प्रतिशत हिस्सा प्रदान किया जाता है। दूसरी ओर आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों को कम आबादी के कारण कुल राजस्व में भी काफी कम हिस्सा मिलता है, जबकि देश की कुल राजस्व प्राप्ति में उनका योगदान काफी अधिक रहता है।

वित्त आयोग

15वाँ वित्त आयोग

वित्त आयोग की आवश्यकता क्यों?

वित्त आयोग के कार्य

प्रश्न: ‘वित्त आयोग राजकोषीय संघवाद में केंद्र और राज्य के मध्य संतुलन की भूमिका अदा करता है।’ चर्चा कीजिये।