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डी-डॉलराइज़ेशन: अर्थ और महत्त्व | 19 Mar 2022 | भारतीय अर्थव्यवस्था

यह एडिटोरियल 17/03/2022 को ‘इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित “Why ‘De-Dollarisation’ is Imminent” लेख पर आधारित है। इसमें वैश्विक वाणिज्य में अमेरिकी डॉलर (USD) के वर्चस्व को कम करने के लिये विभिन्न देशों द्वारा किये जा रहे प्रयासों के बारे में चर्चा की गई है।

संदर्भ

संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा व्यापार का शस्त्रीकरण, प्रतिबंधों को लागू करना और ‘SWIFT’ (Society for Worldwide Interbank Financial Telecommunication) से बहिर्वेशन डी-डॉलराइज़ेशन (De-Dollarisation: वैश्विक बाज़ार में अमेरिकी डॉलर के वर्चस्व में कमी लाना) की प्रक्रिया को तेज़ कर सकता है, क्योंकि राजनयिक एवं आर्थिक स्वायत्तता प्रदर्शित कर रहे देश अमेरिकी प्रभुत्व वाली वैश्विक बैंकिंग प्रणालियों का उपयोग करने के प्रति सचेत रहेंगे। 

अमेरिकी डॉलर, जो विश्व की आरक्षित मुद्रा है, वर्तमान संदर्भ में लगातार गिरावट का शिकार हो सकती है क्योंकि विश्व के प्रमुख केंद्रीय बैंक अपने भंडार को डॉलर से दूर यूरो, रॅन्मिन्बी (Renminbi) या स्वर्ण जैसी अन्य परिसंपत्तियों या मुद्राओं के रूप में विविधिकृत करने की राह पर आगे बढ़ सकते हैं।

डी-डॉलराइज़ेशन की धारणा एक बहुध्रुवीय विश्व के विचार से सुसंगत है, जहाँ प्रत्येक देश मौद्रिक नीति के क्षेत्र में आर्थिक स्वायत्तता का उपभोग करना चाहेगा।

डी-डॉलराइज़ेशन: क्या और क्यों?

डॉलर के वर्चस्व के कारण 

डी-डॉलराइज़ेशन के लिये किये जा रहे प्रयास 

इस संबंध में भारत की स्थिति 

निष्कर्ष

अभ्यास प्रश्न: ‘‘संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा अपने विदेश नीति लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये संभावित हथियार के रूप में अमेरिकी डॉलर के लगातार उपयोग से निस्संदेह डी-डॉलराइज़ेशन की प्रक्रिया में तेज़ी आएगी।’’ टिप्पणी कीजिये।